नई दिल्ली। दुनिया का नक्शा अब पहले जैसा नजर नहीं आएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को पारित हुए एक अहम प्रस्ताव के बाद दुनिया के नक्शे में इस्तेमाल होने वाली मानचित्र प्रणाली को लेकर बड़ा बदलाव शुरू होने जा रहा है। इस प्रस्ताव का मकसद दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों और क्षेत्रों को उनके वास्तविक भौगोलिक आकार के ज्यादा करीब दिखाना है। खास तौर पर अफ्रीका को लेकर लंबे समय से उठाए जा रहे सवालों के बीच संयुक्त राष्ट्र ने ‘Correct the Map’ प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दी है।
अफ्रीकी देश टोगो की अगुवाई में लाए गए इस प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट दिया और छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। प्रस्ताव में समान-क्षेत्रफल वाले मानचित्रों, विशेष रूप से Equal Earth projection, को बढ़ावा देने की बात कही गई है। हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यानी दुनिया के सभी देशों को तुरंत अपना हर नक्शा बदलना अनिवार्य नहीं होगा, लेकिन संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला स्कूलों, शैक्षणिक संस्थानों, प्रकाशकों, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिक सटीक मानचित्रों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आखिर नक्शे में अफ्रीका छोटा क्यों दिखाई देता है?
जिस नक्शे को दुनिया पिछले कई दशकों से किताबों, स्कूलों और डिजिटल माध्यमों पर देखती आई है, उसका बड़ा हिस्सा मर्केटर प्रोजेक्शन पर आधारित है। इसे 16वीं शताब्दी में फ्लेमिश मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर ने विकसित किया था। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री यात्रा और नौवहन को आसान बनाना था।
मर्केटर प्रोजेक्शन में धरती की गोलाकार सतह को एक सपाट नक्शे पर दिखाया जाता है। इस प्रक्रिया में भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार बढ़ता हुआ दिखाई देता है। इसी वजह से यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे उत्तरी क्षेत्रों का आकार वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में बहुत बड़ा नजर आता है, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं।
सबसे चर्चित उदाहरण अफ्रीका और ग्रीनलैंड का है। पारंपरिक मर्केटर नक्शे में दोनों का आकार लगभग समान दिखाई दे सकता है, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। यही अंतर ‘Correct the Map’ अभियान के केंद्र में रहा है।
अब क्या बदलेगा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने जिस प्रस्ताव को मंजूरी दी है, उसमें दुनिया के नक्शे को अधिक वास्तविक भौगोलिक अनुपात में दिखाने वाली प्रणालियों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया गया है। इनमें Equal Earth projection प्रमुख है। यह ऐसी मानचित्र प्रणाली है जिसमें महाद्वीपों के क्षेत्रफल को उनके वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाने का प्रयास किया जाता है।
इसका सबसे बड़ा दृश्य प्रभाव अफ्रीका पर नजर आएगा। नए प्रकार के मानचित्र में अफ्रीका उतना छोटा और सिकुड़ा हुआ दिखाई नहीं देगा, जितना वह मर्केटर प्रोजेक्शन में नजर आता है। इसके साथ ही यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ध्रुवीय क्षेत्रों के आसपास के कई हिस्से भी अपने वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात में अलग आकार में दिखाई देंगे।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि अफ्रीका का वास्तविक क्षेत्रफल बढ़ जाएगा। अफ्रीका पहले भी उतना ही बड़ा था और आगे भी उतना ही बड़ा रहेगा। बदलाव सिर्फ इस बात में होगा कि उसे नक्शे पर किस अनुपात में दिखाया जाता है।
टोगो की पहल को मिला भारी अंतरराष्ट्रीय समर्थन
‘Correct the Map’ अभियान को अफ्रीकी देशों ने एक महत्वपूर्ण पहल के तौर पर आगे बढ़ाया। टोगो ने इस प्रस्ताव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने में नेतृत्व किया और अफ्रीकी समूह के समर्थन को जुटाया। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पारित होने के बाद अफ्रीकी संघ ने भी इसका स्वागत किया और टोगो की भूमिका की सराहना की। अफ्रीकी संघ के अनुसार मर्केटर प्रोजेक्शन वास्तविक क्षेत्रफल को सही तरीके से नहीं दर्शाता और इससे अफ्रीका समेत कुछ अन्य क्षेत्रों की भौगोलिक छवि प्रभावित होती है।
अफ्रीकी संघ ने अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, शिक्षा व्यवस्था, प्रकाशकों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों से ऐसे मानचित्रों को धीरे-धीरे अपनाने का आग्रह किया है, जो दुनिया के क्षेत्रों के वास्तविक भू-क्षेत्रफल को ज्यादा सटीक तरीके से दिखाते हों।
अमेरिका ने क्यों किया विरोध?
