देहरादून (ब्यूरो)। देवभूमि उत्तराखंड पारंपरिक खेती के ढर्रे को बदलकर अब देश के सबसे बड़े ‘एरोमा हब’ (सुगंधित पौधों का केंद्र) के रूप में उभरने के लिए पूरी तरह तैयार है। राज्य की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पंख लगाने और पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन पर अंकुश लगाने के लिए एक गेम-चेंजर मास्टरप्लान धरातल पर उतारा है। देहरादून के सेलाकुई स्थित परफ्यूमरी एवं सगंध अनुसंधान एवं विकास संस्थान (CAP) में आयोजित एक उच्च स्तरीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के दौरान सूबे के कृषि मंत्री गणेश जोशी ने राज्य की महत्वाकांक्षी उत्तराखंड महक क्रांति नीति 2026 की औपचारिक घोषणा की।
इस अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान कृषि मंत्री ने सेमिनार की विशेष स्मारिका का विमोचन भी किया। इस अवसर पर उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का मुख्य विजन केवल कृषि उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि खेती को व्यावहारिक रूप से घाटे के सौदे से उबारकर बेहद लाभकारी और व्यावसायिक बनाना है, जिससे सीधे तौर पर किसानों की आय दोगुनी से अधिक की जा सके।
क्या है ‘महक क्रांति नीति’ और क्या हैं इसके बड़े लक्ष्य?
उत्तराखंड की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां हमेशा से ही औषधीय और सगंध (Aromatic) पौधों के लिए ईश्वरीय वरदान रही हैं। इसी का रणनीतिक लाभ उठाने के लिए उत्तराखंड महक क्रांति नीति 2026 को बेहद वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया है। इस नीति के जरिए राज्य सरकार ने अगले कुछ वर्षों के भीतर कृषि क्षेत्र में व्यापक बदलाव का खाका खींचा है।
इस नई नीति के तहत राज्य के भीतर कुल 23 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को पूरी तरह से सगंध खेती (Aromatic Farming) से आच्छादित करने का एक विशाल लक्ष्य तय किया गया है। सरकार का अनुमान है कि इस नीति के पूर्ण क्रियान्वयन से उत्तराखंड के लगभग 91 हजार किसान परिवारों को सीधा आर्थिक लाभ पहुंचेगा। पारंपरिक फसलों (जैसे मंडुआ, झंगोरा या गेहूं) के मुकाबले सगंध पौधों जैसे लेमनग्रास, डैमास्क गुलाब, और पुदीने की खेती से किसानों को कई गुना अधिक मुनाफा हासिल होगा, क्योंकि वैश्विक बाजार में एसेंशियल ऑयल्स (Essential Oils) की मांग लगातार बढ़ रही है।
चंपावत और नैनीताल में आकार ले रही है देश की पहली ‘सिनेमन वैली’
इस महा-अभियान के तहत कृषि मंत्री गणेश जोशी ने एक बेहद महत्वपूर्ण और अनूठी परियोजना की प्रगति साझा की। उन्होंने बताया कि राज्य के दो प्रमुख जिलों—चंपावत और नैनीताल—को मिलाकर लगभग 5200 हेक्टेयर क्षेत्र में एक समर्पित “सिनेमन वैली” (दालचीनी घाटी) विकसित की जा रही है।
“सिनेमन वैली परियोजना के माध्यम से उत्तराखंड में दालचीनी (Cinnamon) की व्यावसायिक खेती को एक संगठित उद्योग का रूप दिया जाएगा। यह भारत की घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ आयात पर निर्भरता कम करने में मील का पत्थर साबित होगी।”
इस विशेष वैली के विकसित होने से न केवल उच्च गुणवत्ता वाली दालचीनी का रिकॉर्ड उत्पादन होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर ही इसके प्रसंस्करण (Processing) और पैकेजिंग की इकाइयां भी स्थापित की जाएंगी। इससे पहाड़ों में ही नए स्थानीय उद्यमियों (Agri-Preneurs) का उदय होगा और युवाओं व महिलाओं के लिए रोजगार तथा स्वरोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होंगे।
