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Reading: उत्तराखंड में एसटी प्रमाण पत्रों पर बड़ा विवाद: राज्य गठन के बाद जारी सभी प्रमाण पत्रों की जांच की मांग, सरकारी लाभों की भी हो सकती है समीक्षा
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उत्तराखंड में एसटी प्रमाण पत्रों पर बड़ा विवाद: राज्य गठन के बाद जारी सभी प्रमाण पत्रों की जांच की मांग, सरकारी लाभों की भी हो सकती है समीक्षा

The Hill India News
Last updated: June 17, 2026 5:07 am
The Hill India News
Published: June 17, 2026
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देहरादून। उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्रों को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने राज्य गठन के बाद जारी किए गए सभी एसटी प्रमाण पत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है। उन्होंने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को पत्र लिखकर कहा है कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से अब तक जारी किए गए सभी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही इन प्रमाण पत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, आरक्षण और अन्य सरकारी लाभों की भी समीक्षा की जाए।

Contents
राज्य गठन के बाद जारी प्रमाण पत्रों की जांच की मांगसंविधान के अनुच्छेद-342 का दिया हवालासुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेखदेहरादून जिले के कुछ क्षेत्रों पर उठाए सवालकई शिकायतों का किया दावासामाजिक न्याय और उप-वर्गीकरण पर भी रखी बातजनजातीय कार्य मंत्रालय को भी भेजा गया पत्राचारदोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांगलाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांगलाखों युवाओं और वास्तविक जनजातीय समुदायों से जुड़ा मुद्दासरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी निगाहें

विकेश सिंह नेगी का कहना है कि यह केवल प्रमाण पत्र जारी करने का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि संविधान, राष्ट्रपति की अधिसूचनाओं, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र जारी करने में नियमों की गलत व्याख्या की गई हो सकती है, जिसके कारण ऐसे लोगों को भी लाभ मिला हो जो संवैधानिक रूप से इसके पात्र नहीं थे।

राज्य गठन के बाद जारी प्रमाण पत्रों की जांच की मांग

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में विकेश नेगी ने मांग की है कि 28 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से लेकर अब तक जारी किए गए सभी एसटी प्रमाण पत्रों की राज्यव्यापी जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि जांच में यह पाया जाता है कि किसी व्यक्ति को नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत प्रमाण पत्र जारी किया गया है, तो ऐसे प्रमाण पत्रों को निरस्त किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे प्रमाण पत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, मुआवजों, भूमि आवंटनों तथा आरक्षण से जुड़े अन्य लाभों की कानूनी समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

संविधान के अनुच्छेद-342 का दिया हवाला

विकेश सिंह नेगी ने अपने पत्र में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 का उल्लेख करते हुए कहा है कि अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति के पास है। इस सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन, परिवर्तन या नई जाति को शामिल करने का अधिकार केवल संसद को प्राप्त है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार, जिला प्रशासन या कोई अन्य प्राधिकरण अनुसूचित जनजातियों की सूची में बदलाव नहीं कर सकता। इसलिए यदि किसी स्तर पर राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से अलग किसी जाति, उपजाति या स्थानीय पहचान के आधार पर प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं, तो यह गंभीर संवैधानिक प्रश्न है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेख

अपने पत्र में विकेश नेगी ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित “स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000)” मामले का हवाला भी दिया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जनजाति की सूची को उसी स्वरूप में स्वीकार किया जाएगा जैसा कि राष्ट्रपति की अधिसूचना में वर्णित है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि किसी जाति, उपजाति या स्थानीय समूह को केवल समानता या परंपरागत दावों के आधार पर अनुसूचित जनजाति नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका नाम अधिसूचित सूची में स्पष्ट रूप से दर्ज न हो। नेगी का कहना है कि इस फैसले की रोशनी में राज्य में जारी हुए सभी विवादित प्रमाण पत्रों की जांच आवश्यक है।

देहरादून जिले के कुछ क्षेत्रों पर उठाए सवाल

विकेश सिंह नेगी ने विशेष रूप से देहरादून जिले के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता और आसपास के क्षेत्रों का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इन इलाकों में लंबे समय से एसटी प्रमाण पत्रों के जारी होने को लेकर विवाद और शिकायतें सामने आती रही हैं।

