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Reading: उत्तराखंड में ‘एक्सटेंशन कल्चर’ पर फिर बहस तेज, ऊर्जा विभाग में सेवा विस्तार की नई कोशिशों से उठे सवाल
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उत्तराखंड में ‘एक्सटेंशन कल्चर’ पर फिर बहस तेज, ऊर्जा विभाग में सेवा विस्तार की नई कोशिशों से उठे सवाल

The Hill India News
Last updated: April 24, 2026 8:13 am
The Hill India News
Published: April 24, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड में सरकारी विभागों में अधिकारियों को सेवा विस्तार (एक्सटेंशन) देने की परंपरा एक बार फिर चर्चा और विवाद के केंद्र में आ गई है। खासतौर पर ऊर्जा विभाग में हालिया घटनाक्रम ने इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में तीन वरिष्ठ अधिकारियों के सेवा विस्तार को समाप्त कर सख्त संदेश देने की कोशिश की थी, वहीं दूसरी ओर अब उसी विभाग में एक और अधिकारी को एक्सटेंशन देने की प्रक्रिया शुरू होने की खबरें सामने आ रही हैं।

दरअसल, मामला किच्छा में तैनात उपखंड अधिकारी दिनेश चंद गुरुरानी से जुड़ा हुआ है, जो 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। रिटायरमेंट की तारीख नजदीक आते ही उनके लिए सेवा विस्तार दिलाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। बताया जा रहा है कि इस मामले में सिर्फ विभागीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि बाहरी स्तर पर भी पैरवी की जा रही है। व्यापारी संगठनों के अलावा नैनीताल से सांसद अजय भट्ट द्वारा भी अधिकारी के पक्ष में पत्र लिखे जाने की बात सामने आई है।

ऊर्जा विभाग में इस संबंध में फाइल भी आगे बढ़नी शुरू हो गई है। निदेशक परिचालन एम.आर. आर्य ने मुख्य अभियंता से इस मामले में रिपोर्ट तलब की है। हालांकि यह प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में बताई जा रही है, लेकिन जिस तेजी से घटनाक्रम आगे बढ़ रहा है, उसने कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं।

गौरतलब है कि उत्तराखंड के ऊर्जा विभाग में सेवा विस्तार को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। इससे पहले भी कई अधिकारियों को लंबे समय तक एक्सटेंशन दिए जाने के उदाहरण सामने आए हैं। कभी अधूरी परियोजनाओं का हवाला दिया गया, तो कभी अधिकारियों की विशेषज्ञता और अनुभव को आधार बनाकर सेवा विस्तार दिया गया। हालांकि, इन फैसलों का लगातार विरोध भी होता रहा है, खासकर विभागीय कर्मचारियों और संगठनों की ओर से।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक प्रीतम सिंह ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जिन अधिकारियों को बार-बार सेवा विस्तार दिया जा रहा है, वे सरकार के लिए “दुधारू गाय” बन चुके हैं। उनका आरोप है कि सरकार अपने चहेते अधिकारियों को बनाए रखने के लिए नियमों को नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले भी ऊर्जा विभाग में कुछ अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद उनका एक्सटेंशन खत्म किया गया था।

बीते महीने मुख्यमंत्री धामी द्वारा ऊर्जा विभाग के तीन बड़े अधिकारियों के सेवा विस्तार को समाप्त किया गया था। इनमें उत्तराखंड जल विद्युत निगम के प्रबंध निदेशक संदीप सिंघल, उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के एमडी अनिल यादव और यूपीसीएल के निदेशक अजय अग्रवाल शामिल थे। इस फैसले को सरकार की सख्ती और पारदर्शिता की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना गया था। उम्मीद जताई जा रही थी कि आगे भी सरकार इस तरह के मामलों में स्पष्ट नीति अपनाएगी।

लेकिन अब फिर से सेवा विस्तार की कवायद शुरू होने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या सरकार वास्तव में इस परंपरा को खत्म करना चाहती है या फिर राजनीतिक दबाव और सिफारिशों के चलते फैसले प्रभावित हो रहे हैं। सांसद अजय भट्ट ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने संबंधित अधिकारी के पक्ष में पत्र जरूर लिखा है, लेकिन अंतिम निर्णय सरकार को ही लेना है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में कई कर्मचारियों को सेवा विस्तार दिया गया है, ऐसे में अन्य अधिकारी भी इसी आधार पर प्रयास कर रहे हैं।

विशेषज्ञों और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि सेवा विस्तार देने की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो इससे न केवल कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। सबसे बड़ा नुकसान युवा और नए अधिकारियों को होता है, जिन्हें आगे बढ़ने के अवसर नहीं मिल पाते। जब रिटायर हो चुके अधिकारियों को बार-बार एक्सटेंशन दिया जाता है, तो पदोन्नति की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

उत्तराखंड में “एक्सटेंशन कल्चर” अब एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह इस परंपरा को समाप्त कर एक स्पष्ट और पारदर्शी नीति लागू करे, जिससे योग्य अधिकारियों को समय पर अवसर मिल सके और प्रशासनिक व्यवस्था में संतुलन बना रहे।

अब देखना यह होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है—क्या वह सख्ती दिखाते हुए इस परंपरा पर रोक लगाएगी या फिर हर बार की तरह यह मामला भी सिफारिशों और दबाव के बीच उलझ कर रह जाएगा। फिलहाल, ऊर्जा विभाग में चल रही हलचल ने इस बहस को फिर से जीवंत कर दिया है और आने वाले दिनों में इस पर सरकार के फैसले पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

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