
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का एक नया दावा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान अपने “न्यूक्लियर डस्ट” को अमेरिका को सौंपने के लिए तैयार है। हालांकि, ईरान की ओर से इस दावे की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह “न्यूक्लियर डस्ट” क्या है, यह कहां मौजूद है और इसका वैश्विक सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता है।
दरअसल, “न्यूक्लियर डस्ट” कोई तकनीकी शब्द नहीं है, बल्कि ट्रंप द्वारा इस्तेमाल किया गया एक आम बोलचाल का शब्द है। इसका वास्तविक अर्थ है — एनरिच्ड यूरेनियम (समृद्ध यूरेनियम)। यही वह पदार्थ है जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा उत्पादन और परमाणु हथियार बनाने में किया जाता है। प्राकृतिक यूरेनियम में केवल लगभग 0.7% U-235 आइसोटोप होता है, जिसे परमाणु रिएक्टर में उपयोग के लिए 3-5% तक और परमाणु हथियारों के लिए 90% या उससे अधिक तक समृद्ध किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी International Atomic Energy Agency के अनुसार, ईरान के पास बड़ी मात्रा में एनरिच्ड यूरेनियम मौजूद है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका और इजरायल के हमलों से पहले ईरान के पास करीब 400 किलोग्राम 60% तक समृद्ध यूरेनियम और लगभग 200 किलोग्राम 20% तक समृद्ध यूरेनियम था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर के यूरेनियम को अपेक्षाकृत कम समय में 90% हथियार-ग्रेड तक बदला जा सकता है।
ईरान का हमेशा से यह कहना रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उद्देश्य केवल बिजली उत्पादन है। लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस दावे पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि ईरान के पास पहले से ही तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं, जिससे वह कम लागत में बिजली पैदा कर सकता है। ऐसे में बड़े पैमाने पर यूरेनियम एनरिचमेंट की जरूरत पर संदेह होता है।
ईरान का एकमात्र सक्रिय परमाणु बिजली संयंत्र Bushehr Nuclear Power Plant है, जिसकी क्षमता लगभग 1000 मेगावाट है। यह देश की कुल बिजली जरूरत का केवल 1% ही पूरा करता है। ईरान ने 2041 तक 20 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसके लिए उसे बुशेहर जैसे करीब 20-25 और प्लांट बनाने होंगे, जो समय और संसाधनों के लिहाज से एक बड़ी चुनौती है।
अब बात करते हैं उस “न्यूक्लियर डस्ट” की लोकेशन की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान का अधिकांश एनरिच्ड यूरेनियम जमीन के काफी नीचे सुरक्षित स्थानों पर रखा गया है। खासकर दो प्रमुख स्थानों का जिक्र किया जाता है — इस्फहान और नतांज। इस्फहान के परमाणु परिसर में भूमिगत सुरंगों में यूरेनियम संग्रहित होने की बात कही जाती है, जबकि नतांज में भी एक बड़ा भंडारण केंद्र है।
इन दोनों ठिकानों पर पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा हमले किए जा चुके हैं। ट्रंप ने उस समय दावा किया था कि इन हमलों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम “पूरी तरह खत्म” हो गया है। हालांकि Rafael Grossi ने संकेत दिया था कि ईरान के पास अब भी यूरेनियम का बड़ा हिस्सा सुरक्षित हो सकता है, खासकर भूमिगत संरचनाओं में।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ईरान के पास अत्याधुनिक सेंट्रीफ्यूज मशीनें हैं, जिनकी मदद से वह यूरेनियम को तेजी से एनरिच कर सकता है। इसके अलावा, ईरान जमीन के नीचे नए एनरिचमेंट केंद्र बनाने की क्षमता भी रखता है, जिससे उसकी परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म करना बेहद कठिन हो जाता है।
ट्रंप का यह दावा कि ईरान अपना “न्यूक्लियर डस्ट” सौंपने को तैयार है, अगर सच साबित होता है, तो यह वैश्विक स्तर पर एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम होगा। इससे न केवल मध्य पूर्व में तनाव कम हो सकता है, बल्कि परमाणु अप्रसार (non-proliferation) की दिशा में भी एक अहम कदम माना जाएगा।
हालांकि, जब तक ईरान की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं होती, तब तक इस दावे को संदेह की नजर से ही देखा जा रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, खासकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए।
कुल मिलाकर, “न्यूक्लियर डस्ट” यानी एनरिच्ड यूरेनियम आज वैश्विक सुरक्षा के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका की नीतियां और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निगरानी — ये सभी मिलकर आने वाले समय में दुनिया की राजनीति और सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अहम कारक बने रहेंगे।



