
इम्फाल/बिष्णुपुर: पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर एक बार फिर हिंसा और अशांति की आग में झुलस रहा है। 7 अप्रैल को बिष्णुपुर जिले में हुए एक शक्तिशाली बम धमाके ने न केवल दो मासूम बच्चों की जान ले ली, बल्कि पूरी घाटी के धैर्य का बांध भी तोड़ दिया है। इस हृदयविदारक घटना के विरोध में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं, जिससे राज्य का सुरक्षा ढांचा और प्रशासनिक नियंत्रण एक बार फिर कड़ी परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। गुरुवार की शाम से शुरू हुई विरोध की यह तपिश अब मुख्यमंत्री आवास और पुलिस मुख्यालय के दरवाजों तक पहुँच चुकी है।
खुरई लामलॉन्ग में आधी रात का संग्राम
शुक्रवार की रात इम्फाल पूर्व के खुरई लामलॉन्ग बाजार में स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन द्वारा लगाए गए सख्त कर्फ्यू को धता बताते हुए विशाल मशाल जुलूस निकाला। इन रैलियों की कमान मुख्य रूप से महिलाओं (मीरा पैबिस) के हाथों में थी, जो न्याय की मांग को लेकर नारेबाजी कर रही थीं।
जैसे ही सुरक्षा बलों ने भीड़ को रोकने की कोशिश की, हालात हिंसक झड़प में बदल गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उत्तेजित भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोले और रबर बमों का सहारा लेना पड़ा। इस दौरान हुई अफरा-तफरी में कई प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं, जिन्हें तत्काल उपचार के लिए जवाहरलाल नेहरू आयुर्विज्ञान संस्थान (JNIMS) में भर्ती कराया गया है। मणिपुर हिंसा और विरोध प्रदर्शन की यह लहर अब शहर के हर कोने में महसूस की जा रही है।
एनआईए (NIA) को जांच, लेकिन जनता का अविश्वास बरकरार
ट्रोंगलाओबी और बिष्णुपुर की घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी है। हालांकि, नागरिक समाज संगठनों (CSOs) और पीड़ित परिवारों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। लोगों का स्पष्ट कहना है कि जांच केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो नजीर बने।
नागरिक समाज संगठनों ने सरकार को सख्त चेतावनी दी है कि यदि बच्चों की हत्या के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप धारण करेगा। आंदोलनकारियों का तर्क है कि मासूम बच्चों को निशाना बनाना कायरता की पराकाष्ठा है और समाज इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।
कर्फ्यू की जकड़ में घाटी: इंटरनेट और शिक्षण संस्थान ठप
बिगड़ते हालात को देखते हुए इम्फाल पूर्व, इम्फाल पश्चिम, थौबल और काकचिंग जिलों में प्रशासन ने सख्त कर्फ्यू लागू कर दिया है। हालांकि, आवश्यक सेवाओं के लिए सुबह 5 बजे से शाम 5 बजे तक ढील दी गई है, लेकिन बिष्णुपुर जिले में स्थिति अधिक गंभीर है। बिष्णुपुर में कर्फ्यू में ढील केवल सुबह 5 बजे से 10 बजे तक ही दी जा रही है।
शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरे घाटी क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है। शिक्षण संस्थान बंद हैं और सड़कों पर सेना व अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती की गई है। इसके बावजूद, बिष्णुपुर बाजार और प्रमुख मार्गों पर प्रदर्शनकारियों ने जाम लगाकर आवाजाही को पूरी तरह बाधित कर दिया है।
महिलाओं का नेतृत्व और सुरक्षा बलों की चुनौती
मणिपुर की इस नई अशांति में एक बार फिर महिलाओं की शक्ति अग्रिम पंक्ति में नजर आ रही है। “न्याय मिलने तक पीछे नहीं हटेंगे”—इस संकल्प के साथ महिलाएं रात-रात भर सड़कों पर पहरा दे रही हैं और मशाल जुलूस निकाल रही हैं। सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे भीड़ को नियंत्रित करने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का भी ध्यान रखें, क्योंकि प्रदर्शनकारियों में बड़ी संख्या में माताएं और बुजुर्ग महिलाएं शामिल हैं।
बिष्णुपुर के स्थानीय निवासी बताते हैं कि 7 अप्रैल की उस घटना ने लोगों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता आशंकित हैं और इसी असुरक्षा के भाव ने इस बड़े जनांदोलन को जन्म दिया है।
समाधान की राह कठिन
मणिपुर हिंसा और विरोध प्रदर्शन का यह ताजा दौर राज्य सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन गया है। घाटी में गहराता अविश्वास और लगातार होती झड़पें संकेत दे रही हैं कि केवल बल प्रयोग से शांति बहाल नहीं की जा सकती। जब तक सरकार और एनआईए जांच के ठोस नतीजे सामने नहीं लाते, तब तक मणिपुर की सड़कों पर मशालों की यह रोशनी बुझती नहीं दिख रही है।
आने वाले दिन मणिपुर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। क्या प्रशासन जनता के गुस्से को शांत कर पाएगा या फिर मासूमों की मौत का यह मुद्दा राज्य को एक और बड़े जातीय या सामाजिक संघर्ष की ओर धकेल देगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर पूरे देश की निगाहें तलाश रही हैं।