उन्होंने कहा कि यदि इन क्षेत्रों में नियमों की गलत व्याख्या कर प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं, तो इससे वास्तविक पात्र लोगों के अधिकार प्रभावित हुए होंगे। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाना आवश्यक है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला केवल देहरादून जिले तक सीमित नहीं है। राज्य के सभी 13 जिलों में जारी किए गए अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि पूरे प्रदेश में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।

कई शिकायतों का किया दावा

आरटीआई एक्टिविस्ट ने दावा किया है कि उन्हें कई ऐसी शिकायतें प्राप्त हुई हैं जिनमें आरोप लगाया गया है कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से अलग नामों अथवा उपजातियों के आधार पर भी एसटी प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं।

यदि जांच में ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत होगा, बल्कि वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला मामला माना जाएगा। नेगी का कहना है कि इस प्रकार की अनियमितताओं की स्थिति में सरकार को कठोर कदम उठाने चाहिए।

सामाजिक न्याय और उप-वर्गीकरण पर भी रखी बात

विकेश सिंह नेगी ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ द्वारा दिए गए “स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024)” फैसले का भी उल्लेख किया है।

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य से राज्य सरकारें उप-वर्गीकरण कर सकती हैं, लेकिन अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति की मूल सूची में नई जाति जोड़ने या किसी नाम में परिवर्तन करने का अधिकार केवल संसद के पास है।

नेगी का कहना है कि इस संवैधानिक व्यवस्था का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए ताकि आरक्षण और सामाजिक न्याय की मूल भावना सुरक्षित रह सके।

जनजातीय कार्य मंत्रालय को भी भेजा गया पत्राचार

विकेश सिंह नेगी के अनुसार इस विषय को लेकर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय से भी पत्राचार किया गया था। मंत्रालय की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित विषय संविधान के अनुच्छेद-342 के अंतर्गत आता है और इससे जुड़ा कोई भी अंतिम निर्णय संसद के माध्यम से ही संभव है।

इस जवाब को आधार बनाते हुए उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि एसटी प्रमाण पत्रों से जुड़े मामलों की कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर जांच कराई जाए।

दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में नेगी ने यह भी मांग की है कि यदि जांच के दौरान किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ विभागीय, दंडात्मक और आवश्यक होने पर आपराधिक कार्रवाई भी की जाए।

उन्होंने कहा कि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की जवाबदेही तय होना जरूरी है ताकि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं की पुनरावृत्ति न हो सके।

लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग

विकेश सिंह नेगी ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए एक और महत्वपूर्ण मांग उठाई है। उन्होंने कहा है कि राज्य के सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों, निगमों, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पुलिस विभाग, पंचायत संस्थाओं और स्थानीय निकायों में एसटी प्रमाण पत्र के आधार पर लाभ प्राप्त करने वाले लोगों का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

उनका मानना है कि इससे पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी और आम जनता को भी जानकारी मिल सकेगी कि किन लोगों को आरक्षण एवं अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ मिला है।

लाखों युवाओं और वास्तविक जनजातीय समुदायों से जुड़ा मुद्दा

विकेश सिंह नेगी का कहना है कि यह विषय केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के लाखों युवाओं के भविष्य और वास्तविक जनजातीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। यदि अपात्र लोगों को लाभ मिला है तो इसका सीधा असर उन पात्र युवाओं पर पड़ा होगा जो सरकारी नौकरियों, छात्रवृत्तियों और आरक्षण के अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।

उन्होंने सरकार से मांग की है कि पूरे मामले की समयबद्ध जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और यदि आवश्यक हो तो अवैध रूप से प्राप्त लाभों की भी समीक्षा की जाए।

सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी निगाहें

अब इस पूरे मामले में राज्य सरकार और प्रशासन की प्रतिक्रिया पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। यदि सरकार इस मांग पर कार्रवाई करती है तो उत्तराखंड में पिछले लगभग 26 वर्षों के दौरान जारी हुए हजारों एसटी प्रमाण पत्रों की जांच का रास्ता खुल सकता है। वहीं दूसरी ओर, यह मामला संवैधानिक प्रावधानों, सामाजिक न्याय और आरक्षण व्यवस्था से जुड़ा होने के कारण राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी व्यापक चर्चा का विषय बनता जा रहा है।

फिलहाल, आरटीआई एक्टिविस्ट विकेश सिंह नेगी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि इस मामले में समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती है तो वह इसे न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर के मंचों पर भी उठाएंगे। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है।

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