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महिला आरक्षण पर सियासी घमासान: ‘आरक्षण के खिलाफ नहीं, लेकिन सरकार के तरीके पर आपत्ति’; मल्लिकार्जुन खरगे ने खोला मोर्चा

नई दिल्ली। देश में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाते हुए एलान किया है कि कांग्रेस पार्टी इस बिल के मौजूदा प्रावधानों और इसे लागू करने के ‘तरीके’ का पुरजोर विरोध करेगी। खरगे ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में है, लेकिन सरकार ने इसमें परिसीमन (Delimitation) और जनगणना की जो शर्तें जोड़ी हैं, वे केवल चुनावी लाभ लेने की एक चाल है।

राजधानी में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में खरगे के साथ कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव भी मौजूद रहे। विपक्षी नेताओं की यह एकजुटता दर्शाती है कि आने वाले संसद सत्र में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बड़े विधायी टकराव का कारण बन सकता है।

‘डिलिमिटेशन के नाम पर सरकार का खेल’

मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि महिला आरक्षण बिल पर मल्लिकार्जुन खरगे और उनकी पार्टी का स्टैंड साफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इस बिल में परिसीमन की शर्त को इसलिए जोड़ा है ताकि इसे अनिश्चितकाल के लिए टाला जा सके। खरगे ने कहा, “सरकार डिलिमिटेशन के नाम पर खेल कर रही है। यह बिल केवल चुनावी फायदे के लिए लाया गया है। यदि सरकार की मंशा साफ होती, तो इसे तुरंत लागू करने का प्रावधान किया जाता।”

विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया में कई साल लग सकते हैं, जिससे 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ महिलाओं को निकट भविष्य में नहीं मिल पाएगा। खरगे ने इसे ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ कदम करार देते हुए कहा कि यह विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश है।

संस्थाओं की शक्तियों पर कब्जा: खरगे का गंभीर आरोप

कांग्रेस अध्यक्ष ने कार्यपालिका द्वारा संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों को हथियाने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि परिसीमन का अधिकार जिस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है, वह चिंताजनक है। खरगे ने कहा, “जो शक्तियां संसद और स्वायत्त संस्थाओं के पास होनी चाहिए, उन्हें कार्यपालिका अपने नियंत्रण में ले रही है ताकि अपनी सुविधानुसार परिसीमन की सीमाओं को बदला जा सके। वे असम और जम्मू-कश्मीर के मामलों में पहले ही हमें धोखा दे चुके हैं।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार ने अभी तक आधिकारिक जनगणना भी पूरी नहीं कराई है, फिर भी परिसीमन की बात करना जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।

‘आरक्षण के विरोधी नहीं, संशोधनों के समर्थक’

सियासी गलियारों में यह नैरेटिव न बने कि कांग्रेस महिलाओं के हक के खिलाफ है, इसे लेकर खरगे बेहद सतर्क नजर आए। उन्होंने बार-बार दोहराया, “हम महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हमने ऐतिहासिक रूप से इस विधेयक का समर्थन किया है। लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे द्वारा सुझाए गए संशोधनों को इसमें शामिल किया जाए।”

विपक्ष की प्रमुख मांगों में से एक ‘कोटा के भीतर कोटा’ यानी पिछड़ी जातियों (OBC) की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान करना भी है, जिस पर खरगे ने सांकेतिक रूप से इशारा किया। उन्होंने सभी विपक्षी दलों से आह्वान किया कि वे संसद में एकजुट होकर इस ‘अधूरे और भ्रामक’ विधेयक के खिलाफ लड़ें।

विपक्षी एकजुटता और भविष्य की रणनीति

प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी यादव की मौजूदगी ने इस बात को पुख्ता कर दिया है कि ‘इंडिया’ गठबंधन इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की साझा रणनीति बना चुका है। विपक्षी नेताओं का मानना है कि सरकार महिलाओं को सशक्त करने के बजाय केवल हेडलाइन मैनेजमेंट कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण बिल पर मल्लिकार्जुन खरगे का यह कड़ा रुख आने वाले चुनावों में एक बड़ा विमर्श पैदा कर सकता है। जहां बीजेपी इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, वहीं कांग्रेस इसे ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ (ऐसा चेक जिसकी तारीख निकल चुकी हो या भविष्य की हो) साबित करने में जुट गई है।

16 अप्रैल से प्रस्तावित संसद के विशेष सत्र (जैसा कि हालिया घटनाक्रमों में संकेत मिले हैं) के दौरान यह मुद्दा केंद्र बिंदु में रहेगा। मल्लिकार्जुन खरगे के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस अब रक्षात्मक होने के बजाय सरकार की घेराबंदी करने के मूड में है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार परिसीमन और जनगणना की शर्तों पर झुकती है या विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर सरकार की घेराबंदी तेज करता है।

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