गैरसैंण: उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के विधानसभा परिसर भराड़ीसैंण से सटे मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम सारकोट में जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़ा एक मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। करीब 20 नाली पैतृक भूमि को कथित तौर पर गलत तरीके से बेचे जाने का आरोप सामने आने के बाद पीड़ित परिवार पिछले कई महीनों से तहसील कार्यालय के चक्कर काटने को मजबूर है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि जमीन की बिक्री से पहले ही तहसील प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को लिखित शिकायत देकर मामले की जानकारी दी गई थी, इसके बावजूद कथित तौर पर जमीन की रजिस्ट्री हो गई।
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिस भूमि को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी, उसी भूमि की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया आगे बढ़ गई। अब पीड़ित परिवार राजस्व विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक न्याय की गुहार लगा रहा है। परिवार का कहना है कि शिकायत के बावजूद उन्हें ठोस कार्रवाई के बजाय लगातार तारीखें मिल रही हैं।
पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए नौकरी तक छोड़ने का दावा
पीड़ित सुरेंद्र सिंह पुत्र मदन सिंह, निवासी सारकोट, का कहना है कि उनकी पुश्तैनी जमीन को कथित रूप से गलत तरीके से बेचे जाने के बाद परिवार लंबे समय से परेशान है। सुरेंद्र के अनुसार, वह अपनी जमीन को बचाने और मामले की पैरवी करने के लिए अपनी निजी नौकरी तक छोड़ चुके हैं और पिछले करीब छह माह से तहसील कार्यालय तथा संबंधित अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं।
पीड़ित परिवार का कहना है कि जमीन से जुड़ा विवाद केवल संपत्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह उनकी पुश्तैनी जमीन और परिवार के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उनका आरोप है कि यदि समय रहते प्रशासन ने उनकी शिकायत पर कार्रवाई की होती तो विवाद को आगे बढ़ने से रोका जा सकता था।
सुरेंद्र सिंह ने बताया कि मामले को लेकर पहले तहसील कार्यालय और क्षेत्रीय विधायक को शिकायत दी गई। इसके बाद उन्होंने गढ़वाल कमिश्नर को भी पत्र भेजकर न्याय की मांग की है। पीड़ित पक्ष के अनुसार, अब वह चाहता है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और अगर भूमि की बिक्री में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
रजिस्ट्री से पहले ही दी गई थी शिकायत, फिर कैसे हुई बिक्री?
पीड़ित पक्ष के अनुसार, इस मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि जमीन की रजिस्ट्री से पहले ही तहसील गैरसैंण में शिकायत दर्ज कराई गई थी। सुरेंद्र सिंह का कहना है कि उनके पिता मदन सिंह ने 6 अप्रैल को भूमि की बिक्री को लेकर शिकायत की थी, जबकि कथित तौर पर संबंधित जमीन की बिक्री 13 मई को की गई।
यानी शिकायतकर्ता का दावा है कि राजस्व विभाग को जमीन को लेकर विवाद और आपत्ति की जानकारी पहले ही दे दी गई थी। इसके बावजूद यदि रजिस्ट्री हुई है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिकायत के बाद संबंधित अधिकारियों ने क्या कदम उठाए? क्या शिकायत की जांच की गई? क्या रजिस्ट्री से पहले संबंधित रिकॉर्ड की जांच हुई? और यदि आपत्ति लंबित थी तो भूमि की बिक्री की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ी?
