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उत्तर प्रदेशफीचर्ड

उत्तर प्रदेश: हाईकोर्ट का अहम फैसला, वैध जन्म प्रमाण पत्र को बिना रद्द किए अमान्य नहीं माना जा सकता, दाखिले से इनकार गैरकानूनी

The Hill India News
Last updated: April 18, 2026 4:35 am
The Hill India News
Published: April 18, 2026
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प्रयागराज से एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय सामने आया है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जन्म प्रमाण पत्र की वैधता और उसके कानूनी प्रभाव को लेकर स्पष्ट टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जारी किया गया कोई भी जन्म प्रमाण पत्र तब तक पूरी तरह वैध और मान्य रहेगा, जब तक उसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा रद्द नहीं किया जाता या उसमें जालसाजी साबित नहीं हो जाती।

Contents
दाखिले से इनकार पर पहुंचा मामला हाईकोर्टहाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणीमेडिकल रिपोर्ट पर भी कोर्ट की टिप्पणीशिक्षा के अधिकार का उल्लंघनभविष्य के मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशअदालत की अहम टिप्पणी

यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए दिया, जो कक्षा छह में दाखिले से संबंधित थी। याचिकाकर्ता विमल सिंह को जवाहर नवोदय विद्यालय में प्रवेश से इसलिए वंचित कर दिया गया था क्योंकि उनके जन्म प्रमाण पत्र पर संदेह जताया गया था। विद्यालय प्रशासन ने दावा किया कि उनकी जन्मतिथि प्रवेश की निर्धारित आयु सीमा के अनुरूप नहीं है।

दाखिले से इनकार पर पहुंचा मामला हाईकोर्ट

मामले के अनुसार, याची के जन्म प्रमाण पत्र में उसकी जन्मतिथि 1 जुलाई 2013 दर्ज थी। जबकि जवाहर नवोदय विद्यालय में कक्षा छह में प्रवेश के लिए निर्धारित आयु सीमा 1 मई 2013 से 30 जुलाई 2015 के बीच होनी चाहिए। इसी आधार पर विद्यालय प्रशासन ने संदेह जताते हुए दाखिला देने से इनकार कर दिया।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और यह दलील दी कि जब तक जन्म प्रमाण पत्र को विधिवत रूप से रद्द नहीं किया जाता, तब तक उसे वैध दस्तावेज़ माना जाना चाहिए। याची की ओर से यह भी कहा गया कि किसी भी वैधानिक प्राधिकरण द्वारा जारी दस्तावेज़ को केवल संदेह के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी भी वैधानिक प्रावधान के तहत जारी दस्तावेज़ को तब तक मान्य माना जाएगा, जब तक कि उसे रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाजी का प्रमाण न मिल जाए। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी अपने मनमाने संदेह के आधार पर ऐसे दस्तावेज़ों को खारिज नहीं कर सकते।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जन्म प्रमाण पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़, जो किसी अधिकृत संस्था द्वारा जारी किए जाते हैं, उनकी कानूनी मान्यता होती है और उन्हें केवल वैध प्रक्रिया के तहत ही चुनौती दी जा सकती है।

मेडिकल रिपोर्ट पर भी कोर्ट की टिप्पणी

मामले में विपक्षी पक्ष ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि हड्डियों की जांच के आधार पर आयु में छह महीने से लेकर एक वर्ष तक का अंतर हो सकता है। इसी आधार पर याची की आयु पर सवाल उठाया गया था।

हालांकि कोर्ट ने मेडिकल जांच की सीमाओं पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि हड्डियों के विकास (Bone Age Assessment) की जांच पूरी तरह सटीक नहीं होती और इसमें लगभग प्लस-माइनस दो वर्ष तक का अंतर संभव होता है। इसलिए केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर किसी वैध दस्तावेज़ को खारिज नहीं किया जा सकता।

शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जन्म प्रमाण पत्र को रद्द किए बिना दाखिले से इनकार करना शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है और प्रशासनिक संदेह के आधार पर उसे इससे वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने आदेश दिया कि याची को तत्काल प्रभाव से विद्यालय में प्रवेश दिया जाए, क्योंकि उसका जन्म प्रमाण पत्र वैध है और उसे अभी तक किसी भी सक्षम प्राधिकारी ने अमान्य घोषित नहीं किया है।

भविष्य के मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश

इस निर्णय के साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसे मामलों में केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर दस्तावेजों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि मेडिकल राय केवल तभी ली जा सकती है जब अन्य प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध न हों।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निम्नलिखित दस्तावेजों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए:

  • सक्षम प्राधिकारी या शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र या समकक्ष दस्तावेज
  • वह स्कूल जहां बच्चे ने पहली बार दाखिला लिया हो, वहां दर्ज जन्मतिथि और स्कूल प्रधानाचार्य द्वारा प्रमाणित रिकॉर्ड
  • नगर निगम, नगर पालिका या ग्राम पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र

अदालत ने यह भी कहा कि इन सभी दस्तावेजों का उचित सत्यापन आवश्यक है और उसके बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचा जाए।

अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने यह भी चिंता व्यक्त की कि हाल के समय में कई याचिकाओं में केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर वैध दस्तावेजों को चुनौती देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अदालत ने इसे गलत बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया न केवल कानून के खिलाफ है बल्कि बच्चों के शैक्षणिक अधिकारों को भी प्रभावित करती है।

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