नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र लगातार राजनीतिक टकराव, विपक्ष के विरोध और सदनों में हंगामे के बीच आगे बढ़ रहा है। एक ओर विपक्ष विभिन्न मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार को घेरने की रणनीति पर कायम है, वहीं दूसरी ओर सरकार अपने विधायी एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने में जुटी हुई है। लगातार बाधित हो रही कार्यवाही के बावजूद लोकसभा और राज्यसभा में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए जा चुके हैं। अब राजनीतिक गलियारों की नजर आगामी एफसीआरए (Foreign Contribution Regulation Act) संशोधन विधेयक पर टिक गई है, जिसे सरकार जल्द सदन में पेश कर सकती है।
संसद के मानसून सत्र के बारहवें दिन भी दोनों सदनों में जोरदार हंगामा देखने को मिला। विपक्ष ने विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब की मांग करते हुए प्रश्नकाल और शून्यकाल को प्रभावित किया। इसके बावजूद सरकार ने अपनी रणनीति के तहत विधायी कार्यों को रुकने नहीं दिया और आवश्यक विधेयकों को पारित कराने की प्रक्रिया जारी रखी।
हंगामे के बीच भी नहीं रुका सरकार का विधायी एजेंडा
लोकसभा और राज्यसभा में लगातार विरोध के बावजूद सरकार ने अपने विधायी कार्यक्रम को प्राथमिकता दी। कई ऐसे विधेयक सदन से पारित हुए जिन पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। विपक्ष की ओर से विरोध और नारेबाजी जारी रही, लेकिन सदन की कार्यवाही उपलब्ध समय का उपयोग करते हुए सरकार ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाया।
संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि सरकार की प्राथमिकता इस सत्र में अधिक से अधिक विधेयकों को पारित कराना है, ताकि लंबित सुधारों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समय पर लागू किया जा सके।
लोकसभा से पारित हुए कई महत्वपूर्ण विधेयक
अब तक लोकसभा में कई अहम विधेयकों को मंजूरी मिल चुकी है। इनमें सबसे चर्चित एंटी पेपर लीक विधेयक रहा, जिसे विपक्ष का भी व्यापक समर्थन मिला। इस विधेयक का उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षाओं में होने वाली पेपर लीक की घटनाओं पर सख्त नियंत्रण स्थापित करना और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
इसके अलावा वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण देने से संबंधित विधेयक भी लोकसभा से पारित हुआ। हालांकि इस विधेयक पर राजनीतिक मतभेद देखने को मिले और डीएमके सहित कुछ विपक्षी दलों ने इसका विरोध करते हुए सदन से वॉकआउट किया। विपक्ष के कई सदस्यों के सदन से बाहर जाने के बाद सरकार के लिए विधेयक पारित कराना अपेक्षाकृत आसान हो गया।
एप्रोप्रिएशन बिल भी बिना चर्चा के हुआ पारित
संसद की कार्यवाही के दौरान एप्रोप्रिएशन बिल भी पारित किया गया। यह बिल सरकारी खर्चों को विधिक स्वीकृति प्रदान करने से जुड़ा महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयक माना जाता है। हंगामे के कारण इस पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी और सदन ने इसे पारित कर दिया।
इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने संबंधी विधेयक और जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक भी लोकसभा से पारित किए गए। इन विधेयकों को न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने और नागरिक सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
राज्यसभा में भी जारी रहा विरोध और विधायी कार्य
राज्यसभा में भी विपक्ष लगातार सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करता रहा। विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार से जवाब मांगा, जिनमें धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद और हाल की कुछ प्रशासनिक कार्रवाइयों को लेकर प्रश्न उठाए गए।
हालांकि विरोध के बावजूद राज्यसभा में भी सरकार ने अपना विधायी कार्य जारी रखा। यहां एंटी पेपर लीक विधेयक को विपक्ष के सहयोग से पारित किया गया। इसके अलावा एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) से संबंधित विधेयक को भी मंजूरी मिल गई, जिसे छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब FCRA संशोधन विधेयक पर नजर
संसद के मौजूदा सत्र में अब सबसे अधिक चर्चा एफसीआरए संशोधन विधेयक को लेकर हो रही है। यह विधेयक विदेशी अंशदान (Foreign Contribution) से जुड़े प्रावधानों में संशोधन से संबंधित है और इसका प्रभाव सामाजिक संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) तथा विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली संस्थाओं पर पड़ सकता है।
हालांकि लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की हालिया बैठक में इस विधेयक को तत्काल एजेंडे में शामिल नहीं किया गया, लेकिन सरकारी सूत्रों के अनुसार इसे इसी सप्ताह या अगले सप्ताह सदन में पेश किया जा सकता है।
बताया जा रहा है कि इस विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं सरकार का पक्ष रखेंगे और सदन में उठने वाले सवालों का जवाब देंगे।
महत्वपूर्ण विधेयकों पर बना हुआ है सस्पेंस
सरकार के विधायी एजेंडे में कुछ ऐसे बड़े प्रस्ताव भी शामिल हैं जिन पर पूरे देश की नजर बनी हुई है। इनमें परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक प्रमुख हैं।
हालांकि अभी तक इन विधेयकों को सदन में पेश करने को लेकर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। सूत्रों का कहना है कि सरकार इन्हें तभी सदन में लाएगी, जब उसे इनके पारित होने की पर्याप्त संभावना दिखाई देगी। चूंकि संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत आवश्यक होता है, इसलिए सरकार इस विषय पर राजनीतिक समीकरणों का भी आकलन कर रही है।
संसद में टकराव के बीच जारी है राजनीतिक रणनीति
मानसून सत्र में एक ओर विपक्ष विभिन्न राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं सरकार प्रशासनिक और विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने के अपने लक्ष्य पर कायम दिखाई दे रही है। सदन में लगातार हंगामे के बावजूद विधेयकों का पारित होना इस बात का संकेत है कि सरकार अपने विधायी कार्यक्रम को समयबद्ध तरीके से पूरा करना चाहती है।
आने वाले दिनों में यदि एफसीआरए संशोधन विधेयक सदन में पेश होता है, तो उसके प्रावधानों को लेकर व्यापक राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है। साथ ही परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बड़े विधेयकों पर सरकार की रणनीति भी संसद के शेष सत्र का प्रमुख केंद्र बनी रहेगी। ऐसे में मानसून सत्र के आगामी दिन राजनीतिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
