
तेलंगाना की राजनीति में एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में राज्य कैबिनेट ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए मंत्रियों और विधायकों (MLAs) की सैलरी में 50 प्रतिशत कटौती करने का फैसला लिया है। इस कदम का उद्देश्य राज्य के रिटायर्ड कर्मचारियों को लंबे समय से लंबित पेंशन बकाया का भुगतान करना है।
सरकार के अनुसार, राज्य में हजारों से अधिक सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पिछले करीब 10 वर्षों से उनका पेंशन बकाया नहीं मिल पाया है। यह मुद्दा लंबे समय से उठता रहा है और कई बार प्रदर्शन भी हुए, लेकिन अब सरकार ने इसे प्राथमिकता देते हुए ठोस कदम उठाया है। बताया जा रहा है कि राज्य पर करीब 6,200 करोड़ रुपये का पेंशन बकाया है, जिसे चुकाने के लिए यह विशेष पहल की गई है।
इस फैसले के तहत सभी मंत्रियों और विधायकों के वेतन में आधी कटौती की जाएगी। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह कटौती कितने समय तक लागू रहेगी, लेकिन सरकार ने लक्ष्य रखा है कि अगले 100 दिनों के भीतर सभी लंबित पेंशन का भुगतान कर दिया जाएगा। इस निर्णय से राज्य के बुजुर्ग नागरिकों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
सरकार ने इस पूरे प्रक्रिया को व्यवस्थित ढंग से लागू करने के लिए एक विशेष समिति का गठन भी किया है। इस समिति का नाम “रेवेन्यू रिसोर्सेस मोबिलाइजेशन कमेटी” रखा गया है, जिसमें उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क सहित कई वरिष्ठ मंत्री शामिल हैं। इस कमेटी को जिम्मेदारी दी गई है कि वह संसाधनों का प्रबंधन करते हुए तय समय सीमा में सभी बकाया भुगतान सुनिश्चित करे।
राज्य सरकार ने इस फैसले के जरिए पूर्ववर्ती भारत राष्ट्र समिति सरकार पर भी निशाना साधा है। मौजूदा सरकार का आरोप है कि पिछली सरकार ने कर्मचारियों को समय पर लाभ नहीं दिया, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता गया और पेंशन बकाया की समस्या गंभीर होती चली गई। अब कांग्रेस सरकार इस मुद्दे को हल करने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रही है।
सरकार का यह भी कहना है कि अब बुजुर्गों को अपने पैसे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सभी भुगतान सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाएंगे, जिससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी और भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी कम होंगी।
इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर भी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई लोग इसे जनहित में उठाया गया साहसिक कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या केवल वेतन कटौती से इतनी बड़ी राशि का प्रबंध संभव है। बावजूद इसके, आम जनता के बीच इस निर्णय को सकारात्मक नजरिए से देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, तेलंगाना सरकार का यह फैसला न सिर्फ आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह एक संदेश भी देता है कि जनप्रतिनिधि जरूरत पड़ने पर जनता के हित में त्याग करने के लिए तैयार हैं। अब देखने वाली बात होगी कि सरकार अपने 100 दिन के लक्ष्य को किस हद तक पूरा कर पाती है और क्या यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।