इन्हीं सवालों के जवाब अब पीड़ित परिवार प्रशासन से मांग रहा है।
पहले 50 नाली जमीन की बिक्री का मामला आया था सामने
बताया जा रहा है कि मई 2026 में मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम सारकोट में जूनियर हाईस्कूल के नजदीक करीब 50 नाली भूमि की बिक्री का मामला सामने आया था। इस भूमि को लेकर विवाद सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की बात सामने आई।
पीड़ित सुरेंद्र सिंह के अनुसार, कुल 50 नाली भूमि में से 15 नाली जमीन की रजिस्ट्री एक एनजीओ के नाम होने के कारण निरस्त कर दी गई थी। इसके बाद बची हुई करीब 35 नाली भूमि की खरीद-फरोख्त को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सुरेंद्र सिंह का आरोप है कि इस 35 नाली भूमि में से करीब 20 नाली जमीन उनके पिता के हिस्से और कब्जे वाली भूमि से संबंधित है, जिसे कथित तौर पर ऐसे व्यक्ति द्वारा बेच दिया गया जिसके पास उस भूमि पर वास्तविक कब्जा नहीं था।
खसरा नंबरों को लेकर भी उठाए गए सवाल
पीड़ित पक्ष ने भूमि के रिकॉर्ड को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। सुरेंद्र सिंह के अनुसार, खाता-खतौनी संख्या 0093 में खसरा नंबर 663, 671 और 672 उनके पिता महेंद्र सिंह के नाम दर्ज हैं। उनके अनुसार, इन खसरा नंबरों में करीब 12 नाली भूमि शामिल है।
इसके अलावा खसरा नंबर 664 और 668 की करीब 8 नाली जमीन पर भी उनके परिवार का कब्जा होने का दावा किया गया है। पीड़ित का आरोप है कि इन दोनों हिस्सों को मिलाकर करीब 20 नाली भूमि को गलत तरीके से बिक्री में शामिल कर दिया गया।
अब यह जांच का विषय है कि संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में भूमि का वास्तविक स्वामित्व किसके नाम दर्ज था, मौके पर किसका कब्जा था और बिक्री के समय संबंधित दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर की गई।
14 खाताधारकों की सहमति नहीं लेने का आरोप
मामले में एक और महत्वपूर्ण आरोप संयुक्त खाते में शामिल अन्य खाताधारकों की सहमति से जुड़ा है। सुरेंद्र सिंह का कहना है कि संबंधित खाते में कुल 14 खाताधारक शामिल हैं और भूमि की बिक्री के लिए सभी सह-खाताधारकों की सहमति नहीं ली गई।
पीड़ित पक्ष का दावा है कि संयुक्त भूमि की बिक्री में सभी संबंधित पक्षों के अधिकारों और सहमति से जुड़े कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाना जरूरी है। ऐसे में यदि बिना आवश्यक सहमति के भूमि का विक्रय हुआ है तो इसकी वैधानिक स्थिति की जांच किया जाना बेहद जरूरी है।
हालांकि, इन आरोपों की वास्तविक स्थिति प्रशासनिक और कानूनी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
सुनवाई के लिए तारीख पर तारीख का आरोप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि शिकायत के बाद भी मामले की सुनवाई समय पर नहीं हो पा रही है। सुरेंद्र सिंह के अनुसार, 13 जुलाई 2026 को तहसीलदार को लिखित शिकायत दी गई थी। इसके बाद उन्हें 23 जुलाई को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया, लेकिन कथित तौर पर तहसीलदार के अन्यत्र होने के कारण उस दिन सुनवाई नहीं हो सकी।
इसके बाद परिवार 7 अगस्त को भी तहसील पहुंचा, लेकिन उस दिन भी उन्हें अपेक्षित सुनवाई नहीं मिल सकी। पीड़ित का कहना है कि कई महीने बीतने के बावजूद मामले में कोई स्पष्ट और अंतिम कार्रवाई सामने नहीं आई है।
परिवार का सवाल है कि यदि शिकायत गंभीर है और भूमि के रिकॉर्ड को लेकर विवाद है तो उसकी जांच जल्द पूरी क्यों नहीं की जा रही है?
