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नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से पूछा— ‘9 महीने बाद भी मदरसा शिक्षकों को क्यों नहीं मिला बकाया वेतन?’

The Hill India News
Last updated: June 8, 2026 2:32 pm
The Hill India News
Published: June 8, 2026
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नैनीताल: अदालती आदेशों के प्रति कार्यपालिका और प्रशासनिक अधिकारियों की ढुलमुल कार्यशैली पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य के मदरसों में वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों को अदालती आदेश के बावजूद अब तक वेतन (मानदेय) का भुगतान न किए जाने को बेहद गंभीरता से लिया है। इस मामले में दायर अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार को आगामी 10 जून तक स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने साफ तौर पर पूछा है कि जब न्यायालय ने महीनों पहले भुगतान के आदेश जारी कर दिए थे, तो प्रशासनिक स्तर पर इस फाइल को क्यों अटका कर रखा गया? इस सख्त रुख के बाद अब इस हाई-प्रोफाइल उत्तराखंड मदरसा शिक्षक वेतन विवाद में नौकरशाही की जवाबदेही तय होना तय माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला? 2016 से चल रहा है मानदेय का सूखा

यह पूरा विवाद उत्तराखंड के उन मदरसा शिक्षकों से जुड़ा है, जिन्हें एक विशेष केंद्रीय/राज्य पोषित योजना (मदरसा आधुनिकीकरण योजना) के तहत नियुक्त किया गया था। रिट याचिका में याचिकाकर्ताओं—धनी राम, मुकेश कुमार और अन्य साथी शिक्षकों द्वारा अपनी व्यथा बयां की गई थी।

शिक्षकों के अनुसार:-

  • नियुक्ति का वर्ष: उनकी नियुक्ति इस योजना के तहत वर्ष 2006 और वर्ष 2008 में विभिन्न मदरसों में आधुनिक विषय (जैसे विज्ञान, गणित, अंग्रेजी) पढ़ाने के लिए की गई थी।

  • तय मानदेय: नियुक्ति के समय इन शिक्षकों का मानदेय ₹12,000 प्रति माह तय किया गया था।

  • विवाद की शुरुआत: वर्ष 2015 तक इन शिक्षकों को नियमित रूप से मानदेय मिलता रहा, जिससे उनका परिवार चलता रहा। लेकिन, अप्रैल 2016 से अचानक प्रशासनिक और बजटीय कारणों का हवाला देकर उनका मानदेय रोक दिया गया। पिछले एक दशक से ये शिक्षक अपने बुनियादी हक के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

7 अक्टूबर 2025 का ऐतिहासिक आदेश और प्रशासनिक सुस्ती

जब अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और सरकार के स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो थके-हारे शिक्षकों ने नैनीताल हाईकोर्ट की शरण ली। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, पिछले साल 7 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में एक बड़ा और मानवीय फैसला सुनाया था।

न्यायालय ने इस जटिल मुद्दे को सुलझाने के लिए एक त्रिस्तरीय उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी (Three-Member Committee) के गठन का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के निर्देशानुसार इस कमेटी का खाका कुछ इस प्रकार था:

​राज्य सरकार के अतिरिक्त सचिवसचिव, अल्पसंख्यक कल्याण आयोगसंबंधित जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी रैंक का अफसर न्यायालय ने इस कमेटी को जिम्मेदारी सौंपी थी कि वह याचिकाकर्ताओं के दावों और उनकी पात्रता की त्वरित जांच करे। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यदि जांच में याचिकाकर्ता मानदेय पाने के हकदार पाए जाते हैं—जो कि वे दस्तावेजों के अनुसार थे—तो उन्हें देय राशि का भुगतान दो माह के भीतर अनिवार्य रूप से कर दिया जाए।

9 महीने बीतने पर भी नतीजा शून्य, इसलिए खटखटाना पड़ा अवमानना का दरवाजा

हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद पीड़ित शिक्षकों को उम्मीद जगी थी कि उनके जीवन का अंधकार दूर होगा और साल 2016 से रुका हुआ उनका पैसा मिल जाएगा। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह रहा कि कोर्ट के आदेश हुए करीब नौ महीने बीतने को हैं, पर धरातल पर शिक्षकों को एक धेला भी नसीब नहीं हुआ।

प्रशासन के इसी ढीले रवैये और कोर्ट के आदेश की सरेआम अनदेखी के खिलाफ आखिरकार धनी राम और मुकेश कुमार सहित अन्य शिक्षकों को दोबारा कोर्ट की शरण लेनी पड़ी और उन्होंने प्रशासन के खिलाफ अवमानना याचिका (Contempt Petition) दायर की।

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि एक तरफ शिक्षक आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार की कमेटी अदालती आदेश की समय-सीमा को ताक पर रखकर बैठी है। दो महीने की डेडलाइन कब की खत्म हो चुकी है, लिहाजा दोषी अधिकारियों के खिलाफ अवमानना के तहत सख्त कार्रवाई की जाए और जल्द से जल्द भुगतान सुनिश्चित करवाया जाए।

10 जून को होगी अगली अग्निपरीक्षा

न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को बेहद वाजिब माना। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि उसके द्वारा दी गई दो महीने की समय-सीमा कब की पार हो चुकी है। कोर्ट ने अब अगली सुनवाई के लिए 10 जून की तिथि नियत की है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 10 जून को होने वाली यह सुनवाई राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और शासन के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए भारी पड़ सकती है। यदि सरकार इस तिथि तक कोई ठोस जवाब या भुगतान की समय-सारणी कोर्ट के सामने पेश नहीं करती है, तो संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश भी जारी किया जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण: कागजी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर

उत्तराखंड मदरसा शिक्षक वेतन विवाद केवल कुछ शिक्षकों के पैसे का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे लोक कल्याणकारी योजनाएं प्रशासनिक फाइलों के फेर में दम तोड़ देती हैं। जो शिक्षक 2016 से यानी पिछले 10 सालों से बिना वेतन के काम करने को मजबूर हैं या जिन्होंने आर्थिक तंगी झेली है, उनके प्रति व्यवस्था का यह रवैया अमानवीय है। नैनीताल हाईकोर्ट की यह सख्ती उन अफसरों के लिए एक कड़ा सबक है जो न्यायिक आदेशों को भी हल्के में लेते हैं। अब देखना होगा कि 10 जून को सरकार कोर्ट के कटघरे में खुद को बचाने के लिए क्या दलील पेश करती है।

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