उत्तराखंडफीचर्ड

रुद्रप्रयाग में वन तस्करों के हौसले बुलंद: मदमहेश्वर घाटी में हरे-भरे चीड़ के पेड़ों पर चली कुल्हाड़ी; विभाग में हड़कंप

रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में ‘ग्रीन गोल्ड’ कही जाने वाली वन संपदा पर एक बार फिर तस्करों की काली नजर पड़ी है। रुद्रप्रयाग जनपद के अंतर्गत मदमहेश्वर घाटी की शांत वादियों में चीड़ के पेड़ों के अवैध कटान का एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। तस्करों ने न केवल मुख्य मोटर मार्ग, बल्कि एक सरकारी शैक्षणिक संस्थान के परिसर के भीतर खड़े वृक्षों को भी अपना निशाना बनाया है। इस घटना ने क्षेत्र के पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय प्रशासन की नींद उड़ा दी है।

स्कूल परिसर और मुख्य मार्ग पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मदमहेश्वर घाटी स्थित राजकीय इंटर कॉलेज (जीआईसी) राउलैक परिसर और ऊखीमठ–रासी मोटर मार्ग के किनारे खड़े कई कीमती चीड़ के पेड़ों को बेरहमी से काट दिया गया है। चीड़ के ये पेड़ न केवल क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता का हिस्सा थे, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

आश्चर्यजनक बात यह है कि यह पूरा घटनाक्रम दिनदहाड़े और बिना किसी वैधानिक अनुमति के अंजाम दिया गया। रुद्रप्रयाग अवैध वन कटान की इस वारदात ने वन विभाग की गश्त और खुफिया तंत्र पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस तरह से योजनाबद्ध तरीके से पेड़ों का पातन किया गया है, उससे यह किसी संगठित गिरोह की करतूत प्रतीत होती है।


वन विभाग की त्वरित कार्रवाई: गुप्तकाशी यूनिट रवाना

जैसे ही यह मामला वन विभाग के संज्ञान में आया, विभाग के भीतर खलबली मच गई। आनन-फानन में रुद्रप्रयाग वन प्रभाग की गुप्तकाशी यूनिट को सक्रिय किया गया। वन दरोगा अभिषेक नेगी ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि सूचना मिलते ही विभाग ने एक विशेष टीम का गठन कर उसे मौके के लिए रवाना कर दिया है।

अभिषेक नेगी ने मीडिया को बताया:

“हमारी टीम घटनास्थल पर पहुँचकर कटे हुए पेड़ों की संख्या का आकलन कर रही है। विभाग की ओर से इस क्षेत्र में कटान के लिए कोई भी अनुमति (Permit) जारी नहीं की गई थी। यह पूरी तरह से एक गैर-कानूनी कृत्य है और इस मामले की गहनता से पड़ताल की जा रही है।”


स्थानीय निवासियों का आक्रोश और सुरक्षा पर सवाल

मदमहेश्वर घाटी के निवासियों में इस घटना को लेकर गहरा रोष व्याप्त है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि वन विभाग और स्थानीय प्रशासन समय-समय पर क्षेत्रों की निगरानी करता, तो तस्करों की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वे सड़क किनारे और स्कूल जैसे सार्वजनिक स्थानों से पेड़ों को काट ले जाते।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि ऊखीमठ–रासी मोटर मार्ग एक व्यस्त मार्ग है, इसके बावजूद पेड़ों का कटान होना प्रशासन की नाक के नीचे वन संपदा की चोरी का प्रमाण है। लोगों ने मांग की है कि केवल जांच के नाम पर खानापूर्ति न की जाए, बल्कि उन प्रभावशाली लोगों की भी पहचान की जाए जो इन तस्करों को संरक्षण दे रहे हैं।


पर्यावरणविदों की चिंता: पारिस्थितिकी तंत्र पर बड़ा खतरा

उत्तराखंड के पर्यावरणविदों ने भी इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका तर्क है कि हिमालयी क्षेत्रों में एक वृक्ष को बड़ा होने में दशकों लग जाते हैं। चीड़ के पेड़ न केवल भू-कटाव को रोकने में सहायक होते हैं, बल्कि वे वन्यजीवों के आवास का भी हिस्सा हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि मदमहेश्वर घाटी जैसे संवेदनशील पर्यटन क्षेत्र में इस तरह का रुद्रप्रयाग अवैध वन कटान न केवल भविष्य में भूस्खलन के खतरे को बढ़ाएगा, बल्कि क्षेत्र की जलवायु पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने सरकार से मांग की है कि दोषियों के खिलाफ ‘कठोर वन अधिनियम’ के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाए, ताकि भविष्य में कोई ऐसी हिमाकत न कर सके।


जांच के घेरे में विभागीय लापरवाही?

इस घटना ने एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों में वन संपदा की सुरक्षा के बुनियादी ढांचे पर सवाल उठा दिए हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या वन तस्करों को विभागीय कर्मचारियों का मौन समर्थन प्राप्त है? या फिर संसाधनों की कमी के कारण विभाग इतनी बड़ी वारदात से बेखबर रहा?

वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि दोषियों की पहचान करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों का सहारा लिया जाएगा और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों को कानून के कठघरे में लाया जाए।


क्या सुरक्षित है उत्तराखंड की वन संपदा?

मदमहेश्वर घाटी का यह मामला केवल कुछ पेड़ों के कटान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है। सरकारी स्कूल परिसर जैसे सुरक्षित स्थान पर यदि वृक्ष सुरक्षित नहीं हैं, तो दुर्गम जंगलों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अब सबकी नजरें वन विभाग की रिपोर्ट और पुलिस की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या प्रशासन इन तस्करों के नेटवर्क को ध्वस्त कर पाएगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button