
हरिद्वार। उत्तराखंड के संवेदनशील हरिद्वार वन प्रभाग के अंतर्गत श्यामपुर रेंज में दो बाघों के सनसनीखेज शिकार मामले में आखिरकार शासन और विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) उत्तराखंड ने मामले में प्रथम दृष्टया गंभीर लापरवाही पाए जाने पर श्यामपुर रेंज के रेंजर विनय कुमार राठी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। 25 मई 2026 को जारी इस कड़े आदेश के बाद से देहरादून से लेकर हरिद्वार तक के वन महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।
मुख्य वन संरक्षक (गढ़वाल) की संस्तुति पर की गई यह कार्रवाई ‘उत्तरांचल सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 2003’ के तहत अमल में लाई गई है। निलंबन की इस अवधि के दौरान रेंजर विनय राठी को हरिद्वार वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) कार्यालय से संबद्ध (अटैच) किया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि निलंबन के दौरान उन्हें नियमानुसार केवल जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।
जहर देकर शिकार और अंग भंग: क्या है पूरा मामला?
यह पूरा घटनाक्रम हरिद्वार वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज के अंतर्गत आने वाली सजनपुर बीट का है, जहां पिछले दिनों दो बाघों के शव मिलने से हड़कंप मच गया था। शुरुआती फॉरेंसिक और विभागीय जांच में यह साफ हो गया कि यह सामान्य मौत नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत किया गया हरिद्वार बाघ शिकार कांड है। शिकारियों ने बाघों को मारने के लिए बेहद घातक जहर का इस्तेमाल किया था।
क्रूरता की हद पार करते हुए शिकारी मृत बाघों के पंजे भी काटकर अपने साथ ले गए, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में वन्यजीव अंगों की तस्करी की ओर सीधा इशारा करता है। इस मामले में तत्परता दिखाते हुए वन विभाग ने अब तक मुख्य आरोपी सहित कुल चार लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, जबकि कुछ अन्य संदिग्धों की तलाश में लगातार छापेमारी की जा रही है। हालांकि, घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी वन विभाग अब तक बाघों के कटे हुए पंजे बरामद करने में नाकाम रहा है, जो जांच प्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
गश्त और निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त
सूत्रों के मुताबिक, इस मामले की उच्च स्तरीय जांच में क्षेत्रीय स्तर पर ढिलाई, एंटी-पोचिंग (शिकार रोधी) गश्त की कमी और खुफिया तंत्र के पूरी तरह फेल होने की बात सामने आई है। राजाजी टाइगर रिजर्व से सटे होने के कारण श्यामपुर रेंज बेहद संवेदनशील कॉरिडोर माना जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में शिकारियों का दाखिल होना, जहर देना और अंगों को काटकर सुरक्षित निकल जाना बिना स्थानीय स्तर की अनदेखी या मिलीभगत के संभव नहीं है।
इसी जवाबदेही को तय करते हुए रेंज स्तर के सर्वोच्च अधिकारी पर निलंबन की गाज गिरी है। माना जा रहा है कि विस्तृत जांच रिपोर्ट आने के बाद इस मामले में कुछ और बड़े अधिकारियों तथा बीट स्तर के कर्मचारियों पर भी गाज गिर सकती है।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) संभालेगा कमान
दो बाघों के एक साथ शिकार और उनके अंगों की तस्करी के इस गंभीर मामले ने अब राष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल तेज कर दी है। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने इस पूरे घटनाक्रम का संज्ञान लिया है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, NTCA की एक विशेष टीम जल्द ही उत्तराखंड का दौरा कर सकती है। यह टीम न सिर्फ घटना स्थल का मुआयना करेगी, बल्कि राज्य वन विभाग की सुरक्षा तैयारियों और पिछले कुछ महीनों के गश्त रिकॉर्ड की भी समीक्षा करेगी।
विदेशी बाजारों में बाघ के अंगों की भारी मांग को देखते हुए केंद्रीय एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही हैं कि इस हरिद्वार बाघ शिकार कांड के तार कहीं अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय तस्कर गिरोहों से तो नहीं जुड़े हैं।
विवादों में हरिद्वार वन प्रभाग और महाकुंभ की चिंता
यह कोई पहला मामला नहीं है जब हरिद्वार वन प्रभाग अपनी नाकामियों के कारण सुर्खियों में है। पिछले आठ महीनों के भीतर इसी प्रभाग में चार से अधिक हाथियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। इसके अलावा, कुछ समय पहले इसी डिवीजन में सांपों के जहर की अंतरराष्ट्रीय तस्करी का एक बड़ा रैकेट भी पकड़ा गया था, जिसमें वन कर्मियों की भूमिका पर उंगलियां उठी थीं।
यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां वन्यजीव कॉरिडोर और घनी मानव आबादी के बीच लगातार संघर्ष (मैन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट) की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में लचर सुरक्षा व्यवस्था शिकारियों के लिए मुफीद साबित हो रही है।
इस पूरे घटनाक्रम ने आगामी महाकुंभ की तैयारियों को लेकर भी शासन की चिंता बढ़ा दी है। हरिद्वार में महाकुंभ के आयोजन को लेकर जमीनी तैयारियां शुरू होने वाली हैं, जिसके चलते आने वाले समय में वन क्षेत्रों के आस-पास लाखों-करोड़ों लोगों और वाहनों का दबाव बढ़ेगा। ऐसे संवेदनशील समय में यदि वन सुरक्षा का ढांचा इतना कमजोर रहता है, तो वन्यजीवों के साथ-साथ मानव सुरक्षा के लिए भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
केवल दावों से नहीं, जमीन पर मुस्तैदी से बचेगा जंगल
रेंजर विनय कुमार राठी का निलंबन निश्चित रूप से वन विभाग की एक त्वरित और बड़ी दंडात्मक कार्रवाई है, लेकिन असली चुनौती भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना है। उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण केवल कागजी दावों, सेमिनारों और आंकड़ों तक सीमित होकर रह गया है।
जब तक मैदानी स्तर पर फ्रंटलाइन स्टाफ की जवाबदेही तय नहीं होगी, आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रोन और थर्मल कैमरों से संवेदनशील कॉरिडोर की 24 घंटे निगरानी नहीं होगी, तब तक वन्यजीव सुरक्षित नहीं हो सकते। देखना होगा कि इस निलंबन के बाद क्या वन महकमा अपनी गहरी नींद से जागता है या फिर जांच ठंडी पड़ते ही व्यवस्था फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आती है।



