
मणिपुर के पहाड़ी इलाकों से निकलकर हजारों किलोमीटर दूर पश्चिम एशिया के देश इज़रायल तक पहुंचने वाली बनेई मेनाशे समुदाय की यात्रा सिर्फ एक प्रवास नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और इतिहास से जुड़ी गहरी कहानी है। 23 अप्रैल को इस समुदाय के 250 से अधिक लोग तेल अवीव के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरे, जहां उनका पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। नीले और सफेद रंग के गुब्बारों से सजे स्वागत द्वार, यहूदी गीतों की गूंज और भावनाओं से भरे माहौल ने इस पल को ऐतिहासिक बना दिया।
बनेई मेनाशे, जिसका अर्थ होता है “मेनाशे के बेटे”, खुद को बाइबिल में वर्णित “खोई हुई दस जनजातियों” में से एक का वंशज मानते हैं। उनके अनुसार, वे बाइबिल में वर्णित उस जनजाति से जुड़े हैं जिसे लगभग 720 ईसा पूर्व में असीरियन साम्राज्य द्वारा निर्वासित कर दिया गया था। यह मान्यता उनके धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है।
इस समुदाय के इज़रायल पहुंचने की प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे वर्षों की कोशिशें और योजनाएं हैं। शावेई इज़रायल नामक संस्था 1990 के दशक से इन “खोई हुई जनजातियों” के वंशजों की पहचान कर उन्हें इज़रायल में बसाने के प्रयास कर रही है। अब तक लगभग 4,000 बनेई मेनाशे इज़रायल में बस चुके हैं, जबकि करीब 7,000 लोग अभी भी भारत, खासकर मणिपुर और मिजोरम में रहते हैं।
हाल ही में इज़रायली सरकार ने इस समुदाय के करीब 4,600 लोगों को चरणबद्ध तरीके से अपने देश में बसाने का निर्णय लिया है। 23 अप्रैल को पहुंचे 250 लोग इस योजना का पहला जत्था हैं। सरकार की योजना है कि हर साल लगभग 1,200 लोगों को इज़रायल लाया जाएगा, जिससे धीरे-धीरे पूरे समुदाय को वहां बसाया जा सके।
इस यात्रा के पीछे भावनाओं का एक गहरा सागर भी छिपा है। एयरपोर्ट पर पहुंचे लोगों में कई ऐसे थे जो वर्षों बाद अपने रिश्तेदारों से मिले। कुछ लोगों ने अपने भाइयों, दोस्तों और परिवार के सदस्यों को 8-10 साल बाद देखा। यह मिलन केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव का प्रतीक भी था।
बनेई मेनाशे समुदाय का इतिहास भी काफी दिलचस्प और जटिल है। उनकी मान्यता के अनुसार, सदियों पहले उन्हें मध्य पूर्व से पलायन करना पड़ा और वे धीरे-धीरे फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन होते हुए भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में आकर बस गए। इस लंबे प्रवास के दौरान उन्होंने कई सांस्कृतिक बदलावों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कुछ यहूदी परंपराओं को जीवित रखा, जैसे खतना (circumcision) और कुछ धार्मिक अनुष्ठान।
हालांकि इज़रायल पहुंचने के बाद इस समुदाय के लोगों को एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया से गुजरना होगा—धर्म परिवर्तन। इज़रायल की नागरिकता पाने के लिए उन्हें औपचारिक रूप से यहूदी धर्म अपनाना होगा। इज़रायल के इंटीग्रेशन मंत्रालय के अनुसार, यह प्रक्रिया उनके समाज में पूरी तरह शामिल होने के लिए आवश्यक है।
इज़रायल के इमिग्रेशन मंत्री ओफिर सोफेर ने इस मौके को “ऐतिहासिक क्षण” बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले वर्षों में पूरे समुदाय को इज़रायल लाने का प्रयास जारी रहेगा। उनके अनुसार, यह कदम न केवल जनसंख्या बढ़ाने का हिस्सा है, बल्कि उन लोगों को उनके “ऐतिहासिक घर” से जोड़ने की कोशिश भी है, जो खुद को सदियों से उससे जुड़ा मानते हैं।
यह घटना वैश्विक स्तर पर भी ध्यान आकर्षित कर रही है, क्योंकि यह इतिहास, धर्म, पहचान और राजनीति के संगम का उदाहरण है। एक ओर जहां यह समुदाय अपनी “जड़ों” की ओर लौटने को लेकर उत्साहित है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठता है कि क्या ऐतिहासिक और धार्मिक दावों के आधार पर इस तरह के पुनर्वास को कैसे देखा जाना चाहिए।
भारत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक विषय है, क्योंकि यह देश की विविधता और बहुलता को दर्शाता है। मणिपुर जैसे राज्य से एक पूरे समुदाय का विदेश में बसना न केवल स्थानीय समाज पर प्रभाव डाल सकता है, बल्कि यह पहचान और प्रवासन से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े करता है।
अंततः, बनेई मेनाशे समुदाय की यह यात्रा केवल एक भौगोलिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी कहानी है जिसमें इतिहास की परतें, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और इंसानी भावनाएं एक साथ जुड़ी हुई हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह समुदाय इज़रायल में किस तरह खुद को स्थापित करता है और अपनी विरासत को आगे बढ़ाता है।



