नई दिल्ली। सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारों के लिए देशभर में चर्चित सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक चले अपने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को समाप्त कर दिया है। उनके इस फैसले के बाद देशभर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक ओर बड़ी संख्या में लोग इसे संवाद और लोकतांत्रिक समाधान की दिशा में उठाया गया सकारात्मक कदम बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ समर्थकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि आंदोलन की प्रमुख मांगों पर ठोस आश्वासन मिलने से पहले अनशन समाप्त करना उचित नहीं था। इसी बीच उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो के राहुल गांधी को लेकर दिए गए बयान ने इस पूरे घटनाक्रम को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है।
गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक ने गुरुवार देर रात चिकित्सकों और अपने समर्थकों की मौजूदगी में उपवास समाप्त किया। उन्होंने कप से पेय पदार्थ का पहला घूंट लेकर अपना अनशन तोड़ा और कहा कि यह निर्णय उन्होंने व्यापक जनहित, देश में शांति बनाए रखने और सरकार के साथ सकारात्मक संवाद की शुरुआत को ध्यान में रखते हुए लिया है। उन्होंने अपने समर्थकों से भी अपील की कि आंदोलन के दौरान किसी भी प्रकार की हिंसा, टकराव या कानून व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से दूर रहें।
वांगचुक ने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के साथ हुई बातचीत के बाद उन्हें यह भरोसा मिला कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया। उनका कहना था कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से समाधान निकालना होता है। यदि बातचीत की संभावनाएं बनती हैं तो उन्हें अवसर दिया जाना चाहिए।
हालांकि इस फैसले के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों तक बहस तेज हो गई है। बड़ी संख्या में लोगों ने वांगचुक के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि उनका स्वस्थ रहना किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए बेहद आवश्यक है। समर्थकों का मानना है कि एक लंबी लड़ाई लड़ने के लिए नेतृत्व का सुरक्षित और सक्रिय रहना जरूरी है। उनका कहना है कि यदि सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई है, तो यह आंदोलन की पहली बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए।
कई शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने भी इस फैसले को सकारात्मक बताया। उनका कहना है कि लोकतंत्र में हर आंदोलन का अंतिम लक्ष्य संवाद और समाधान होता है। यदि सरकार और आंदोलनकारी पक्ष एक टेबल पर बैठकर चर्चा करने को तैयार हैं, तो इसे संघर्ष की हार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जीत माना जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर भी अनेक लोगों ने लिखा कि अनशन समाप्त होना आंदोलन का अंत नहीं बल्कि उसके अगले चरण की शुरुआत है।
दूसरी ओर कुछ समर्थकों ने इस फैसले पर निराशा भी जताई। उनका कहना है कि आंदोलन की मूल मांगों पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय या लिखित आश्वासन सामने नहीं आया है। ऐसे में अनशन समाप्त करने से सरकार को राजनीतिक बढ़त मिल सकती है, जबकि आंदोलन की वास्तविक मांगें अभी भी अधूरी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि लंबे संघर्ष के बाद बना जनदबाव अब कमजोर पड़ सकता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने भी इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए सवाल उठाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि जिन लोगों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था, उन्हीं के हाथों से उपवास तोड़ना कई समर्थकों के लिए निराशाजनक हो सकता है। हालांकि उनके इस बयान पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे वैचारिक असहमति बताया, जबकि अन्य ने कहा कि किसी भी आंदोलन में संवाद से पीछे नहीं हटना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान विपक्ष की भूमिका भी चर्चा में रही। अनशन समाप्त होने से पहले कई विपक्षी सांसद मेदांता अस्पताल पहुंचे और उन्होंने वांगचुक से स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए उपवास समाप्त करने की अपील की थी। विपक्षी नेताओं का कहना था कि उनकी आवाज देशभर में पहुंच चुकी है और अब उन्हें स्वस्थ रहकर आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए। उनका मानना था कि यदि स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता है तो आंदोलन को भी नुकसान हो सकता है।
