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उत्तराखंड हाईकोर्ट की पुलिस को सख्त फटकार: प्रभात ध्यानी की ट्रेन से गिरफ्तारी पर पूछा- क्या नागरिकों की स्वतंत्रता छीन ली गई है?

The Hill India News
Last updated: July 21, 2026 1:17 pm
The Hill India News
Published: July 21, 2026
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नैनीताल: नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पुलिस की कार्यप्रणाली और मौलिक अधिकारों के हनन को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक मामले में कड़ा रुख अपनाया है। ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को चलती ट्रेन के डिब्बे से जबरन उठाकर हिरासत में लेने के मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लिया है।

Contents
क्या है पूरा मामला? संसद से लेकर बॉर्डर तक अलर्ट का असरहाईकोर्ट में याचिका: परिवार की चिंता और मौलिक अधिकारों का हननसरकार की सफाई: दिल्ली पुलिस के नोटिस का दिया हवालाहाईकोर्ट के तीखे सवाल: “आपको कैसे पता कि वे प्रोटेस्ट में ही जा रहे थे?”नागरिकों की आजादी बनाम पुलिस की शक्तियां

न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार सहित सभी संबंधित पक्षकारों को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 सितंबर की तिथि तय की है।

क्या है पूरा मामला? संसद से लेकर बॉर्डर तक अलर्ट का असर

मामले के अनुसार, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (उप्प) के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी 19 जुलाई की शाम ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से ट्रेन में सवार होकर दिल्ली जा रहे थे। उनकी यात्रा का उद्देश्य प्रसिद्ध पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन तथा छात्रों की शिक्षा संबंधी मांगों को लेकर दिल्ली में आयोजित विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना था। प्रभात ध्यानी ने इस संबंध में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी साझा की थी, जिसमें उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली जाने की जानकारी दी थी।

हालांकि, ट्रेन रवाना होने से पहले ही उत्तराखंड पुलिस अचानक रेल के डिब्बे में दाखिल हुई और प्रभात ध्यानी को जबरन अपने साथ ले गई। इसके बाद उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर रखा गया, उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया और परिवारजनों को उनकी कोई जानकारी नहीं दी गई।

हाईकोर्ट में याचिका: परिवार की चिंता और मौलिक अधिकारों का हनन

प्रभात ध्यानी के इस तरह अचानक गायब किए जाने और पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय सचिव लाल मणि ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि एक वयस्क और जिम्मेदार नागरिक को बिना किसी ठोस आपराधिक आधार के रेलवे स्टेशन से इस तरह हिरासत में लेना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रभात ध्यानी नियमित स्वास्थ्य जांच कराने के उद्देश्य से भी जा रहे थे। पुलिस द्वारा उनका फोन छीन लेने और किसी अज्ञात स्थान पर ले जाने से उनके परिजनों को अत्यधिक मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। याचिका में मांग की गई कि बिना किसी वैध कारण के इस प्रकार की कार्रवाई करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

सरकार की सफाई: दिल्ली पुलिस के नोटिस का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने घटना की स्थिति स्पष्ट करते हुए अदालत को बताया कि पुलिस ने प्रभात ध्यानी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 172 के तहत एहतियातन कार्रवाई की है।

राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि प्रभात ध्यानी दिल्ली में छात्रों और सीजेपी (Citizens for Justice and Peace) के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने जा रहे थे। इस संबंध में दिल्ली पुलिस ने एक एडवाइजरी जारी कर सभी राज्यों की पुलिस को नोटिस भेजा था। इस नोटिस में कहा गया था कि जो भी व्यक्ति दिल्ली में आयोजित होने वाले इस बड़े विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहा हो, उन्हें संबंधित राज्य अपने ही बॉर्डर इलाकों में रोक दें। सरकार का दावा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया।

हाईकोर्ट के तीखे सवाल: “आपको कैसे पता कि वे प्रोटेस्ट में ही जा रहे थे?”

राज्य सरकार की दलीलों पर असंतोष व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत की टिप्पणी ने पुलिसिया तंत्र के अधिकारों की सीमा पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया।

खंडपीठ ने राज्य सरकार से सीधे सवाल पूछे:

  • “आखिर किस नियम के तहत और किस अपराध के आधार पर एक नागरिक को चलती रेल से उठा लिया गया?”

  • “आपको यह कैसे निश्चित रूप से पता चला कि वे केवल विरोध प्रदर्शन में ही शामिल होने जा रहे थे?”

  • “क्या यह देश के आम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं है? क्या अब नागरिक अपनी मर्जी से कहीं आ-जा भी नहीं सकते?”

अदालत के इन कड़े सवालों ने स्पष्ट कर दिया कि किसी एडवाइजरी या आशंका के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों और आवाजाही की आजादी पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती।

नागरिकों की आजादी बनाम पुलिस की शक्तियां

नैनीताल हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश भर में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और आवाजाही के अधिकारों पर प्रशासनिक बंदिशों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। किसी राजनीतिक या सामाजिक कार्यकर्ता को केवल इस आधार पर यात्रा करने से रोकना कि वह किसी प्रदर्शन में शामिल हो सकता है, लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 16 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि दिल्ली पुलिस की एडवाइजरी के नाम पर राज्य पुलिस द्वारा की गई यह कार्रवाई कानून के दायरे में थी या यह अधिकारों का अतिक्रमण था। फिलहाल, हाईकोर्ट के कड़े रुख से राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन बैकफुट पर नजर आ रहा है।

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TAGGED:Nainital High Court police strict remarkPrabhat Dhyani Rishikesh railway station arrestSonam Wangchuk Delhi protest arrestUttarakhand High Court Prabhat Dhyani caseUttarakhand Parivartan Party protest news
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