उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड: पाखरो टाइगर सफारी प्रोजेक्ट फिर चर्चा में, विवादों के बाद नई तैयारी, रोजगार और पर्यटन पर सरकार की नजर

देहरादून: उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बफर जोन में प्रस्तावित पाखरो टाइगर सफारी प्रोजेक्ट एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। लगभग आठ साल पहले शुरू हुई यह महत्वाकांक्षी योजना लंबे समय तक विवादों, जांचों और न्यायिक हस्तक्षेप में उलझी रही। अब राज्य सरकार इसे दोबारा पटरी पर लाने के लिए एक नया रोडमैप तैयार कर रही है। सरकार का साफ कहना है कि इस बार परियोजना को पूरी तरह से कानूनी प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए ही आगे बढ़ाया जाएगा।

पाखरो टाइगर सफारी की परिकल्पना वर्ष 2016-17 के आसपास की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य कॉर्बेट के कोर एरिया पर बढ़ते पर्यटकों के दबाव को कम करना और बफर जोन में नियंत्रित पर्यटन गतिविधियों को विकसित करना था। इसके साथ ही इस परियोजना से स्थानीय युवाओं को रोजगार देने और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की भी योजना थी। कोटद्वार और पौड़ी गढ़वाल के पास स्थित पाखरो क्षेत्र को इस लिहाज से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया।

साल 2019 में इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) और सेंट्रल जू अथॉरिटी (CZA) से अनुमति लेने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी दौरान पाखरो क्षेत्र में टाइगर बाड़ों, कर्मचारियों के आवास और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया गया। हालांकि, यहीं से विवादों की शुरुआत हुई।

परियोजना पर आरोप लगे कि आवश्यक अनुमतियों के बिना ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया और तय सीमा से अधिक पेड़ों की कटाई की गई। सबसे बड़ा विवाद करीब 6000 पेड़ों के कटान को लेकर सामने आया, जिसने इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। इसके बाद मामले की जांच राज्य स्तर पर विजिलेंस, वन विभाग और राष्ट्रीय स्तर पर सीबीआई तथा ईडी जैसी एजेंसियों ने की। इसके अलावा भारत सरकार के डीजी फॉरेस्ट और सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने भी पूरे मामले की समीक्षा की।

हालांकि, जांचों के दौरान इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के ठोस प्रमाण सामने नहीं आ सके। सीबीआई की जांच में भी 1000 पेड़ों के कटान की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई, जबकि ईडी को भी किसी बड़े वित्तीय घोटाले या मनी ट्रेल के साक्ष्य नहीं मिले। इसके बावजूद पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को लेकर सवाल लगातार बने रहे।

मामला अदालतों तक पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पाखरो क्षेत्र में हुए निर्माण को ध्वस्त करने के आदेश दिए। अदालत का यह फैसला इस बात का संकेत है कि पर्यावरणीय नियमों और प्रक्रियाओं के उल्लंघन को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वन विभाग नई कार्ययोजना पर काम कर रहा है। इस योजना के तहत पहले अवैध निर्माण को हटाया जाएगा, फिर उस क्षेत्र को दोबारा हरित बनाने के लिए वृक्षारोपण किया जाएगा और उसके बाद सभी आवश्यक स्वीकृतियां लेकर परियोजना को फिर से शुरू करने की कोशिश की जाएगी। विभाग इस पूरी प्रक्रिया की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसे राज्य सरकार के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट की CEC को भेजा जाएगा।

उत्तराखंड सरकार इस परियोजना को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रही है। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने स्पष्ट कहा है कि सरकार पाखरो टाइगर सफारी को शुरू करने के लिए प्रतिबद्ध है। उनका मानना है कि यह परियोजना राज्य में वाइल्डलाइफ टूरिज्म को नया आयाम दे सकती है और स्थानीय लोगों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा कर सकती है।

पूर्व वन मंत्री हरक सिंह रावत ने भी इस परियोजना का समर्थन किया है। उनका कहना है कि पाखरो में सफारी शुरू करने का निर्णय पहले भी सही था और आज भी यह क्षेत्रीय विकास के लिए जरूरी है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि कुछ कागजी प्रक्रियाओं में लापरवाही जरूर हुई होगी, जिसे अब सुधारने की जरूरत है।

इस पूरे विवाद का असर वन विभाग के अधिकारियों पर भी पड़ा है। कई आईएफएस अधिकारियों को निलंबित किया गया और कुछ को जेल भी जाना पड़ा। यही कारण रहा कि लंबे समय तक सरकार इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचती रही। लेकिन अब एक बार फिर पाखरो प्रोजेक्ट को लेकर सक्रियता बढ़ गई है।

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व पहले से ही देश के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है, जहां हर साल लाखों पर्यटक पहुंचते हैं। पाखरो सफारी के शुरू होने से न केवल पर्यटन का दायरा बढ़ेगा, बल्कि कोर एरिया पर दबाव भी कम हो सकता है। साथ ही पर्यटकों को वन्यजीवों को देखने का एक सुरक्षित और नियंत्रित विकल्प मिलेगा।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना को आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख और पर्यावरणीय नियमों को देखते हुए सरकार को हर कदम बेहद सावधानी से उठाना होगा। यदि सभी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए इसे विकसित किया गया, तो पाखरो टाइगर सफारी उत्तराखंड के पर्यटन और स्थानीय विकास के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button