
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक व्यवस्था, युवाओं के रोजगार और मानवाधिकारों से जुड़े तीन बेहद महत्वपूर्ण मामलों में अपना कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता की अगुवाई वाली खंडपीठ ने मृतक आश्रित कोटे के तहत एक सीजनल अमीन के बेटे को नौकरी देने के खिलाफ दायर राज्य सरकार की विशेष अपील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने सरकार की इस कानूनी कसरत को ‘कानून का दुरुपयोग’ करार दिया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उत्तराखंड संयुक्त राज्य कनिष्ठ अभियंता सेवा परीक्षा 2023 और जेलों में बंद आजीवन कारावास के कैदियों की रिहाई को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
मामला 1: मृतक आश्रित कोटे पर सरकार की विशेष अपील खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- ‘यह कानून का दुरुपयोग’
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने साफ किया कि एकलपीठ का पूर्व में दिया गया आदेश पूरी तरह न्यायसंगत था और उसमें किसी भी प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। दरअसल, यह पूरा मामला नैनीताल जिला कार्यालय में कार्यरत रहे सीजनल कलेक्शन अमीन भगवान सिंह बिष्ट से जुड़ा है।
क्या था पूरा कानूनी विवाद?
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11 साल का लंबा संघर्ष: साल 1998 में भगवान सिंह बिष्ट सहित अन्य सीजनलCollection अमीनों ने अपने विनियमितीकरण (नियमितीकरण) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
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सरकार की पहली हार: उत्तर प्रदेश और बाद में उत्तराखंड सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन साल 2009 में सरकार की विशेष अपील खारिज हो गई, जिससे अमीनों के नियमित होने का रास्ता साफ हुआ।
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आदेश से ठीक पहले निधन: नियमितीकरण का अंतिम सरकारी आदेश जारी होने से ठीक पहले भगवान सिंह बिष्ट का दुर्भाग्यवश निधन हो गया।
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बेटे की कानूनी लड़ाई: पिता की मृत्यु के बाद उनके स्नातकोत्तर (Post Graduate) शिक्षित बेटे घनश्याम सिंह ने मृतक आश्रित कोटे के तहत अपनी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप सरकारी नौकरी के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
एकलपीठ के आदेश पर सरकार ने लगाया डेढ़ साल का वक्त
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने घनश्याम सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार को उनकी उच्च योग्यता के अनुसार पद देने का निर्देश दिया था। संवेदनशील और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत, सरकार ने इस आदेश के खिलाफ करीब डेढ़ साल की लंबी देरी के बाद खंडपीठ में विशेष अपील दायर की।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि खुद जिलाधिकारी नैनीताल ने इस विशेष अपील को वापस लेने के निर्देश दिए थे, लेकिन सरकारी तंत्र मुकदमेबाजी को खींचने में लगा रहा। खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को पूरी तरह अतार्किक मानते हुए विशेष अपील को निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि आश्रित को उसकी योग्यता के अनुसार नौकरी मिलनी ही चाहिए।
मामला 2: कनिष्ठ अभियंता सेवा परीक्षा 2023; ‘रूल्स ऑफ द गेम’ बदलने का दावा खारिज, दिव्यांग अभ्यर्थियों को झटका
हाईकोर्ट की इसी खंडपीठ ने उत्तराखंड संयुक्त राज्य कनिष्ठ अभियंता सेवा परीक्षा 2023 से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में दिव्यांग श्रेणी के दो अभ्यर्थियों की विशेष अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (UKPSC) की ओर से निर्धारित किए गए न्यूनतम अर्हकारी अंकों (Minimum Qualifying Marks) को पूरी तरह वैध माना है। क्या थे अभ्यर्थियों के तर्क और कोर्ट का फैसला?
अपीलकर्ता शिवानी सैनी और अन्य ने अदालत में दलील दी थी कि परीक्षा प्रक्रिया संपन्न होने के बाद आयोग ने 11 मार्च 2024 को दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम कट-ऑफ अंक लागू किए। उनका आरोप था कि दस्तावेज सत्यापन (Document Verification) के लिए बुलाए जाने के बाद उन्हें अंतिम चयन सूची से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है तथा यह ‘खेल के बीच में नियम बदलने’ जैसा है।
न्यायालय ने आयोग के रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया:
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नियम पहले से तय थे: आयोग ने साबित किया कि न्यूनतम अर्हकारी अंक की व्यवस्था वर्ष 2012 और 2022 की विनियमावली में पहले से मौजूद थी और भर्ती विज्ञापन के परिशिष्ट 4 में भी इसका स्पष्ट उल्लेख था।
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संशोधन से अभ्यर्थियों को फायदा हुआ, नुकसान नहीं: कोर्ट ने कहा कि 11 मार्च 2024 के संशोधन से कट-ऑफ को और कम किया गया था, न कि बढ़ाया गया था। ‘रूल्स ऑफ द गेम’ बदलने का सिद्धांत तभी लागू होता है जब उम्मीदवारों को कोई वास्तविक नुकसान हुआ हो।
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सत्यापन चयन की गारंटी नहीं: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि दस्तावेज सत्यापन की सूची में नाम आना अंतिम चयन का वैधानिक अधिकार नहीं देता, यह भर्ती की केवल एक अंतरिम प्रक्रिया है। चूंकि दोनों अभ्यर्थी न्यूनतम योग्यता अंक (क्रमशः 12.17% और 9.72%) से बेहद नीचे थे, इसलिए आयोग का उन्हें बाहर करने का फैसला पूरी तरह कानूनी रूप से वैध है।
मामला 3: समय पूरा कर चुके आजीवन कारावास के कैदियों की रिहाई पर सरकार से जवाब तलब
मानवाधिकारों और न्यायिक आदेशों के अनुपालन को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने राज्य की विभिन्न जेलों में आजीवन कारावास की सजा पूरी कर चुके कैदियों को सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद रिहा न किए जाने के मामले पर सुनवाई की।
अदालत ने इस संबंध में दर्ज स्वतः संज्ञान (Suo Motu) वाली जनहित याचिका सहित कई कैदियों की व्यक्तिगत याचिकाओं को एक साथ संबद्ध करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने सरकार को दो हफ्ते की सख्त मोहलत देते हुए पूछा है कि जिन कैदियों ने रिहाई के लिए पात्रता हासिल कर ली है और याचिकाएं दायर की हैं, उन्हें अब तक जेलों में किस आधार पर और किस कारण से रोक कर रखा गया है? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाए, जिसके बाद मामले की अगली सुनवाई होगी।
कानून और जवाबदेही के धरातल पर सरकार को आत्मचिंतन की जरूरत
नैनीताल हाईकोर्ट के ये तीनों फैसले राज्य की प्रशासनिक और विधायी कार्यप्रणाली पर गहरा असर डालने वाले हैं। जहां एक तरफ मृतक आश्रित कोटे के तहत एक युवा को रोजगार देने में सरकार की हीलाहवाली को अदालत ने कड़ा सबक सिखाया है, वहीं कनिष्ठ अभियंता सेवा परीक्षा के माध्यम से यह संदेश भी दिया है कि योग्यता के तय मानकों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, सजा पूरी कर चुके कैदियों की रिहाई पर हाईकोर्ट की सख्ती यह याद दिलाती है कि न्याय केवल सजा देने में नहीं, बल्कि समय पर कानूनी अधिकार और स्वतंत्रता देने में भी समाहित है।



