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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > उत्तरकाशी में गहराया यमुना नदी चैनलाइजेशन विवाद: खरादी में आबादी की ओर मोड़ा जा रहा नदी का रुख! भड़के ग्रामीणों का प्रदर्शन, सिंचाई विभाग के यू-टर्न से खड़े हुए बड़े सवाल
उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तरकाशी में गहराया यमुना नदी चैनलाइजेशन विवाद: खरादी में आबादी की ओर मोड़ा जा रहा नदी का रुख! भड़के ग्रामीणों का प्रदर्शन, सिंचाई विभाग के यू-टर्न से खड़े हुए बड़े सवाल

The Hill India News
Last updated: June 8, 2026 2:52 am
The Hill India News
Published: June 8, 2026
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उत्तरकाशी: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों के बेतरतीब चैनलाइजेशन और डायवर्जन को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उत्तरकाशी जिले के बड़कोट तहसील अंतर्गत आने वाले खरादी क्षेत्र में इस समय भारी तनाव और जन-आक्रोश का माहौल है। कारण है- जीवनदायिनी यमुना नदी के प्राकृतिक प्रवाह के साथ की जा रही कथित छेड़छाड़। खरादी और नगाणगांव क्षेत्र के स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि चैनलाइजेशन के नाम पर नदी के प्राकृतिक बहाव को जबरन आबादी और बाजार की तरफ मोड़ा जा रहा है, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर तबाही आ सकती है।

Contents
2013 की केदारनाथ आपदा का खौफ: करोड़ों के सुरक्षा कार्य दांव परनदी के मलबे से ही खड़ी की जा रही मौत की दीवार!सिंचाई विभाग के इनकार से गहराया सस्पेंस: आखिर मशीनें चला कौन रहा है?विधायक संजय डोभाल से हस्तक्षेप की गुहारप्रशासन से ग्रामीणों की दो टूक मांगें

इस गंभीर मामले को लेकर ग्रामीणों की नाराजगी इतनी बढ़ गई है कि उन्होंने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बड़कोट के उपजिलाधिकारी (SDM) को एक लिखित ज्ञापन सौंपकर इस कथित अवैध और लापरवाह कार्य पर तुरंत रोक लगाने और मामले की उच्च स्तरीय जांच करने की मांग की है।

2013 की केदारनाथ आपदा का खौफ: करोड़ों के सुरक्षा कार्य दांव पर

इस विरोध प्रदर्शन और जन-आक्रोश के पीछे ग्रामीणों का कोई मामूली डर नहीं, बल्कि अतीत का एक बेहद दर्दनाक अनुभव है। बड़कोट और खरादी के लोगों ने साल 2013 की उस भीषण आपदा को बेहद करीब से देखा है, जब यमुना और गंगा की सहायक नदियों ने उफान पर आकर सैकड़ों घरों को लील लिया था।

ग्रामीणों का कहना है कि उस तबाही के बाद सरकार ने खरादी बाजार, आसपास की बस्तियों और महत्वपूर्ण सरकारी संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से बाढ़ सुरक्षा दीवारें (Flood Protection Walls) और अन्य सुधारात्मक कार्य करवाए थे।

ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता:

“अगर वर्तमान में पोकलैंड मशीनों के जरिए नदी का रुख जानबूझकर आबादी वाले क्षेत्रों की तरफ डायवर्ट किया गया, तो पूर्व में निर्मित इन सुरक्षा दीवारों की उपयोगिता पूरी तरह खत्म हो जाएगी। नदी का पानी सीधे घरों और दुकानों में घुसेगा, जिससे खरादी बाजार के सैकड़ों आवासीय और व्यावसायिक भवन ताश के पत्तों की तरह ढह सकते हैं।”

नदी के मलबे से ही खड़ी की जा रही मौत की दीवार!

उपजिलाधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन में ग्रामीणों ने मौके की जमीनी हकीकत बयां करते हुए काम करने के तौर-तरीकों पर गंभीर तकनीकी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, नगाणगांव क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से भारी-भरकम पोकलैंड मशीनें दिन-रात नदी के सीने को चीर रही हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर मानसून की पहली बारिश में ही नदी का जलस्तर थोड़ा भी बढ़ा, तो यह मलबे की दीवार बह जाएगी और पानी सीधे मुख्य बाजार को अपनी चपेट में ले लेगा।

सिंचाई विभाग के इनकार से गहराया सस्पेंस: आखिर मशीनें चला कौन रहा है?

