नई दिल्ली। भारतीय कुश्ती जगत के बहुचर्चित यौन उत्पीड़न मामले में मंगलवार को बड़ा कानूनी मोड़ आया, जब दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) अध्यक्ष और पूर्व भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह तथा सह-आरोपी विनोद तोमर को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। लगभग साढ़े तीन वर्षों तक चले इस हाई-प्रोफाइल मामले में अदालत के फैसले के बाद बृज भूषण शरण सिंह ने पहली बार खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा कि यदि उनके खिलाफ एक भी आरोप साबित हो जाता, तो वह स्वयं फांसी पर लटकने को तैयार थे।
अदालत के फैसले के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए बृज भूषण शरण सिंह ने कहा कि न्यायपालिका पर उन्हें शुरू से भरोसा था। उन्होंने कहा, “कोर्ट ने सबसे पहले कहा कि बृज भूषण शरण सिंह और विनोद तोमर, आप दोनों को बाइज्जत बरी किया जाता है। मैंने पहले दिन से कहा था कि अगर मेरे खिलाफ एक भी आरोप साबित हो जाता तो मैं स्वयं फांसी पर लटक जाता। आज अदालत ने मुझे सम्मानपूर्वक बरी किया है। यह मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए और मेरे समर्थकों के लिए संतोष और सम्मान का विषय है।”
यह मामला जनवरी 2023 में उस समय चर्चा में आया था, जब देश की कई अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला पहलवानों ने बृज भूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए थे। इन आरोपों के बाद देशभर में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया था। महिला पहलवानों ने तत्कालीन केंद्रीय खेल मंत्री से कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबा धरना शुरू किया।
यह प्रदर्शन भारतीय खेल इतिहास के सबसे चर्चित आंदोलनों में से एक बन गया था। ओलंपिक और विश्व स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी महिला पहलवानों ने कई महीनों तक न्याय की मांग को लेकर संघर्ष किया। आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई, राजनीतिक बयानबाजी और विभिन्न सामाजिक संगठनों के समर्थन ने इस मामले को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया था।
इसके बाद दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच की और अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। बृज भूषण शरण सिंह को जमानत मिल गई थी और तब से मामला न्यायालय में विचाराधीन था। लंबे समय तक चली सुनवाई, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।
हालांकि अदालत का यह फैसला कानूनी प्रक्रिया का परिणाम है, लेकिन इस मामले ने भारतीय खेल व्यवस्था, महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और खेल संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े किए। इस पूरे घटनाक्रम ने यह बहस तेज की कि खिलाड़ियों की शिकायतों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करने के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था कितनी आवश्यक है।
बृज भूषण शरण सिंह उत्तर प्रदेश के कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र से कई बार सांसद रह चुके हैं और लंबे समय तक भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष भी रहे। राजनीतिक रूप से भी वह एक प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। हाल के महीनों में उन्होंने सार्वजनिक मंचों से अपनी ही पार्टी और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर नाराजगी जाहिर की थी। बिहार के भागलपुर में आयोजित बाबू वीर कुंवर सिंह विजय उत्सव के मंच से उन्होंने कहा था कि यदि किसी को लगता है कि उनकी अब जरूरत नहीं रही, तो उन्हें स्पष्ट बता दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि चाहे 2027 हो या 2029 का चुनाव, वह अपनी राजनीतिक उपयोगिता फिर साबित करके दिखाएंगे।
उन्होंने उस दौरान क्षत्रिय समाज से भी एकजुट होने की अपील की थी और कहा था कि समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत है। उनके इन बयानों को पार्टी के भीतर उनकी नाराजगी और भविष्य की राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा गया था।
अब अदालत से बरी होने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस फैसले से बृज भूषण शरण सिंह की राजनीतिक सक्रियता फिर बढ़ेगी और भारतीय जनता पार्टी में उनकी भूमिका पहले जैसी मजबूत होगी। हालांकि इस पर अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।
वहीं दूसरी ओर, यह मामला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में अदालत का फैसला प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होता है। अदालत द्वारा बरी किए जाने का अर्थ यह है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध नहीं हो सके। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे जुड़े सभी पक्षों के अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है।
फिलहाल, राउज एवेन्यू कोर्ट के इस फैसले के साथ देश के सबसे चर्चित खेल और राजनीतिक विवादों में से एक मामले का महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय समाप्त हो गया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस फैसले के बाद बृज भूषण शरण सिंह की राजनीतिक और सार्वजनिक भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है, और क्या इस पूरे प्रकरण से खेल प्रशासन और खिलाड़ियों की शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था में भविष्य के लिए कोई ठोस बदलाव देखने को मिलेगा।
