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किशाऊ बांध परियोजना का रास्ता साफ: अमित शाह के हस्तक्षेप से खत्म हुआ वर्षों पुराना विवाद, उत्तराखंड को बड़ी राहत

The Hill India News
Last updated: June 17, 2026 5:35 am
The Hill India News
Published: June 17, 2026
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नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद अब समाप्त होने की ओर बढ़ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में परियोजना से जुड़े सभी राज्यों के बीच महत्वपूर्ण सहमति बन गई। बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने परियोजना के क्रियान्वयन के लिए एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर सहमति जताई है। इस फैसले को उत्तराखंड के लिए बड़ी उपलब्धि और यमुना बेसिन के विकास की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

Contents
हिमाचल प्रदेश की सहमति से खुला रास्ताकेंद्र सरकार उठाएगी अधिकांश खर्चउत्तराखंड को मिलेगा ब्याजमुक्त ऋणयमुना को मिलेगा स्वच्छ जल, बढ़ेगी बिजली उत्पादन क्षमताक्या है किशाऊ बांध परियोजना?

बैठक में केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत केंद्र और राज्यों के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। लंबे समय से वित्तीय बोझ, जल बंटवारे और अन्य तकनीकी मुद्दों को लेकर अटकी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सभी पक्षों ने सकारात्मक रुख अपनाया।

हिमाचल प्रदेश की सहमति से खुला रास्ता

किशाऊ परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिमाचल प्रदेश की ओर से उठाई जा रही वित्तीय और जल हिस्सेदारी संबंधी आपत्तियां थीं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद इस मुद्दे का समाधान निकाल लिया गया। सहमति के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक की लागत का हिस्सा अन्य राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा।

इसके बदले हिमाचल प्रदेश को आवंटित जल का एक हिस्सा दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा। इस व्यवस्था से हिमाचल प्रदेश पर पड़ने वाला आर्थिक भार कम होगा और परियोजना को लेकर उसकी सहमति सुनिश्चित हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता सभी राज्यों के हितों को संतुलित करने वाला समाधान साबित होगा।

केंद्र सरकार उठाएगी अधिकांश खर्च

बैठक में तय किया गया कि परियोजना के जल घटक से जुड़े कार्यों की 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत वित्तीय भार छह राज्यों के बीच साझा किया जाएगा। इससे राज्यों पर आर्थिक दबाव काफी कम होगा और परियोजना के शीघ्र क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त होगा।

केंद्र सरकार का यह निर्णय राष्ट्रीय महत्व की जल परियोजनाओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। माना जा रहा है कि परियोजना को जल्द ही केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष अंतिम मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।

उत्तराखंड को मिलेगा ब्याजमुक्त ऋण

बैठक में उत्तराखंड के लिए भी राहत भरा फैसला लिया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि राज्य को अपने हिस्से की लागत वहन करने के लिए विशेष सहायता योजना के तहत ब्याजमुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इससे परियोजना में उत्तराखंड की भागीदारी आसान होगी और राज्य के वित्तीय संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि इससे राज्य के विकास को नई गति मिलेगी और लंबे समय से लंबित परियोजना को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

यमुना को मिलेगा स्वच्छ जल, बढ़ेगी बिजली उत्पादन क्षमता

किशाऊ बहु-उद्देशीय परियोजना केवल एक बांध निर्माण योजना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य जल संरक्षण, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन को बढ़ावा देना भी है। परियोजना के पूरा होने के बाद यमुना नदी में वर्षभर अधिक मात्रा में स्वच्छ जल का प्रवाह सुनिश्चित किया जा सकेगा।

सरकार का मानना है कि इससे दिल्ली समेत यमुना बेसिन के कई राज्यों को लाभ मिलेगा। साथ ही परियोजना से बड़े पैमाने पर जलविद्युत उत्पादन भी होगा, जिससे स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में देश को मजबूती मिलेगी।

क्या है किशाऊ बांध परियोजना?

किशाऊ डैम परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस नदी, यमुना की सबसे प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। यह परियोजना दशकों से चर्चा में रही है, लेकिन वित्तीय हिस्सेदारी, पानी के बंटवारे, पर्यावरणीय प्रभाव और संभावित विस्थापन जैसे मुद्दों के कारण इसका काम आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

अब सभी संबंधित राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद उम्मीद की जा रही है कि परियोजना जल्द ही औपचारिक मंजूरी प्राप्त कर निर्माण चरण में प्रवेश करेगी। यदि ऐसा होता है तो यह उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण जल और ऊर्जा परियोजनाओं में से एक साबित हो सकती है।

कुल मिलाकर, अमित शाह की पहल से बने इस सहमति सूत्र ने न केवल वर्षों पुराने विवाद को समाप्त करने का रास्ता खोला है, बल्कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और यमुना बेसिन के अन्य राज्यों के लिए विकास की नई संभावनाएं भी पैदा कर दी हैं।

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