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उत्तर प्रदेशफीचर्ड

राम मंदिर ट्रस्ट में भर्ती और चढ़ावा प्रबंधन पर गंभीर सवाल: बैकडोर नियुक्तियों, कथित रिश्वतखोरी और चंदा चोरी के आरोपों की जांच तेज

The Hill India News
Last updated: July 2, 2026 8:11 am
The Hill India News
Published: July 2, 2026
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अयोध्या। राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मंदिर में कर्मचारियों की भर्ती, चढ़ावे की सुरक्षा और वित्तीय प्रबंधन को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि ट्रस्ट के गठन के बाद कुछ प्रभावशाली लोगों की सिफारिश पर बिना निर्धारित प्रक्रिया अपनाए कई लोगों को संवेदनशील पदों पर नियुक्त किया गया। इनमें ऐसे लोगों के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिनकी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव या पुलिस सत्यापन नहीं कराया गया था। इन आरोपों के सामने आने के बाद पूरे मामले की जांच शुरू हो चुकी है और पुलिस के साथ अन्य एजेंसियां भी विभिन्न पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं।

Contents
भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवालमुख्य आरोपियों के नाम चर्चा मेंसंपत्तियों को लेकर भी जांचट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों पर भी उठे सवालपूर्व कर्मचारियों के दावेनौकरी दिलाने के नाम पर रिश्वत लेने का आरोपमुख्य आरोपी टिन्नू यादव को लेकर भी सवालहाउसकीपिंग कर्मचारियों से कराया गया नकदी प्रबंधनपुलिस वेरिफिकेशन पर भी सवालएजेंसी और ट्रस्ट की चुप्पीपुलिस जांच जारी

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह आरोप लगाया गया है कि मंदिर के चढ़ावे और करोड़ों रुपये की नकदी के प्रबंधन का कार्य ऐसे व्यक्तियों को सौंपा गया, जो ट्रस्ट के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों के करीबी थे। आरोपों के अनुसार, नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव रहा और भर्ती प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक रूप से पुष्टि अभी जांच के बाद ही हो सकेगी।

भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवाल

आरोपों के मुताबिक, राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए किसी सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कई नियुक्तियां कथित रूप से सिफारिश और व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर की गईं। सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिन लोगों को मंदिर के चढ़ावे, बैंकिंग व्यवस्था और नकदी प्रबंधन जैसे अत्यंत संवेदनशील कार्यों की जिम्मेदारी दी गई, उनके लिए आवश्यक योग्यता और सुरक्षा संबंधी औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया।

बताया जा रहा है कि कुछ कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन भी नहीं कराया गया था। सामान्यतः किसी भी धार्मिक संस्थान या वित्तीय जिम्मेदारी वाले पद पर नियुक्ति से पहले पुलिस वेरिफिकेशन और पृष्ठभूमि की जांच आवश्यक मानी जाती है। ऐसे में इन आरोपों ने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मुख्य आरोपियों के नाम चर्चा में

जांच के दौरान जिन लोगों के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं, उनमें लवकुश मिश्रा और उसका साला अनुकल्प मिश्रा शामिल बताए जा रहे हैं। आरोप है कि लवकुश मिश्रा पहले ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के ड्राइवर के रूप में कार्य करता था। बाद में कथित रूप से उसे ट्रस्ट के भीतर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने लगीं और उसके प्रभाव से अनुकल्प मिश्रा को भी संवेदनशील कार्यों में शामिल किया गया।

आरोप यह भी है कि दोनों ने मंदिर की वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच बनाकर अनुचित लाभ उठाया और कम समय में बड़ी मात्रा में संपत्ति अर्जित की। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही संभव होगी।

संपत्तियों को लेकर भी जांच

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अनुकल्प मिश्रा ने अयोध्या के एक प्रमुख क्षेत्र में आलीशान मकान खरीदा, जबकि लवकुश मिश्रा ने अपनी पत्नी के नाम पर जमीन खरीदकर मकान निर्माण शुरू कराया। आरोप है कि इन संपत्तियों का मूल्य उनकी आय से कहीं अधिक है।

सूत्रों के अनुसार, अयोध्या विकास प्राधिकरण इन संपत्तियों की जांच कर रहा है और यदि निर्माण या संपत्ति अर्जन में कोई अनियमितता पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल संबंधित विभागों द्वारा दस्तावेजों की जांच जारी है।

ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों पर भी उठे सवाल

इस पूरे मामले में ट्रस्ट के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों की जानकारी और संरक्षण में यह पूरा नेटवर्क काम कर रहा था। हालांकि, संबंधित पदाधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि नियुक्तियों, वित्तीय जिम्मेदारियों और कर्मचारियों की तैनाती से जुड़े निर्णय किस स्तर पर लिए गए थे और उनमें किन-किन अधिकारियों की भूमिका रही।

पूर्व कर्मचारियों के दावे

कुछ पूर्व कर्मचारियों ने दावा किया है कि उन्होंने समय-समय पर कथित अनियमितताओं की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी थी। उनका आरोप है कि शिकायत करने वाले कर्मचारियों को नौकरी से हटाने या उन पर दबाव बनाने जैसी परिस्थितियां पैदा की गईं। हालांकि, इन दावों की भी स्वतंत्र जांच की जा रही है।

यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारियों के अधिकारों से भी जुड़ जाएगा।

नौकरी दिलाने के नाम पर रिश्वत लेने का आरोप

मामले में एक और गंभीर आरोप यह है कि मंदिर में नौकरी दिलाने के नाम पर बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों से लाखों रुपये लिए गए। शुरुआती जांच में दावा किया गया है कि लगभग 125 कर्मचारियों से भर्ती के बदले कथित रूप से रिश्वत ली गई।

आरोप है कि बेरोजगार युवाओं को यह भरोसा दिलाया गया कि प्रभावशाली लोगों की सिफारिश से उन्हें मंदिर में नौकरी मिल जाएगी। इसके बदले उनसे मोटी रकम वसूली गई। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन पैसों का लेन-देन किन माध्यमों से हुआ और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे।

मुख्य आरोपी टिन्नू यादव को लेकर भी सवाल

मामले में टिन्नू यादव का नाम भी प्रमुख आरोपी के रूप में सामने आया है। आरोप है कि जब उसके खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे तो प्रारंभिक स्तर पर उसे बचाने की कोशिश की गई। हालांकि, बाद में मामले की गंभीरता बढ़ने पर पुलिस जांच शुरू हुई और विभिन्न पहलुओं की जांच की जा रही है।

जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि क्या किसी स्तर पर आरोपी को संरक्षण देने का प्रयास किया गया था या नहीं।

हाउसकीपिंग कर्मचारियों से कराया गया नकदी प्रबंधन

सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि मंदिर परिसर में साफ-सफाई के लिए नियुक्त कर्मचारियों को करोड़ों रुपये के चढ़ावे की नकदी गिनने और संभालने का काम सौंप दिया गया।

जानकारी के अनुसार, मंदिर में आने वाले चढ़ावे को बैंक तक पहुंचाने की व्यवस्था के लिए एक आउटसोर्सिंग एजेंसी को अनुबंध दिया गया था। एजेंसी का कार्य केवल हाउसकीपिंग स्टाफ उपलब्ध कराना था। आरोप है कि बाद में इन्हीं कर्मचारियों को नकदी गिनने और चढ़ावे से जुड़े संवेदनशील कार्यों में लगा दिया गया।

यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह सुरक्षा मानकों और बैंकिंग नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है।

पुलिस वेरिफिकेशन पर भी सवाल

बताया जा रहा है कि जिन कर्मचारियों को नकदी प्रबंधन का कार्य सौंपा गया, उनमें से कई का पुलिस सत्यापन नहीं कराया गया था। सामान्य परिस्थितियों में बड़ी मात्रा में नकदी संभालने वाले कर्मचारियों की विस्तृत पृष्ठभूमि जांच अनिवार्य मानी जाती है।

इसी कारण अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि नियुक्ति के समय किन नियमों की अनदेखी हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार था।

एजेंसी और ट्रस्ट की चुप्पी

मामले के सार्वजनिक होने के बाद संबंधित आउटसोर्सिंग एजेंसी और ट्रस्ट के कई जिम्मेदार पदाधिकारियों की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस चुप्पी को लेकर भी विभिन्न तरह के सवाल उठ रहे हैं।

हालांकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होना आवश्यक है। संबंधित पक्षों को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

पुलिस जांच जारी

पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। वित्तीय लेन-देन, बैंक रिकॉर्ड, नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेज, कर्मचारियों की पृष्ठभूमि और संपत्ति से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

इसके अलावा, अयोध्या विकास प्राधिकरण भी आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों का सर्वे कर रहा है। यदि किसी प्रकार की अवैध निर्माण गतिविधि या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

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