
नैनीताल। देवभूमि उत्तराखंड में क्रिकेट के भविष्य को संवारने वाली संस्था ‘क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड’ (CAU) एक बार फिर कानूनी पिच पर घिरती नजर आ रही है। एसोसिएशन के भीतर कथित वित्तीय अनियमितताओं, बीसीसीआई (BCCI) से प्राप्त करोड़ों की धनराशि के दुरुपयोग और पदाधिकारियों को हटाए जाने के विवाद को लेकर उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार सहित अन्य संबंधित पक्षों को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है पूरा विवाद? ‘स्पेशल अपील’ ने बढ़ाई हलचल
यह कानूनी लड़ाई उस समय और अधिक पेचीदा हो गई जब एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष धीरज भंडारी ने एकलपीठ के पुराने आदेश को खंडपीठ में विशेष अपील (Special Appeal) के जरिए चुनौती दी। दरअसल, इससे पहले एकलपीठ ने इन याचिकाओं को ‘मेंटेनेबल’ (सुनवाई योग्य) न मानते हुए खारिज कर दिया था और याचिकाकर्ताओं को राहत के लिए सिविल कोर्ट जाने की सलाह दी थी।
अब खंडपीठ में दायर इस नई अपील ने मामले को फिर से जीवित कर दिया है। याचिकाकर्ता धीरज भंडारी, डॉ. बुद्धि चंद रमोला और संजय गुसाईं का आरोप है कि एसोसिएशन के भीतर न केवल वित्तीय अराजकता का माहौल है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को दरकिनार कर पदाधिकारियों को मनमाने ढंग से हटाया जा रहा है।
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करोड़ों का फंड और ऑडिट रिपोर्ट का पेंच
उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन विवाद के केंद्र में बीसीसीआई की ओर से जारी की गई भारी-भरकम धनराशि है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि बीसीसीआई ने प्रदेश में क्रिकेट के बुनियादी ढांचे और विकास के लिए करोड़ों रुपये जारी किए हैं, लेकिन इसका कोई पारदर्शी लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि:
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एक स्वतंत्र ऑडिट (Independent Audit) में वित्तीय गड़बड़ियों की पुष्टि हो चुकी है।
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नियमानुसार आय-व्यय का विवरण वेबसाइट पर सार्वजनिक होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
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एसोसिएशन के धन का उपयोग व्यक्तिगत हितों और संदिग्ध कार्यों में किया जा रहा है।
लोकपाल की भूमिका और संवैधानिक सवाल
विवाद का एक सिरा धीरज भंडारी को उपाध्यक्ष पद से हटाए जाने से भी जुड़ा है। एसोसिएशन और बीसीसीआई की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि धीरज भंडारी को लोकपाल (Ombudsman) के आदेश पर हटाया गया है और यह एक आंतरिक प्रशासनिक प्रक्रिया है। उन्होंने याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए कहा कि लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं और यह याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं है।
वहीं, याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि लोकपाल की कार्रवाई पक्षपातपूर्ण थी और यह सब उन आवाजों को दबाने के लिए किया गया जो भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ रही थीं। उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाई है कि जब स्वतंत्र ऑडिट में गड़बड़ी की बात सामने आई है, तो इसकी उच्चस्तरीय जांच अनिवार्य है।
कोर्ट का रुख: “दो सप्ताह में पेश करें हलफनामा”
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने खंडपीठ को अवगत कराया कि पिछली सुनवाई के आदेश के बावजूद विपक्षी दलों ने अभी तक अपनी कोई आधिकारिक आपत्ति या जवाब दाखिल नहीं किया है। याचिकाकर्ता ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शीघ्र सुनवाई की मांग की।
इस पर मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने नाराजगी जाहिर करते हुए विपक्षी पक्षों को आदेश दिया कि वे अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों का बिंदुवार उत्तर दो सप्ताह के भीतर शपथ पत्र के माध्यम से प्रस्तुत करें। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब गेंद राज्य सरकार और क्रिकेट एसोसिएशन के पाले में है।
उत्तराखंड क्रिकेट के भविष्य पर प्रश्नचिह्न?
उत्तराखंड को बीसीसीआई की पूर्ण सदस्यता मिलने के बाद से ही एसोसिएशन विवादों का अखाड़ा बनी रही है। कभी खिलाड़ियों के चयन में धांधली के आरोप लगते हैं, तो कभी खर्चों को लेकर प्रबंधन पर सवाल उठते हैं। उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन विवाद के चलते प्रदेश की उभरती हुई क्रिकेट प्रतिभाओं के भविष्य पर भी संकट के बादल मंडराने लगते हैं।
खेल प्रेमियों और युवा क्रिकेटरों की नजरें अब हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह न केवल एसोसिएशन के मौजूदा नेतृत्व के लिए मुश्किल पैदा करेगा, बल्कि बीसीसीआई को भी उत्तराखंड में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर कर सकता है।
हाई कोर्ट की खंडपीठ द्वारा मांगा गया जवाब यह संकेत देता है कि अब मामले की जड़ तक पहुंचने की कोशिश की जाएगी। लोकतंत्र और खेल जगत में शुचिता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि सार्वजनिक धन का एक-एक पैसा खेल की भलाई के लिए खर्च हो। नैनीताल हाई कोर्ट का यह दखल उत्तराखंड क्रिकेट में स्वच्छता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।



