
देहरादून: उत्तराखंड के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने और गांवों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य के नीति आयोग यानी ‘सेतु आयोग’ (स्टेट इंस्टीट्यूट फॉर एम्पॉवरिंग एंड ट्रांसफॉर्मिंग उत्तराखंड) ने जमीनी स्तर पर एक बड़े अभियान की शुरुआत कर दी है। सोमवार को सचिवालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में सेतु आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और राज्य के पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह ने साफ कर दिया कि राज्य का सतत विकास तभी संभव है, जब विकास की नीतियां देहरादून के वातानुकूलित कमरों से निकलकर सीधे ग्राम पंचायतों तक पहुंचें।
बैठक में राज्य के पर्यटन, कृषि, बागवानी (उद्यान), स्वास्थ्य और तकनीकी विकास जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सेतु आयोग उत्तराखंड आर्थिक विकास योजना के तहत दीर्घकालिक रणनीति और बड़े पैमाने पर स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन से संबंधित विषयों पर गहराई से मंथन किया गया। आयोग का मुख्य फोकस इस बात पर है कि राज्य की कठिन भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा संतुलित व समावेशी विकास मॉडल तैयार किया जाए, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना पहाड़ों में खुशहाली ला सके।
‘एकीकृत स्मार्ट विलेज केंद्र’ बनेंगे ग्रामीण क्रांति का आधार
इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु सेतु आयोग द्वारा राज्य के विभिन्न जनपदों में शुरू किए गए ‘एकीकृत स्मार्ट विलेज केंद्र’ (Integrated Smart Village Centers) रहे। ग्रामीण स्तर पर सार्वजनिक सेवाओं और डिजिटल सुविधाओं के विस्तार के लिए स्थापित किए गए ये केंद्र आने वाले समय में उत्तराखंड के ग्रामीण विकास के पावरहाउस साबित होने वाले हैं।
इन केंद्रों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
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संभावनाओं का आकलन: ग्रामीण स्तर पर स्थानीय संसाधनों, जैसे पारंपरिक कृषि, जड़ी-बूटी उत्पादन और होमस्टे पर्यटन की संभावनाओं को चिन्हित करना।
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दूरगामी नीतियां: डेटा और जमीनी हकीकत के आधार पर अगले 10 से 20 सालों के लिए विकास का खाका तैयार करना।
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डिजिटल सशक्तिकरण: गांवों के युवाओं, महिलाओं और किसानों को एक ही छत के नीचे डिजिटल सेवाएं और सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराना।
फाइलें नहीं, अब ‘कन्वर्जन मॉडल’ और जन-भागीदारी से होगा ग्रामोत्थान
बैठक के दौरान सीईओ शत्रुघ्न सिंह ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली पारंपरिक देरी और विभागों के बीच समन्वय की कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने अधिकारियों को हिदायत दी कि अब पारंपरिक ढर्रे को छोड़कर ‘विभागीय कन्वर्जन मॉडल’ (Departmental Convergence Model) पर काम करना होगा। इसका सीधा मतलब यह है कि कृषि, उद्यान, सिंचाई, पर्यटन और उद्योग जैसे अलग-अलग विभाग बजट और योजनाओं को अलग रखकर काम करने के बजाय, एक साथ मिलकर किसी एक गांव या क्लस्टर के विकास के लिए सामूहिक प्रयास करेंगे।
“उत्तराखंड के ग्रामोत्थान के लिए विभिन्न सरकारी विभागों को पूरी गंभीरता के साथ अपनी योजनाओं को कन्वर्जन मोड में लाना होगा। जब तक हम स्थानीय समुदायों, ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के मध्य अपनी विश्वसनीयता कायम नहीं करेंगे और उनकी सीधी सहभागिता सुनिश्चित नहीं करेंगे, तब तक कोई भी योजना धरातल पर सफल नहीं हो सकती। हमारा लक्ष्य यह है कि ग्राम स्तर की समस्याओं का समाधान पंचायत स्तर पर ही हो जाए।” — श्री शत्रुघ्न सिंह, सीईओ, सेतु आयोग
जून के आखिरी हफ्ते तक मांगी एक साल की कंक्रीट कार्ययोजना
सेतु आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए इस योजना को केवल कागजों तक सीमित न रखने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने पंचायत स्तर पर चिन्हित किए गए केंद्रों के प्रतिनिधियों को स्पष्ट आदेश दिए हैं कि वे तुरंत स्थानीय लोगों, ग्राम प्रधानों और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित करें।
इस संवाद के आधार पर हर केंद्र को अपने क्षेत्र के लिए एक साल की विस्तृत कार्ययोजना (Action Plan) तैयार करनी होगी। इस कार्ययोजना में यह साफ-साफ दर्ज होना चाहिए कि विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाएं आम जनता तक कैसे और कितनी सुगमता से पहुंचाई जा रही हैं। आयोग ने सभी संबंधित विभागों और केंद्रों को यह रिपोर्ट जून के अंतिम सप्ताह तक हर हाल में सौंपने की डेडलाइन दी है।
बिजनेस मॉडल की बनेगी SOP, स्थानीय युवाओं को ट्रेनिंग
बैठक केवल चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें शामिल वरिष्ठ अधिकारियों और विषय विशेषज्ञों ने कई व्यावहारिक सुझाव भी सामने रखे। राज्य के संतुलित, समावेशी और सतत विकास को प्राथमिकता देते हुए बैठक में निम्नलिखित अहम फैसले और सुझावों पर सहमति बनी:
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स्मार्ट सेंटर्स और हेल्प डेस्क: चिन्हित किए गए ग्रामीण केंद्रों को हाई-टेक ‘स्मार्ट सेंटर’ में बदला जाएगा, जहां ग्रामीणों की मदद के लिए बकायदा हेल्प डेस्क स्थापित होगी।
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स्थानीय युवाओं को रोजगार: सरकारी योजनाओं की तकनीकी और व्यावहारिक जानकारी आम जनता तक पहुंचाने के लिए स्थानीय युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे उनके लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।
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बिजनेस मॉडल की SOP: इन स्मार्ट विलेज सेंटर्स को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक ‘बिजनेस मॉडल’ तैयार किया जाएगा और इसके लिए एक स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाई जाएगी, ताकि ये केंद्र लंबे समय तक बिना किसी वित्तीय बाधा के खुद चल सकें।
इन विभागों की रही महत्वपूर्ण मौजूदगी
सचिवालय में आयोजित इस बेहद महत्वपूर्ण बैठक में सेतु आयोग की सलाहकार डॉ. भावना शिंदे सहित सेवायोजन (Employment), जलागम प्रबंधन (Watershed Management), स्वास्थ्य विभाग, उद्यान एवं कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करने वाली देश की विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं के प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। सभी विशेषज्ञों ने अपने कार्य अनुभवों को साझा करते हुए उत्तराखंड के रिवर्स माइग्रेशन (पलायन रोकने) के लिए इस कदम को बेहद क्रांतिकारी बताया।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए ‘सेतु आयोग’ का यह दृष्टिकोण बेहद व्यावहारिक नजर आता है। अब तक राज्य में नीतियां शीर्ष स्तर (Top-to-Bottom) पर बनती थीं, जिससे पहाड़ों की वास्तविक जरूरतें छूट जाती थीं। लेकिन ‘एकीकृत स्मार्ट विलेज केंद्रों’ के जरिए अब योजनाएं नीचे से ऊपर (Bottom-to-Top) की ओर बढ़ेंगी। अगर जून के अंत तक आने वाली कार्ययोजना पर ईमानदारी से अमल हुआ, तो उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया और मजबूत इकोसिस्टम मिल सकता है।



