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Reading: बनारस की गलियों में ‘अक्षरों का उत्सव’: टाइपो-पिकनिक के जरिए छात्रों ने सीखी जीवंत टाइपोग्राफी
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उत्तर प्रदेशफीचर्ड

बनारस की गलियों में ‘अक्षरों का उत्सव’: टाइपो-पिकनिक के जरिए छात्रों ने सीखी जीवंत टाइपोग्राफी

The Hill India News
Last updated: April 17, 2026 5:17 am
The Hill India News
Published: April 17, 2026
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वाराणसी: प्राचीन संस्कृति, आध्यात्मिकता और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध वाराणसी एक बार फिर अपनी अनूठी पहचान के कारण चर्चा में है। इस बार वजह है काशी की गलियों में आयोजित एक अनोखी शैक्षणिक पहल—‘टाइपो-पिकनिक’। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के दृश्य कला संकाय के एप्लाइड आर्ट्स विभाग द्वारा आयोजित इस स्ट्रीट-आधारित टाइपोग्राफी कार्यशाला ने शिक्षा को कक्षा से बाहर निकालकर सीधे शहर की सड़कों तक पहुंचा दिया।

यह कार्यक्रम ‘टाइपोयात्रा’ कैलिग्राफी और टाइप डिजाइन कार्यशाला श्रृंखला का हिस्सा था, जिसमें लगभग 50 छात्रों ने सक्रिय भागीदारी की। छात्रों ने गोदौलिया चौराहा से लेकर दशाश्वमेध घाट तक करीब तीन घंटे की पैदल यात्रा की। इस दौरान वे स्टिच मार्केट सहित कई स्थानीय बाजारों से होकर गुजरे, जहां उन्होंने बनारस की जीवंत और विविधतापूर्ण वर्नाक्युलर टाइपोग्राफी का गहराई से अध्ययन किया।

इस टाइपो-पिकनिक का मुख्य उद्देश्य छात्रों को वास्तविक जीवन के परिवेश में टाइपोग्राफी की समझ देना था। आमतौर पर टाइपोग्राफी को किताबों और डिजिटल माध्यमों में पढ़ाया जाता है, लेकिन इस पहल ने इसे एक अनुभवात्मक अध्ययन में बदल दिया। छात्रों ने बाजारों में लगे हस्तलिखित साइनबोर्ड, देवनागरी और लैटिन लिपि के मिश्रण वाले बोर्ड, और स्थानीय भाषाई विविधता को बारीकी से देखा और समझा।

कार्यक्रम के मार्गदर्शक अभिषेक वर्धन सिंह और विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मनीष अरोड़ा के नेतृत्व में छात्रों ने कई महत्वपूर्ण टाइपोग्राफिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया। इनमें लेटरफॉर्म की विकृति, टाइपोग्राफिक हायरार्की का उलटाव, और अनियोजित दृश्य परिवेश में अक्षरों के सह-अस्तित्व जैसे विषय शामिल थे। छात्रों ने यह भी समझा कि कैसे बिना किसी औपचारिक डिजाइन नियमों के भी स्थानीय बाजारों में टाइपोग्राफी अपने आप में एक विशिष्ट पहचान बना लेती है।

इस अध्ययन के दौरान ‘एकम काशी’ के संस्कृत-अंग्रेज़ी द्विभाषी साइनबोर्ड ने विशेष रूप से छात्रों का ध्यान आकर्षित किया। इसे सुविचारित और संतुलित टाइपोग्राफी का एक दुर्लभ उदाहरण माना गया, जहां पारंपरिक और आधुनिक तत्वों का सुंदर समन्वय देखने को मिला। छात्रों ने इसे न केवल डिजाइन के दृष्टिकोण से, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में भी समझा।

टाइपो-पिकनिक का फोकस केवल अक्षरों के आकार या शैली तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें उनके निर्माण के तरीके, तर्क प्रणाली, उपयोग की गई सामग्री, सतह उपचार, स्थानिक व्यवस्था और कार्यात्मक संदर्भ जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया। छात्रों ने यह भी जाना कि भारतीय वर्नाक्युलर टाइपोग्राफी अक्सर हाइब्रिड होती है, जिसमें विभिन्न भाषाओं, शैलियों और सांस्कृतिक प्रभावों का मिश्रण होता है।

इस पहल ने यह स्पष्ट किया कि सीखने की प्रक्रिया को यदि वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ा जाए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा और स्थायी होता है। वाराणसी की सड़कों पर चलते हुए छात्रों ने अक्षरों को केवल डिजाइन तत्व के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की दृश्य संस्कृति के हिस्से के रूप में देखा। यह अनुभव उनके लिए एक नई दृष्टि लेकर आया, जिसमें वे दीवारों, दुकानों और गलियों में लिखी भाषा को एक नई समझ के साथ पढ़ सके।

कार्यक्रम का समापन पारंपरिक बनारसी नाश्ते के साथ हुआ, जिसमें कचौड़ी, इडली और चाय शामिल थे। यह न केवल एक शैक्षणिक यात्रा थी, बल्कि सांस्कृतिक अनुभव का भी हिस्सा बन गई।

प्रोफेसर मनीष अरोड़ा ने इस पहल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, “यह शहर सदियों से टाइपोग्राफी सिखा रहा है। हमने केवल छात्रों को वह दृष्टि दी है, जिससे वे दीवारों पर लिखी भाषा को पढ़ सकें। टाइपो-पिकनिक वास्तव में जीवन के बीचों-बीच सीखने का माध्यम है।”

टाइपोग्राफी, जो कि लिखित भाषा को आकर्षक, पठनीय और प्रभावशाली बनाने की कला और तकनीक है, इस कार्यशाला के माध्यम से छात्रों के लिए एक जीवंत अनुभव बन गई। सही फॉन्ट, आकार, स्पेसिंग और लेआउट के चयन के जरिए संदेश को भावनात्मक और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना इसका मुख्य उद्देश्य होता है।

कुल मिलाकर, टाइपो-पिकनिक जैसी पहल न केवल शिक्षा के पारंपरिक तरीकों को चुनौती देती है, बल्कि छात्रों को रचनात्मकता, अवलोकन और सांस्कृतिक समझ के नए आयामों से भी जोड़ती है। बनारस की गलियों में अक्षरों के इस अनोखे उत्सव ने यह साबित कर दिया कि सीखने के लिए किताबों से बाहर निकलना भी उतना ही जरूरी है।

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