
ईरान के साथ जारी भीषण संघर्ष ने वैश्विक राजनीति और सैन्य संतुलन को नई दिशा दे दी है। इस युद्ध के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य रणनीति और उसकी हथियार आपूर्ति क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ताजा रिपोर्ट्स और अंदरूनी आकलनों के अनुसार, इस युद्ध में अमेरिका ने अपने अत्याधुनिक और लंबी दूरी की मिसाइलों का इतना अधिक उपयोग कर लिया है कि उसका रणनीतिक भंडार अब चिंताजनक स्तर तक घट चुका है।
सूत्रों के मुताबिक, फरवरी के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष में अमेरिका अब तक 1,100 से अधिक लंबी दूरी की स्टील्थ क्रूज मिसाइलें दाग चुका है। यह आंकड़ा इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसके कुल स्टॉक का लगभग आधा हिस्सा माना जा रहा है। खास बात यह है कि इनमें से कई मिसाइलें मूल रूप से चीन जैसे संभावित प्रतिद्वंद्वियों के साथ भविष्य में होने वाले किसी बड़े युद्ध के लिए सुरक्षित रखी गई थीं।
पेंटागन और अमेरिकी कांग्रेस के अधिकारियों के बीच इस स्थिति को लेकर गहरी चिंता देखी जा रही है। उनका मानना है कि ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका अपनी “ग्लोबल मिलिट्री सप्लाई चेन” को कमजोर कर रहा है, जिसका असर आने वाले समय में उसकी सामरिक क्षमता पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने 1,000 से अधिक टॉमहॉक क्रूज मिसाइल का इस्तेमाल किया है। यह संख्या इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि अमेरिका एक साल में जितनी टॉमहॉक मिसाइलें बनाता है, उससे लगभग 10 गुना अधिक उसने कुछ ही हफ्तों में खर्च कर दी हैं। एक टॉमहॉक मिसाइल की कीमत करीब 3.6 मिलियन डॉलर (लगभग 30 करोड़ रुपये) बताई जाती है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में खर्च किस स्तर तक पहुंच चुका है।
केवल आक्रामक मिसाइलों ही नहीं, बल्कि रक्षा प्रणाली पर भी भारी दबाव पड़ा है। अमेरिका ने अब तक 1,200 से ज्यादा पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल दागी हैं, जिनकी कीमत प्रति यूनिट लगभग 4 मिलियन डॉलर है। तुलना करें तो पूरे 2025 में अमेरिका ने सिर्फ 600 पैट्रियट मिसाइलें बनाई थीं, लेकिन इस युद्ध में उससे दोगुनी संख्या का उपयोग हो चुका है।
इसी तरह, जमीन से मार करने वाली ATACMS और अन्य प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलों का भंडार भी तेजी से खत्म होने की कगार पर है। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका की युद्ध तैयारी और हथियार उत्पादन क्षमता के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।
न्यूयॉर्क टाइम्स समेत कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मिसाइलों की कमी को पूरा करने के लिए अमेरिका को एशिया और यूरोप में तैनात अपने सैन्य ठिकानों से हथियार मंगवाने पड़े हैं। इसका सीधा असर यह हुआ है कि रूस और चीन के खिलाफ बनाए गए अमेरिकी मोर्चे अब अपेक्षाकृत कमजोर पड़ गए हैं।
रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समय चीन ताइवान पर कोई बड़ा कदम उठाता है या रूस अपनी आक्रामकता बढ़ाता है, तो अमेरिका के पास तत्काल जवाब देने के लिए पर्याप्त हथियार नहीं होंगे। यह स्थिति वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
इस युद्ध का आर्थिक पहलू भी कम चौंकाने वाला नहीं है। हालांकि व्हाइट हाउस ने आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन स्वतंत्र विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिका अब तक 28 से 35 अरब डॉलर (करीब 3 लाख करोड़ रुपये) इस युद्ध पर खर्च कर चुका है। यानी हर दिन लगभग 1 अरब डॉलर खर्च हो रहे हैं। इतना भारी खर्च न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहा है, बल्कि उसके रक्षा उद्योग की सीमाओं को भी उजागर कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह युद्ध अमेरिका के लिए एक बड़ा सबक साबित हो सकता है। अब तक वह महंगे और अत्याधुनिक हथियारों पर अत्यधिक निर्भर रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां दिखाती हैं कि लंबे युद्धों में यह रणनीति टिकाऊ नहीं है। ऐसे में अमेरिका को सस्ते, तेज़ी से बनने वाले और प्रभावी हथियारों—जैसे अटैक ड्रोन और स्वायत्त प्रणाली—की ओर ध्यान देना होगा।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने हलचल मचा दी है। अमेरिकी नेतृत्व, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी चर्चा में है, इस बात पर विचार कर रहा है कि कैसे वैश्विक मंच पर अपनी साख बनाए रखी जाए। ईरान के साथ युद्ध ने न केवल अमेरिका की सैन्य ताकत की परीक्षा ली है, बल्कि उसकी रणनीतिक योजना और संसाधन प्रबंधन की भी कमजोरियों को उजागर किया है।
कुल मिलाकर, यह युद्ध केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसने वैश्विक शक्ति संतुलन, सैन्य रणनीति और भविष्य की युद्ध नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका इस चुनौती से कैसे उबरता है और अपनी सैन्य तथा आर्थिक रणनीति में क्या बदलाव करता है।



