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छोटे बच्चों पर मंडराता खतरा: एडेनोवायरस-एफ के नए वेरिएंट से बढ़ा डायरिया का जोखिम

The Hill India News
Last updated: April 14, 2026 5:45 am
The Hill India News
Published: April 14, 2026
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आज के समय में बच्चों की सेहत को लेकर एक नई और गंभीर चिंता सामने आई है। खासकर 5 साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया यानी वायरल गैस्ट्रोएंटेराइटिस के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। अब तक इस बीमारी के लिए मुख्य रूप से रोटावायरस को जिम्मेदार माना जाता था, लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक नए खतरे की पहचान की है—ह्यूमन एडेनोवायरस-एफ (HAdV-F)। इसके नए वेरिएंट और जेनेटिक बदलावों ने विशेषज्ञों की चिंता और बढ़ा दी है, क्योंकि यह बच्चों में दस्त और उल्टी की गंभीर समस्या पैदा कर रहा है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर बैक्टीरियल इंफेक्शन रिसर्च (NIRBI) द्वारा किए गए शोध में यह सामने आया है कि 6 महीने से 2 साल तक के बच्चे इस संक्रमण के सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। खासतौर पर 6 से 12 महीने के शिशुओं में संक्रमण की दर काफी अधिक पाई गई है। इस उम्र में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती, जिससे उनका शरीर वायरस से लड़ने में कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, एडेनोवायरस-एफ के प्रकार 40 और 41 के बीच जेनेटिक विविधता देखी गई है। इसके साथ ही एक नया वेरिएंट भी सामने आया है, जिसमें वायरस के प्रोटीन स्ट्रक्चर में बदलाव पाया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के जेनेटिक बदलाव संक्रमण की गंभीरता, फैलने की गति और यहां तक कि वैक्सीन की प्रभावशीलता पर भी असर डाल सकते हैं। यही वजह है कि इस वायरस पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस नए वेरिएंट के तीन बड़े प्रभाव हो सकते हैं—पहला, संक्रमण की तीव्रता बढ़ सकती है; दूसरा, यह वायरस तेजी से फैल सकता है; और तीसरा, मौजूदा वैक्सीन की प्रभावशीलता कम हो सकती है। ऐसे में आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई।

इस अध्ययन में मौसम की भूमिका भी अहम पाई गई है। तापमान और नमी में बदलाव, खासकर बारिश के मौसम में, संक्रमण के फैलाव को बढ़ावा देता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पर्यावरणीय परिस्थितियां वायरस के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए मौसम के अनुसार अतिरिक्त सतर्कता बरतना जरूरी है।

वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, हर साल करीब 1.7 अरब बच्चों में डायरिया के मामले सामने आते हैं। इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मामलों के पीछे रोटावायरस, नोरोवायरस, एडेनोवायरस-एफ और एस्ट्रोवायरस जैसे वायरस जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, रोटावायरस वैक्सीन के व्यापक उपयोग के बाद इसके मामलों में कमी आई है, लेकिन अब अन्य वायरस, विशेष रूप से एडेनोवायरस-एफ, ज्यादा सक्रिय रूप से सामने आने लगे हैं।

डॉ. ममता चावला-सरकार, जो इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता हैं, का कहना है कि बच्चों में डायरिया के कारणों में बदलाव देखा जा रहा है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत है। अस्पतालों में वायरस संबंधी जांच को बढ़ाना होगा और भविष्य के लिए प्रभावी वैक्सीन विकसित करने पर भी जोर देना होगा।

माता-पिता के लिए यह समय बेहद सतर्क रहने का है। बच्चों में डायरिया के शुरुआती लक्षण जैसे बार-बार दस्त, उल्टी, बुखार और कमजोरी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों को साफ पानी पिलाना, हाथों की सफाई रखना, और खाने-पीने की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है। यदि बच्चे में डिहाइड्रेशन के लक्षण जैसे मुंह सूखना, पेशाब कम होना या सुस्ती दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बच्चों को समय-समय पर जरूरी टीकाकरण दिलाना चाहिए और किसी भी तरह के संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छता को प्राथमिकता देनी चाहिए। जागरूकता और समय पर उपचार ही इस खतरे से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।

अंततः, एडेनोवायरस-एफ का नया वेरिएंट एक चेतावनी है कि हमें बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर और अधिक सतर्क और जागरूक रहने की जरूरत है। यदि समय रहते उचित कदम उठाए जाएं, तो इस बढ़ते खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है और बच्चों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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