जहां 164 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, वहीं अमेरिका ने इसका विरोध किया। अमेरिकी पक्ष ने इस प्रस्ताव को वैचारिक एजेंडे से जुड़ा बताया और कहा कि संयुक्त राष्ट्र को वैश्विक शांति, समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। इस तरह मतदान के दौरान अमेरिका प्रस्ताव के खिलाफ जाने वाला एकमात्र देश रहा।
हालांकि, प्रस्ताव के भारी बहुमत से पारित होने के बाद इसके समर्थकों ने इसे मानचित्रों में लंबे समय से मौजूद भौगोलिक विकृतियों को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
क्या अब Google Maps और सभी नक्शे तुरंत बदल जाएंगे?
यह सवाल भी सबसे ज्यादा चर्चा में है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का मतलब यह नहीं है कि अगले दिन से दुनिया के हर नक्शे को बदल दिया जाएगा। प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। इसका उद्देश्य देशों, संस्थानों, शिक्षा व्यवस्था और तकनीकी कंपनियों को अधिक सटीक समान-क्षेत्रफल वाले मानचित्रों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
साथ ही, मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल पूरी तरह समाप्त नहीं हो रहा है। समुद्री और हवाई नौवहन जैसे कुछ विशेष तकनीकी उपयोगों में इसकी उपयोगिता बनी हुई है। इसलिए भविष्य में अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग प्रकार के मानचित्रों का इस्तेमाल जारी रह सकता है।
स्कूलों की किताबों से लेकर डिजिटल दुनिया तक पड़ सकता है असर
इस फैसले का सबसे बड़ा असर शिक्षा और आम लोगों की दुनिया को देखने की समझ पर पड़ सकता है। अगर स्कूलों की किताबों, एटलस, समाचार संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब वाले मानचित्रों का इस्तेमाल बढ़ता है, तो आने वाली पीढ़ियां दुनिया के देशों और महाद्वीपों के आकार को अलग नजरिए से देखेंगी।
टोगो ने संकेत दिया है कि वह अपने स्कूलों की भूगोल संबंधी सामग्री में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। इसके साथ ही अभियान से जुड़े लोग अन्य देशों, शैक्षणिक संस्थानों और तकनीकी कंपनियों को भी समान-क्षेत्रफल वाले मानचित्रों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
क्या यह सिर्फ नक्शे का बदलाव है या सोच बदलने की कोशिश?
‘Correct the Map’ अभियान के समर्थकों का कहना है कि मामला सिर्फ कागज पर बनी कुछ रेखाओं और आकृतियों का नहीं है। नक्शे दुनिया के बारे में हमारी शुरुआती समझ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब किसी महाद्वीप को लगातार वास्तविक आकार से बहुत छोटा दिखाया जाता है, तो इससे उसके वैश्विक महत्व और भौगोलिक स्थिति को लेकर लोगों की धारणा भी प्रभावित हो सकती है।
अफ्रीकी देशों ने इस पहल को औपनिवेशिक दौर की विरासत और दुनिया में अफ्रीका की वास्तविक स्थिति को सही तरीके से प्रस्तुत करने की व्यापक कोशिश से भी जोड़ा है। हालांकि टोगो ने स्पष्ट किया है कि यह अभियान किसी एक देश या महाद्वीप के खिलाफ नहीं है, बल्कि दुनिया के भौगोलिक आकार को ज्यादा सटीक तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास है।
दुनिया का नक्शा बदलेगा, लेकिन दुनिया नहीं
संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला निश्चित तौर पर ऐतिहासिक महत्व रखता है, लेकिन इसे समझने के लिए एक बात बेहद जरूरी है—दुनिया का वास्तविक भूगोल नहीं बदला है, बल्कि उसे दिखाने के तरीके को बदलने की पहल हुई है।
अफ्रीका कल भी उतना ही बड़ा था, आज भी उतना ही बड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब दुनिया के नक्शे पर उसके वास्तविक आकार को ज्यादा सही अनुपात में दिखाने की कोशिश की जाएगी। 164 देशों के समर्थन से पारित ‘Correct the Map’ प्रस्ताव ने इस बहस को वैश्विक स्तर पर नई दिशा दे दी है।
