चमोली। उत्तराखंड की सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पहाड़ियों में भारत और अमेरिका की सेनाओं ने संयुक्त सैन्य अभ्यास के जरिए अपनी युद्ध तैयारियों को परखना शुरू कर दिया है। चमोली जिले के औली स्थित विदेशी प्रशिक्षण केंद्र में मंगलवार, 15 सितंबर को भारत-अमेरिका संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास-2026’ के 22वें संस्करण का आगाज हुआ। इस बहुपक्षीय सैन्य प्रशिक्षण में दोनों देशों के करीब 1,200 सैनिक हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें भारतीय सेना और अमेरिकी सेना के लगभग 600-600 जवान शामिल हैं।
इस वर्ष का अभ्यास केवल पारंपरिक सैन्य प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक, ड्रोन, स्वायत्त प्रणालियों, बहु-क्षेत्रीय युद्ध और कठिन पर्वतीय परिस्थितियों में संयुक्त अभियान की क्षमता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। अभ्यास का उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी, यानी अलग-अलग सैन्य प्रणालियों और इकाइयों के बीच मिलकर प्रभावी ढंग से अभियान चलाने की क्षमता को और मजबूत करना है।
औली में 600-600 जवानों ने संभाला मोर्चा
अभ्यास के उद्घाटन समारोह में भारतीय सेना की 14वीं इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल अमरेश गुंजन और अमेरिकी सेना की 11वीं एयरबोर्न डिवीजन की पहली इन्फैंट्री ब्रिगेड कॉम्बैट टीम के कमांडर कर्नल बेंजामिन जैकमैन ने दोनों देशों के सैन्य दलों को संबोधित किया। दोनों पक्षों के करीब 600-600 सैनिक इस अभ्यास में शामिल हैं।
औली में अभ्यास का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां की ऊंचाई और पर्वतीय भूभाग सैनिकों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में प्रशिक्षण का अवसर देता है। पहाड़ों में सैन्य अभियान चलाना मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अलग तरह की तैयारी और रणनीति की मांग करता है। ऐसे में दोनों सेनाओं के जवान कठिन भूभाग में संयुक्त अभियान की योजना और उसके क्रियान्वयन का अभ्यास करेंगे।
पर्वतीय और अर्ध-पर्वतीय युद्ध पर विशेष फोकस
‘युद्ध अभ्यास-2026’ का प्रमुख उद्देश्य पर्वतीय और अर्ध-पर्वतीय क्षेत्रों में इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स के इस्तेमाल तथा पैदल सेना आधारित अभियानों की क्षमता को मजबूत करना है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं संयुक्त योजना, अभियान संचालन और अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में समन्वित कार्रवाई की प्रक्रियाओं का अभ्यास करेंगी।
पर्वतीय युद्ध में मौसम, ऊंचाई, सीमित सड़क संपर्क, कठिन भूगोल और सैनिकों की आवाजाही जैसी कई चुनौतियां होती हैं। औली जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्र में प्रशिक्षण से सैनिकों को वास्तविक परिस्थितियों के करीब अभ्यास करने का अवसर मिलता है।
भारत के लिए यह अभ्यास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सेना को हिमालयी क्षेत्र में लंबे समय से उच्च ऊंचाई वाले इलाकों में तैनाती और संचालन का अनुभव है। वहीं अमेरिकी सैनिकों को भारतीय सैनिकों के पर्वतीय संचालन से जुड़े अनुभवों और प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलता है।
ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियां भी होंगी अभ्यास का हिस्सा
इस बार ‘युद्ध अभ्यास’ में आधुनिक तकनीक पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अभ्यास के दौरान ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियों का इस्तेमाल निगरानी और टोही अभियानों के लिए किया जाएगा। इससे सैनिकों को आधुनिक युद्धक्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल और उसके साथ तालमेल का व्यावहारिक अनुभव मिलेगा।
आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, लक्ष्य की पहचान और युद्धक्षेत्र की स्थिति का आकलन करने जैसे कार्यों में तेजी से बढ़ा है। ऐसे में दोनों सेनाओं के बीच इन तकनीकों के इस्तेमाल से जुड़ी प्रक्रियाओं और अनुभवों का आदान-प्रदान भी अभ्यास का अहम हिस्सा है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, राजस्थान की महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में समकालीन हथियार प्रणालियों का प्रदर्शन भी किया जाएगा। इस तरह अभ्यास को दो अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों—पर्वतीय क्षेत्र और रेगिस्तानी/मैदानी फायरिंग क्षेत्र—में संचालित किया जा रहा है।
औली और राजस्थान में एक साथ सैन्य अभ्यास
‘युद्ध अभ्यास-2026’ की खास बात इसका दो-स्थलीय स्वरूप है। एक तरफ उत्तराखंड के औली में ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाके में सैन्य प्रशिक्षण चल रहा है, तो दूसरी तरफ राजस्थान की महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में फील्ड प्रशिक्षण और हथियार प्रणालियों से संबंधित गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं।
इससे दोनों सेनाओं को अलग-अलग तरह के भूभाग और परिचालन परिस्थितियों में संयुक्त सैन्य प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिल रहा है। विशेषज्ञों के बीच उभरती सैन्य तकनीकों और मल्टी-डोमेन वारफेयर यानी कई क्षेत्रों में एक साथ संचालित होने वाले आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया जाएगा।
दोनों सेनाएं साझा करेंगी युद्धक अनुभव
यह अभ्यास केवल हथियारों और युद्धाभ्यास तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के सैन्य विशेषज्ञ अपने अनुभव, रणनीति, तकनीक और संचालन प्रक्रियाओं को भी साझा करेंगे। इसका उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच आपसी समझ को बेहतर बनाना और जरूरत पड़ने पर संयुक्त अभियानों के लिए प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाना है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं अपनी टैक्टिक्स, टेक्निक्स और प्रोसीजर्स साझा करेंगी। इससे सैनिकों को अलग-अलग सैन्य प्रणालियों को समझने और उनके साथ मिलकर काम करने का अनुभव मिलेगा।
इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाने पर जोर
भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच सैन्य सहयोग को मजबूत करने में ‘युद्ध अभ्यास’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस अभ्यास में इंटरऑपरेबिलिटी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। इसका अर्थ है कि अलग-अलग देशों की सेनाएं अपने उपकरणों, संचार प्रणालियों, कमांड संरचनाओं और संचालन प्रक्रियाओं के बावजूद संयुक्त रूप से प्रभावी अभियान संचालित कर सकें।
इस बार कठिन भूभाग, पैदल सेना आधारित अभियान, आधुनिक तकनीक और बहु-क्षेत्रीय युद्ध की बदलती जरूरतों को एक साथ अभ्यास में शामिल किया गया है। इससे सैनिकों को अधिक जटिल परिचालन परिस्थितियों में समन्वय स्थापित करने का प्रशिक्षण मिलेगा।
भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग में एक और महत्वपूर्ण कड़ी
भारत और अमेरिका के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास दोनों देशों के रक्षा सहयोग का एक प्रमुख हिस्सा हैं। ‘युद्ध अभ्यास’ के माध्यम से दोनों सेनाओं को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली, युद्धक तकनीक और परिचालन प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलता है।
इस वर्ष औली में शुरू हुआ अभ्यास उत्तराखंड के लिए भी महत्वपूर्ण है। राज्य का ऊंचाई वाला हिमालयी भूभाग पर्वतीय युद्ध प्रशिक्षण के लिए विशेष परिस्थितियां उपलब्ध कराता है। करीब 1,200 सैनिकों की मौजूदगी और आधुनिक सैन्य तकनीकों के इस्तेमाल से यह अभ्यास व्यापक प्रशिक्षण गतिविधि के रूप में सामने आया है।
कुल मिलाकर, ‘युद्ध अभ्यास-2026’ में औली की पहाड़ियों से लेकर राजस्थान की फायरिंग रेंज तक दोनों देशों के सैनिक अपनी संयुक्त सैन्य क्षमताओं को परख रहे हैं। पर्वतीय युद्ध, ड्रोन, स्वायत्त प्रणालियां, आधुनिक हथियार, बहु-क्षेत्रीय युद्ध और संयुक्त अभियान की योजना इस अभ्यास के प्रमुख केंद्र में हैं। औली में शुरू हुआ यह सैन्य अभ्यास भारत और अमेरिका की सेनाओं को अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में साथ काम करने और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर रहा है।