डीएम ने गठित की थी जांच समिति
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी चमोली द्वारा जून 2026 में अपर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जांच समिति गठित किए जाने की बात भी सामने आई है। पीड़ित पक्ष के अनुसार, जांच समिति की रिपोर्ट अभी तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई है।
इसके अलावा सुरेंद्र सिंह का कहना है कि तहसीलदार द्वारा 1 जुलाई 2026 को तैयार की गई जांच रिपोर्ट भी उन्हें नहीं दी जा रही है। पीड़ित परिवार लगातार रिपोर्ट उपलब्ध कराने की मांग कर रहा है।
यही वजह है कि अब प्रशासन की पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। पीड़ित पक्ष का कहना है कि यदि जांच पूरी हो चुकी है तो रिपोर्ट शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि उसे पता चल सके कि प्रशासन ने उसकी शिकायत पर क्या निष्कर्ष निकाला है।
दाखिल-खारिज के इश्तेहार में नाम को लेकर भी विवाद
सुरेंद्र सिंह ने दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में जारी किए गए इश्तेहार को लेकर भी आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि इश्तेहार में दो अलग-अलग व्यक्तियों के नामों को गलत तरीके से एक ही नाम के रूप में दर्शाया गया।
पीड़ित के अनुसार, हरि सिंह पुत्र सिताब सिंह और महेंद्र सिंह पुत्र अषाढ़ सिंह अलग-अलग व्यक्ति हैं, लेकिन संबंधित दस्तावेज में उन्हें कथित तौर पर एक ही नाम से दर्शाया गया। पीड़ित पक्ष का कहना है कि रिकॉर्ड में इस तरह की कथित गलती भूमि विवाद को और गंभीर बना सकती है।
अब यह भी जांच का विषय है कि दस्तावेज तैयार करने के दौरान नामों में गलती कैसे हुई और इसे ठीक करने के लिए राजस्व विभाग ने क्या कदम उठाए।
35 नाली जमीन की खरीद पर भू-कानून के पालन का सवाल
मामले में करीब 35 नाली भूमि की खरीद को लेकर भू-कानून के पालन पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह भूमि रवि चौहान पुत्र कुलदीप चौहान, निवासी अल्मोड़ा और हरि सिंह पुत्र नैन सिंह, निवासी बागेश्वर द्वारा खरीदी गई है।
पीड़ित पक्ष का कहना है कि प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जमीन की खरीद के दौरान उत्तराखंड के लागू भू-कानून और अन्य संबंधित नियमों का पालन हुआ या नहीं।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में भूमि खरीद-बिक्री को लेकर नियमों और प्रतिबंधों पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। ऐसे में किसी भी विवादित भूमि सौदे में रिकॉर्ड, खरीदार की पात्रता, भूमि की प्रकृति और बिक्री की वैधानिक प्रक्रिया की जांच आवश्यक हो जाती है।
तहसीलदार ने कहा- 9 सितंबर को होगी सुनवाई
वहीं पूरे मामले को लेकर गैरसैंण के तहसीलदार हरीश पांडे का कहना है कि कानूनगो से जांच आख्या मांगी गई है। उन्होंने बताया कि 9 सितंबर को आपत्ति की सुनवाई होनी है और उसके बाद उपलब्ध तथ्यों तथा जांच रिपोर्ट के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
तहसीलदार के इस बयान से यह स्पष्ट है कि मामला अभी प्रशासनिक स्तर पर विचाराधीन है और अंतिम कार्रवाई सुनवाई तथा जांच के आधार पर की जानी है।
अब सबसे बड़ा सवाल—शिकायत के बावजूद रजिस्ट्री कैसे हुई?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि यदि पीड़ित परिवार ने जमीन की रजिस्ट्री से पहले ही तहसील और संबंधित अधिकारियों को लिखित शिकायत दे दी थी, तो उसके बावजूद कथित तौर पर जमीन की बिक्री कैसे हो गई?
दूसरा सवाल यह है कि संयुक्त खाते में दर्ज भूमि की बिक्री के दौरान सभी संबंधित खाताधारकों के अधिकारों और सहमति की जांच किस स्तर पर की गई? तीसरा सवाल जांच समिति और तहसील स्तर पर तैयार रिपोर्ट को शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराने से जुड़ा है।
फिलहाल पीड़ित परिवार को 9 सितंबर की सुनवाई से उम्मीद है। परिवार चाहता है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, राजस्व रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या लापरवाही साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए।
मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में जमीन से जुड़े इस विवाद ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और भूमि रिकॉर्ड की पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन आगामी सुनवाई में क्या निर्णय लेता है और कथित रूप से विवादित 20 नाली भूमि के स्वामित्व तथा बिक्री को लेकर वास्तविक स्थिति क्या सामने आती है।
