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आपदा प्रबंधन पर पूर्व सीएम हरीश रावत के तीखे प्रहार: उत्तरकाशी से देहरादून तक सरकार को घेरा

उत्तरकाशी/देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने राज्य की वर्तमान सरकार के आपदा प्रबंधन और विकास कार्यों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अपने दो दिवसीय उत्तरकाशी जनपद के भ्रमण के दौरान रावत ने सीमांत क्षेत्रों की जमीनी हकीकत का जायजा लिया और आरोप लगाया कि सरकार आपदा प्रभावितों के पुनर्वास और चारधाम यात्रा की तैयारियों में पूरी तरह विफल साबित हो रही है।

धराली में भावुक हुए ग्रामीण, रावत ने याद दिलाया 2013 का ‘पुनर्निर्माण मॉडल’

अपने भ्रमण के दौरान हरीश रावत आपदा प्रभावित क्षेत्र धराली पहुंचे, जहाँ ग्रामीणों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि लंबे समय के बाद भी उन्हें व्यावसायिक नुकसान का उचित मुआवजा नहीं मिल सका है। ग्रामीणों का आरोप है कि शासन-प्रशासन को आंदोलन की चेतावनी देने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

इस अवसर पर हरीश रावत ने वर्ष 2012-13 की विनाशकारी केदारनाथ आपदा का उल्लेख करते हुए कहा, “हमारी सरकार ने आपदा से निपटने और प्रभावितों को राहत देने के लिए एक सशक्त मॉडल तैयार किया था। आज की सरकार को उस अनुभव से सीख लेनी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी ग्रामीण अपनी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए दर-दर भटक रहे हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रामीणों की मांग के अनुसार गंगोत्री हाईवे का निर्माण पुराने एलाइनमेंट पर ही होना चाहिए क्योंकि मलबे के नीचे अभी भी लोगों की संपत्तियां दबी हुई हैं।

हर्षिल की झील और चारधाम यात्रा: “चिंता और डर के साथ लौट रहा हूँ”

बृहस्पतिवार को उत्तरकाशी के लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) गेस्ट हाउस में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए हरीश रावत का रुख काफी कड़ा रहा। उन्होंने हर्षिल क्षेत्र की स्थिति को अत्यंत भयावह बताया। रावत ने कहा कि वहां बनी झील आगामी मानसून सत्र में एक बड़े खतरे का संकेत दे रही है, जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है।

हरीश रावत उत्तरकाशी दौरा के दौरान उन्होंने चारधाम यात्रा की तैयारियों पर भी प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि यात्रा शुरू होने में अब बहुत कम समय शेष है, लेकिन बुनियादी ढांचा अभी भी अधूरा है। रावत के अनुसार, जिन कार्यों को यात्रा शुरू होने से कम से कम 15 दिन पहले संपन्न हो जाना चाहिए था, वे अभी भी फाइलों और शुरुआती चरणों में अटके हुए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रशासनिक ढिलाई का खामियाजा न केवल स्थानीय व्यापारियों को, बल्कि देशभर से आने वाले तीर्थयात्रियों को भी भुगतना पड़ सकता है।

प्रमुख मांगें: कर्ज माफी और भूधंसाव पर ठोस नीति

पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार के सामने कुछ प्रमुख मांगें रखीं, जिनमें प्रमुख रूप से आपदा प्रभावितों के कर्ज को माफ करने की बात कही गई। उन्होंने जोर देकर कहा कि:

  1. आपदा प्रभावितों का ऋण माफ किया जाए: आर्थिक रूप से टूट चुके ग्रामीणों को संबल देने के लिए सरकार को उनके ऋणों पर राहत देनी चाहिए।

  2. सरकारी भूमि पर नुकसान का आकलन: जिन लोगों का नुकसान सरकारी भूमि पर हुआ है, उनके प्रति भी सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सहायता प्रदान करनी चाहिए।

  3. भटवाड़ी भूधंसाव: भटवाड़ी क्षेत्र में हो रहे निरंतर भूधंसाव पर चिंता व्यक्त करते हुए रावत ने तत्काल भूगर्भीय जांच और विस्थापन की नीति स्पष्ट करने की मांग की।

देहरादून में आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे रावत

उत्तरकाशी का दौरा समाप्त कर ‘अर्जित अवकाश’ काट रहे पूर्व मुख्यमंत्री अचानक हेलीकॉप्टर से देहरादून पहुंचे। वे सीधे सहस्त्रधारा रोड स्थित एकता विहार पहुंचे, जहाँ विभिन्न संगठन अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। यहाँ उन्होंने नर्सिंग एकता मंच, पीआरडी कर्मियों और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग कर रहे आंदोलनकारियों से मुलाकात की।

रावत ने आंदोलनरत युवाओं और कर्मचारियों को अपना समर्थन देते हुए कहा कि उनकी मांगें जायज हैं और सरकार को हठधर्मिता छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से गैरसैंण के मुद्दे पर कहा कि उत्तराखंड की जनभावनाओं का सम्मान करते हुए इसे स्थायी राजधानी के रूप में विकसित करना ही राज्य आंदोलन के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

हरीश रावत के इस दौरे ने राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। एक ओर जहां वे आपदा प्रबंधन के अपने पुराने अनुभवों के आधार पर वर्तमान सरकार को घेर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चारधाम यात्रा जैसे संवेदनशील विषय पर उनकी टिप्पणियों ने शासन-प्रशासन को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। अब देखना यह होगा कि सरकार इन उठाए गए बिंदुओं पर क्या सुधारात्मक कदम उठाती है।

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