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हरिद्वार में रिश्तों की आड़ में ‘डिजिटल डकैती’: बेटे की मौत का गम मना रहे बुजुर्ग के खाते से उड़ाए 24 लाख; मुंहबोली बहन पर आरोप

हरिद्वार (धर्मनगरी): उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों के विश्वास को झकझोर कर रख दिया है। श्यामपुर कोतवाली क्षेत्र के कांगड़ी गांव में एक महिला ने अपने ही मुंहबोले भाई की मौत के बाद उसके शोक संतप्त पिता के साथ विश्वासघात करते हुए उनके बैंक खाते से 24 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि पार कर दी। इस ‘डिजिटल डकैती’ को मोबाइल यूपीआई (UPI) के जरिए अंजाम दिया गया, जिसे सुनकर खुद पुलिस प्रशासन भी हैरान है।

शोक का फायदा और विश्वास का घात

घटना की पृष्ठभूमि बेहद भावुक और दर्दनाक है। कांगड़ी गांव निवासी बलवान सिंह के पुत्र संदीप ने गांव में ही रहने वाली हरियाणा मूल की एक महिला को अपनी धर्म बहन बनाया था। रिश्तों की यह डोर तब तक अटूट रही जब तक संदीप जीवित था। दुर्भाग्यवश, बीती 5 मार्च को पारिवारिक कलह के चलते संदीप ने आत्मघाती कदम उठाया और उपचार के दौरान एम्स ऋषिकेश में उसकी मृत्यु हो गई।

जहाँ एक ओर बलवान सिंह का परिवार जवान बेटे की मौत के गम में डूबा था, वहीं दूसरी ओर उनकी मुंहबोली बेटी, उसका पति अनिल और बेटा मोहित सहानुभूति के बहाने उनके घर में पैठ बनाने लगे। पीड़ित बलवान सिंह को अंदाजा भी नहीं था कि सांत्वना देने वाले ये हाथ उनके जीवन की जमा-पूंजी पर नजर गड़ाए हुए हैं।


मोबाइल खराब होने का बहाना और शातिर साजिश

आरोप है कि महिला ने बड़े ही शातिर तरीके से बलवान सिंह को अपने जाल में फंसाया। उसने अपना मोबाइल खराब होने का बहाना बनाया और पीड़ित का स्मार्टफोन इस्तेमाल करने के लिए मांग लिया। चूंकि बलवान सिंह उसे अपनी बहू जैसा सम्मान देते थे, इसलिए उन्होंने बिना किसी संदेह के अपना फोन उसे सौंप दिया।

यहीं से शुरू हुआ हरिद्वार मोबाइल यूपीआई ठगी का वह सिलसिला, जिसने पीड़ित को आर्थिक रूप से कंगाल कर दिया। बलवान सिंह का बैंक खाता उनके मोबाइल नंबर से लिंक था और फोन में डिजिटल पेमेंट एप्स (UPI) पहले से ही सक्रिय थे। महिला और उसके परिवार ने फोन का एक्सेस मिलते ही धीरे-धीरे ट्रांजेक्शन शुरू कर दिए।


24 लाख रुपये का डिजिटल ट्रांजेक्शन: बैंक पहुंचने पर खुला राज

इस धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब 13 अप्रैल को बलवान सिंह कुछ जरूरी काम के लिए बैंक पहुंचे। जब उन्होंने अपने खाते का बैलेंस चेक किया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। बैंक अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उनके खाते से लगभग 24 लाख रुपये निकल चुके हैं।

बैंक स्टेटमेंट की जांच करने पर पता चला कि 14 मार्च से 12 अप्रैल के बीच—यानी उनके बेटे की मौत के मात्र नौ दिन बाद से ही—यूपीआई के जरिए रकम लगातार ट्रांसफर की जा रही थी। यह पैसा महिला, उसके पति और बेटे के खातों में किस्तों में भेजा गया। यही नहीं, आरोपियों ने पीड़ित की गाड़ी से उनका एटीएम कार्ड और पैन कार्ड भी चोरी कर लिया था ताकि भविष्य में भी वे खाते का उपयोग कर सकें।


पुलिस की कार्रवाई और कानूनी शिकंजा

जब बलवान सिंह ने आरोपियों से अपनी रकम के बारे में पूछा, तो उन्होंने न केवल पैसे देने से इनकार कर दिया बल्कि उन्हें डराने-धमकाने और बहाने बनाने शुरू कर दिए। हारकर पीड़ित ने श्यामपुर कोतवाली में न्याय की गुहार लगाई।

मामले की गंभीरता को देखते हुए श्यामपुर कोतवाली प्रभारी नितेश शर्मा ने तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। उन्होंने बताया:

“पीड़ित की तहरीर के आधार पर आरोपी महिला, उसके पति और बेटे के खिलाफ धोखाधड़ी और चोरी की संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस की एक विशेष टीम बैंक ट्रांजेक्शन और मोबाइल डेटा की जांच कर रही है। जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार कर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।”


डिजिटल युग में सावधानी की दरकार

यह घटना केवल एक ठगी का मामला नहीं है, बल्कि यह उन सभी के लिए एक चेतावनी है जो अपने मोबाइल और बैंकिंग क्रेडेंशियल्स को लेकर लापरवाह रहते हैं। हरिद्वार मोबाइल यूपीआई ठगी ने यह साबित कर दिया है कि अपराधी अब केवल अनजान बनकर नहीं, बल्कि अपनों का मुखौटा पहनकर भी आपके करीब आ सकते हैं।

साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे रिश्ता कितना भी करीबी क्यों न हो, कभी भी अपना मोबाइल फोन, पिन कोड या बैंकिंग दस्तावेज दूसरों को नहीं सौंपने चाहिए। विशेषकर बुजुर्गों को डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते समय अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है।


न्याय की उम्मीद में बुजुर्ग पिता

बेटे को खोने का गम झेल रहे बलवान सिंह के लिए यह आर्थिक चोट किसी सदमे से कम नहीं है। जिस महिला को उन्होंने बेटी माना, उसने ही उनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया। अब सबकी निगाहें हरिद्वार पुलिस पर टिकी हैं कि वह कितनी जल्दी इस जालसाज परिवार को सलाखों के पीछे भेजती है और पीड़ित की मेहनत की कमाई वापस दिला पाती है।

हरिद्वार का यह मामला एक बार फिर से समाज को ‘विश्वास’ और ‘सुरक्षा’ के बीच की महीन रेखा को समझने के लिए मजबूर करता है।

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