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देवभूमि में कृषि क्रांति की नई दस्तक: लक्सर से ‘मखाना’ की खेती का पायलट प्रोजेक्ट शुरू, किसानों की आय को लगेंगे पंख

लक्सर (हरिद्वार): उत्तराखंड की उपजाऊ भूमि अब केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं रहेगी। राज्य के कृषि परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत करते हुए, उत्तराखंड सरकार ने मखाना (Fox Nut) उत्पादन के क्षेत्र में कदम रख दिया है। लक्सर के गंगदासपुर बालावाली गांव से प्रदेश के पहले ‘मखाना खेती पायलट प्रोजेक्ट’ का आधिकारिक शुभारंभ कृषि मंत्री गणेश जोशी द्वारा किया गया।

यह पहल न केवल राज्य के जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए वरदान साबित होगी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘कृषि से समृद्धि’ के विजन को धरातल पर उतारने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर भी मानी जा रही है।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम: मंत्री ने खुद किया मखाना रोपण

बुधवार, 15 अप्रैल को आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में कृषि मंत्री गणेश जोशी ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच खुद मखाना रोपण कर इस परियोजना की औपचारिक शुरुआत की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जलवायु और मिट्टी में अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें अब तक पूरी तरह से खंगाला नहीं गया था। बिहार की एक विशेषज्ञ संस्था के सहयोग से शुरू किया गया यह पायलट प्रोजेक्ट लक्सर क्षेत्र की आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और केंद्र की ₹476 करोड़ की योजना

मीडिया को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने मखाना उत्पादन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए साल 2025 में ‘राष्ट्रीय मखाना बोर्ड’ का गठन किया है।

“केंद्र सरकार द्वारा साल 2025-26 से 2030-31 तक के लिए ₹476 करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है। यह राशि शोध, बीज की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और निर्यात को बढ़ावा देने में खर्च की जाएगी। उत्तराखंड उन चुनिंदा 11 राज्यों में शामिल है, जहाँ मखाना उद्योग को आधुनिक बनाने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की गई है।” – गणेश जोशी, कृषि मंत्री

उत्तराखंड के लिए ₹143 लाख का विशेष बजट

राज्य सरकार मखाना उत्पादन को लेकर कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 2025-26 के अंतिम त्रैमास में ही केंद्र से ₹50 लाख की राशि स्वीकृत कराई गई है। इसके अलावा, आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने ₹143.16 लाख की विस्तृत कार्ययोजना को मंजूरी दी है।

इस बजट का मुख्य उद्देश्य किसानों को केवल बीज देना नहीं, बल्कि उन्हें मखाना उत्पादन की पूरी ‘वैल्यू चेन‘ (Value Chain) से जोड़ना है। इसमें कौशल विकास से लेकर मखाना की ग्रेडिंग और मार्केटिंग तक के घटकों को शामिल किया गया है।

तीन मुख्य केंद्रों पर मिलेगा प्रशिक्षण

उत्तराखंड में मखाना की खेती को वैज्ञानिक आधार देने के लिए प्रदेश के तीन प्रमुख संस्थानों को प्रशिक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है:

  1. कृषि विज्ञान केंद्र, धनौरी (हरिद्वार)

  2. कृषि विज्ञान केंद्र, ढकरानी (देहरादून)

  3. कृषि विज्ञान केंद्र, काशीपुर (उधम सिंह नगर)

इन केंद्रों पर आयोजित होने वाले सेमिनार और वर्कशॉप के जरिए किसानों को बताया जाएगा कि किस तरह कम लागत में मखाना उगाकर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों के किसानों को प्राथमिकता दी जा रही है जहाँ खेतों में जलभराव की समस्या रहती है, क्योंकि मखाना जलीय कृषि (Aquaculture) का हिस्सा है।

सेब की अति सघन बागवानी में भी बड़ी उपलब्धि

मखाना के साथ-साथ कृषि मंत्री ने बागवानी क्षेत्र की प्रगति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राज्य में सेब की ‘अति सघन बागवानी’ (Ultra High Density Plantation) के तहत साल 2025-26 में 230 हेक्टेयर क्षेत्र में 30 क्लस्टर सफलतापूर्वक विकसित किए गए हैं। यह दर्शाता है कि उत्तराखंड सरकार पारंपरिक खेती के साथ-साथ हाई-वैल्यू कैश क्रॉप्स (नगदी फसलों) पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रही है।

क्यों खास है उत्तराखंड के लिए मखाना?

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के तराई और मैदानी इलाकों में मखाना की खेती की जबरदस्त संभावनाएं हैं।

  • अनुकूल जलवायु: लक्सर और उधम सिंह नगर के कई इलाकों की भौगोलिक स्थिति बिहार के मिथिलांचल जैसी है, जो मखाना उत्पादन का केंद्र है।

  • बेहतर मुनाफा: गेहूं और धान के मुकाबले मखाना की खेती में प्रति एकड़ आय कई गुना अधिक है।

  • बढ़ती वैश्विक मांग: सुपरफूड के रूप में मखाना की मांग यूरोप और अमेरिका में तेजी से बढ़ रही है, जिससे निर्यात के द्वार खुलेंगे।

सुनहरे भविष्य की उम्मीद

लक्सर से शुरू हुआ यह पायलट प्रोजेक्ट यदि सफल रहता है, तो आने वाले समय में उत्तराखंड ‘व्हाइट गोल्ड’ (मखाना) के बड़े उत्पादक के रूप में उभर सकता है। सरकार की मंशा साफ है—खेती को लाभदायक बनाना और पलायन रोकना। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के समर्थन और राज्य की सक्रियता ने निश्चित रूप से किसानों के बीच एक नई उम्मीद जगाई है।

अब देखना यह होगा कि देवभूमि के किसान इस नई तकनीक और फसल को कितनी जल्दी अपनाते हैं और मखाना की चमक उत्तराखंड के गांवों में कितनी समृद्धि लाती है।

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