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सुप्रीम कोर्ट में पवन खेड़ा को झटका: अग्रिम जमानत पर रोक बरकरार, कोर्ट ने उठाए दस्तावेज़ और क्षेत्राधिकार पर सवाल

The Hill India News
Last updated: April 24, 2026 6:10 am
The Hill India News
Published: April 24, 2026
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कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल बड़ी राहत नहीं मिल सकी है। शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाई कोर्ट से मिली अग्रिम जमानत पर लगी रोक को हटाने से इनकार करते हुए उनके द्वारा दायर याचिका और दस्तावेज़ों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से साफ है कि मामला अब सिर्फ जमानत का नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के आचरण और तथ्यों की पारदर्शिता का भी बन गया है।

यह पूरा विवाद उस एफआईआर से जुड़ा है, जो असम में दर्ज की गई थी। यह एफआईआर हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर दर्ज हुई थी। इसी मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए पवन खेड़ा ने पहले तेलंगाना हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत हासिल की थी, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच के सामने हुई। खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी करते हुए कोर्ट से अनुरोध किया कि बुधवार को पारित आदेश एकतरफा था और बिना उनका पक्ष सुने दिया गया था, इसलिए उसे वापस लिया जाए। उन्होंने यह भी मांग की कि कम से कम मंगलवार तक ट्रांजिट बेल बढ़ा दी जाए ताकि खेड़ा असम जाकर वहां नियमित अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल कर सकें।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस दलील से संतुष्ट नहीं दिखा। कोर्ट ने कहा कि याचिका में प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ों में गंभीर विसंगतियां हैं। अदालत ने विशेष रूप से आधार कार्ड के पते और याचिका में दिए गए पते के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि जब मामला असम में दर्ज है, तो याचिका तेलंगाना में क्यों दाखिल की गई। यह भी कहा गया कि दस्तावेज़ों के जरिए अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई है।

सिंघवी ने सफाई देते हुए कहा कि जो गलत दस्तावेज़ दाखिल हुआ, वह जल्दबाजी में हुई एक मानवीय त्रुटि थी। उन्होंने कहा कि बाद में सही दस्तावेज़ हाई कोर्ट में पेश कर दिए गए थे और वहां इसे रिकॉर्ड भी किया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि खेड़ा का ससुराल हैदराबाद में है, और वह अक्सर वहां आते-जाते रहते हैं, इसलिए तेलंगाना में याचिका दायर करना पूरी तरह अनुचित नहीं था।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि याचिका में गलत या जाली दस्तावेज़ लगाए गए हैं, तो इसे “छोटी गलती” नहीं कहा जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण पूरी तरह निष्पक्ष नहीं दिखता और यह न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ के समान है।

असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी याचिका पर प्रारंभिक आपत्ति जताई और कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट को राहत देने में सावधानी बरतनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान सिंघवी ने यह भी दलील दी कि खेड़ा कोई बड़ा अपराधी नहीं हैं और उन्हें केवल कुछ दिनों की राहत दी जाए ताकि वे कानून का पालन करते हुए असम जाकर अपनी याचिका दाखिल कर सकें। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की भी बात उठाई। इसके बावजूद कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह इस स्तर पर कोई ढील देने के मूड में नहीं है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद पवन खेड़ा पर गिरफ्तारी का खतरा बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राहत नहीं मिलने के कारण अब उनके पास सीमित विकल्प बचे हैं और उन्हें जल्द ही असम की अदालतों का रुख करना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि इसमें याचिका दाखिल करने के तरीके, दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता और न्यायालय के प्रति पारदर्शिता जैसे अहम मुद्दे भी शामिल हो गए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पवन खेड़ा इस कानूनी चुनौती का सामना कैसे करते हैं और क्या उन्हें आगे किसी अदालत से राहत मिल पाती है या नहीं।

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