इस पूरे उत्तरकाशी यमुना नदी चैनलाइजेशन विवाद में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब मीडिया और प्रशासन ने इस कार्य को लेकर सिंचाई विभाग से जवाब मांगा। सिंचाई निर्माण खंड पुरोला के अधिशासी अभियंता (EE) पन्नी लाल ने इस पूरे मामले से विभाग का पल्ला पूरी तरह से झाड़ लिया है। उनके इस बयान ने पूरे मामले को रहस्यमयी बना दिया है।

विभाग का नाम आधिकारिक बयान / स्थिति ग्रामीणों का दावा
सिंचाई निर्माण खंड, पुरोला “वर्तमान में खरादी क्षेत्र में विभाग की ओर से ऐसा कोई कार्य नहीं कराया जा रहा है। करीब एक वर्ष पहले दो मशीनों से कुछ चैनलाइजेशन हुआ था, पर अभी हमारी कोई गतिविधि नहीं है।” “पोकलैंड मशीनें लगातार मौके पर काम कर रही हैं और नदी के बीच से मलबे को किनारों पर लगाकर बहाव बदला जा रहा है।”

अधिशासी अभियंता के इस बयान के बाद अब यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि यदि सरकारी तंत्र इस काम को नहीं करवा रहा है, तो फिर यमुना नदी जैसी संवेदनशील और प्रतिबंधित जगह पर सरेआम पोकलैंड मशीनें उतारकर नदी का सीना चीरने वाले ये रसूखदार लोग कौन हैं? क्या यह खनन माफिया का खेल है या किसी निजी बिल्डर का दुस्साहस? विभाग के इस यू-टर्न ने ग्रामीणों के शक को यकीन में बदल दिया है कि यहाँ नियमों को ताक पर रखकर कोई बड़ा खेल चल रहा है।

विधायक संजय डोभाल से हस्तक्षेप की गुहार

प्रशासनिक लापरवाही और विभाग के गोलमोल जवाब से नाराज ग्रामीणों ने अब राजनीतिक दबाव बनाना भी शुरू कर दिया है। क्षेत्र के लोगों ने यमुनोत्री विधानसभा सीट से स्थानीय विधायक संजय डोभाल से भी इस मामले में तुरंत दखल देने की पुरजोर मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधि होने के नाते यह विधायक की जिम्मेदारी है कि वे क्षेत्रवासियों की जान-माल की रक्षा के लिए इस अवैध डायवर्जन को तुरंत रुकवाएं।

ज्ञापन सौंपने और विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले मुख्य ग्रामीणों में सोवेन्द्र सिंह, प्रमोद सिंह पयाल, प्रज्ञ रावत, कुलबीर रावत, राजेन्द्र रावत और मोहन सिंह पंवार सहित भारी संख्या में खरादी के व्यापारी और मातृशक्ति शामिल रहे। इन सभी ने एक सुर में चेतावनी दी है कि यदि अगले 48 घंटों के भीतर प्रशासन ने मौके का तकनीकी निरीक्षण कर वस्तुस्थिति स्पष्ट नहीं की, तो ग्रामीण निर्माण कार्य वाली जगह पर जाकर अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू करने के लिए विवश होंगे।

प्रशासन से ग्रामीणों की दो टूक मांगें

ग्रामीणों ने बड़कोट प्रशासन के सामने बेहद तार्किक और पर्यावरण के अनुकूल मांगें रखी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा होगा:

  • तत्काल स्थलीय निरीक्षण: प्रशासनिक अधिकारियों और स्वतंत्र हाइड्रोलॉजिस्ट (जलविज्ञानी) की टीम मौके पर जाकर जांच करे कि नदी के प्रवाह को कितना नुकसान पहुंचा है।

  • मलबे का वैज्ञानिक निस्तारण: डायवर्जन और खुदाई से निकले मलबे को नदी के किनारों पर डंप करने के बजाय, उसे पूर्व में निर्मित सुरक्षात्मक दीवारों के पीछे व्यवस्थित ढंग से डाला जाए ताकि वे दीवारें और मजबूत हो सकें।

  • दोषियों पर कार्रवाई: यदि सिंचाई विभाग सच कह रहा है और यह काम अवैध है, तो नदी में मशीनें उतारने वाले ठेकेदारों और भू-माफियाओं के खिलाफ तत्काल आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाए।

हिमालयी राज्य उत्तराखंड पहले ही ग्लोबल वार्मिंग और अनियोजित विकास के कारण जोशीमठ और आपदाओं जैसी गंभीर त्रासदियों से जूझ रहा है। ऐसे में उत्तरकाशी यमुना नदी चैनलाइजेशन विवाद शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। मानसून सिर पर है और यमुना का यह उग्र रूप खरादी बाजार के अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है। बड़कोट प्रशासन को चाहिए कि वह कागजी कार्रवाई से बाहर निकलकर तुरंत धरातल पर एक्शन ले, इससे पहले कि यमुना का पानी किसी के आशियाने को बहा ले जाए।

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