सरकार की ओर से भी सकारात्मक संकेत दिए गए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह ने अस्पताल पहुंचकर वांगचुक से मुलाकात की। दोनों पक्षों के बीच बातचीत के बाद भविष्य में औपचारिक वार्ता जारी रखने पर सहमति बनी। इसी के बाद वांगचुक ने अनशन समाप्त करने की घोषणा की। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारी पक्ष के बीच विस्तृत चर्चा होगी, जिसमें उनकी प्रमुख मांगों पर विचार किया जाएगा।
इस पूरे मामले में एक नया राजनीतिक विवाद तब खड़ा हुआ जब सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने राहुल गांधी को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि राहुल गांधी वास्तव में छात्रों और आंदोलनकारियों के समर्थन में थे, तो उन्हें प्रधानमंत्री आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन करने के बजाय सीधे जंतर-मंतर जाकर छात्रों के बीच खड़ा होना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि जनता केवल प्रतीकात्मक राजनीति से प्रभावित नहीं होती और वास्तविक समर्थन वहीं माना जाता है, जहां नेता सीधे आंदोलनकारियों के साथ मौजूद दिखाई दें।
गीतांजलि के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। एक वर्ग ने उनके बयान का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने निष्पक्ष और बेबाक राय रखी है। समर्थकों का कहना है कि किसी भी जनआंदोलन में नेताओं की वास्तविक भागीदारी मैदान में दिखाई देनी चाहिए। वहीं कांग्रेस समर्थकों ने इस टिप्पणी का विरोध करते हुए कहा कि राहुल गांधी लगातार सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं और उनका विरोध प्रदर्शन भी उसी अभियान का हिस्सा था। इसलिए उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वांगचुक का स्वास्थ्य भी रहा। लगातार 26 दिनों के उपवास के कारण उनका वजन काफी कम हो गया था और चिकित्सकों ने भी उनकी स्थिति को गंभीर बताया था। बाद में अदालत के निर्देश पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए सफदरजंग अस्पताल से गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार फिलहाल उनकी हालत स्थिर है और वे चिकित्सकीय निगरानी में हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लंबे उपवास के बाद सामान्य आहार की ओर लौटने की प्रक्रिया बेहद सावधानी से अपनाई जाएगी ताकि स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा परिणाम यह होगा कि अब सरकार और आंदोलनकारी पक्ष के बीच औपचारिक वार्ता का रास्ता खुल गया है। जानकारी के अनुसार दोनों पक्षों के बीच संविधान क्लब में बैठक आयोजित करने पर सहमति बनी है। यदि इस बातचीत में सकारात्मक प्रगति होती है और मांगों पर ठोस निर्णय सामने आते हैं, तो इसे आंदोलन की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। वहीं यदि वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंचती, तो आंदोलन दोबारा तेज होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनआंदोलन केवल विरोध का माध्यम नहीं होते, बल्कि सरकार और समाज के बीच संवाद स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करते हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके लंबे चलने में नहीं, बल्कि उसके माध्यम से सकारात्मक समाधान निकलने में होती है।
फिलहाल सोनम वांगचुक के 26 दिन लंबे अनशन के समाप्त होने के बाद देशभर में चर्चा का केंद्र अब यह है कि सरकार और आंदोलनकारी पक्ष के बीच होने वाली आगामी वार्ता क्या परिणाम लेकर आती है। एक ओर समर्थक इसे संवाद की जीत मान रहे हैं, तो दूसरी ओर आलोचकों की नजर इस बात पर है कि क्या आंदोलन की प्रमुख मांगों पर ठोस और लिखित सहमति बनती है या नहीं। आने वाले दिनों की बातचीत ही तय करेगी कि यह फैसला आंदोलन के लिए नई शुरुआत साबित होता है या फिर संघर्ष का अगला चरण।