वन भूमि और दुर्गम क्षेत्रों के किसानों को जोड़ने की रणनीति
सेमीनार को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री ने विभागीय अधिकारियों को कड़े और स्पष्ट निर्देश जारी किए। उन्होंने कहा कि इस नीति का असली लाभ तब तक नहीं मिलेगा जब तक कि इसका विस्तार उत्तराखंड के सुदूरवर्ती, पर्वतीय और अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले सीमांत किसानों तक न हो।
इसके लिए उन्होंने एक अनूठा फॉर्मूला सुझाया:
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फॉरेस्ट लैंड कोऑर्डिनेशन: कृषि विभाग को वन विभाग (Forest Department) के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा।
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बफर जोन फार्मिंग: जंगलों और बस्तियों के बीच की जो जमीन (फॉरेस्ट लैंड के आसपास का क्षेत्र) अक्सर जंगली जानवरों के आतंक के कारण खाली छोड़ दी जाती है, वहां सगंध पौधों की खेती की जाएगी। चूंकि बंदर और जंगली सूअर जैसे जानवर इन सुगंधित पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाते, इसलिए यह किसानों के लिए सबसे सुरक्षित और सर्वाधिक मुनाफा देने वाली खेती साबित होगी।
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पलायन पर ब्रेक: जब बंदरों और अन्य जानवरों के डर से खेती छोड़ चुके किसानों को बंजर जमीन से मोटी कमाई होने लगेगी, तो पहाड़ों से हो रहा पलायन स्वतः ही रुक जाएगा।
दो दशकों की मेहनत: सेलाकुई संस्थान (CAP) की सराहना
कृषि मंत्री गणेश जोशी ने सेलाकुई स्थित सगंध पौधा केंद्र (CAP) की पीठ थपथपाते हुए कहा कि पिछले दो दशकों (20 वर्षों) में इस संस्थान ने उत्तराखंड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है। शोध, व्यावहारिक प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के मामले में इस संस्थान ने प्रयोगशाला (Lab) से लेकर जमीन (Land) तक की दूरी को मिटाया है।
इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में न केवल भारत के विभिन्न राज्यों के वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया, बल्कि कई विदेशी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भी शिरकत की। कृषि मंत्री ने इन सभी विशेषज्ञों को सम्मानित किया और उम्मीद जताई कि इस सेमिनार से दालचीनी की उन्नत खेती, आधुनिक प्रसंस्करण, कोल्ड चेन मैनेजमेंट और अंतरराष्ट्रीय विपणन (Global Marketing) के नए रास्ते खुलेंगे। कार्यक्रम के समापन पर उन्होंने औषधीय और सगंध पौधों से तैयार किए गए विभिन्न हर्बल उत्पादों, इत्र और एसेंशियल ऑयल्स के स्टॉल का बारीकी से निरीक्षण किया और उनकी वैश्विक ब्रांडिंग पर जोर दिया।
बंजर खेतों में लौटेगी खुशहाली
पहाड़ की खेती हमेशा से ही मौसम की मार और जंगली जानवरों के डर के साए में रही है। ऐसे में उत्तराखंड महक क्रांति नीति 2026 सिर्फ एक कागजी सरकारी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों के उन खाली हो चुके गांवों के लिए एक नई उम्मीद की किरण है, जहां कभी रौनक हुआ करती थी। दालचीनी की महक और सगंध पौधों की खेती जब उत्तराखंड की वादियों में फैलेगी, तो यह न केवल देश की तिजोरी को समृद्ध करेगी, बल्कि देवभूमि के हमारे मेहनतकश किसानों के जीवन में भी असली ‘सुगंध’ और खुशहाली लेकर आएगी। सरकार का यह कदम निश्चित रूप से नए उत्तराखंड के निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम है।
