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त्रियुगीनारायण में सादगी की मिसाल: हरियाणा की जज और वकील ने किया दहेज-मुक्त विवाह, समाज को दिया मजबूत संदेश

The Hill India News
Last updated: April 24, 2026 5:47 am
The Hill India News
Published: April 24, 2026
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उत्तराखंड के पवित्र धाम त्रियुगीनारायण मंदिर से एक प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जहां एक दंपति ने सादगी, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल पेश करते हुए दहेज-मुक्त विवाह किया। हरियाणा न्यायिक सेवा में कार्यरत जज प्रियंका वर्मा ने फरीदाबाद निवासी अधिवक्ता प्रशांत के साथ वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार सात फेरे लेकर अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत की। यह विवाह न केवल एक पारिवारिक आयोजन रहा, बल्कि समाज के लिए एक सशक्त संदेश भी बनकर उभरा है।

यह विशेष विवाह 19 अप्रैल 2026 को संपन्न हुआ, जिसमें सादगी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। समारोह में कुल 38 लोग ही शामिल हुए, जिनमें वधू पक्ष से 13 और वर पक्ष से 25 सदस्य उपस्थित रहे। इस आयोजन में न तो भव्य सजावट की गई और न ही डीजे, आतिशबाजी या फिजूलखर्ची का कोई स्थान था। पूरे समारोह को पारंपरिक विधि-विधान और पारिवारिक मूल्यों के साथ सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न किया गया।

इस विवाह को खास बनाने वाला एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका स्थान रहा। त्रियुगीनारायण मंदिर हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसी आध्यात्मिक महत्व और आस्था के कारण प्रियंका वर्मा ने अपने विवाह के लिए इस स्थल का चयन किया, जिससे इस आयोजन को और भी विशेषता मिली।

दूल्हा-दुल्हन दोनों ही विधि और न्याय क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। प्रियंका वर्मा हरियाणा न्यायिक सेवा में जज के रूप में कार्यरत हैं और वर्तमान में फरीदाबाद में अपनी सेवाएं दे रही हैं। वहीं, उनके जीवनसाथी प्रशांत पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं और जींद जिले के सफीदों के निवासी हैं। दोनों ही शिक्षित और जागरूक परिवारों से संबंध रखते हैं, जिन्होंने इस विवाह को एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया।

इस प्रेरणादायक विवाह के पीछे परिवार की विचारधारा भी एक महत्वपूर्ण कारण रही। प्रियंका वर्मा के पिता डॉ. अशोक कुमार वर्मा हरियाणा पुलिस में उप-निरीक्षक हैं और उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया जा चुका है। वे राष्ट्रीय स्तर के स्वर्ण पदक विजेता, डायमंड रक्तदाता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय समाजसेवी भी हैं। लंबे समय से वे दहेज प्रथा के विरोधी रहे हैं और समाज में इसके खिलाफ जागरूकता अभियान चलाते रहे हैं।

डॉ. वर्मा का मानना है कि दहेज प्रथा समाज में असमानता को बढ़ावा देती है और बेटियों के सम्मान को ठेस पहुंचाती है। उन्होंने अपने सिद्धांतों को अपने परिवार में भी लागू किया और अपनी बेटी का विवाह पूरी तरह दहेज-मुक्त और सादगीपूर्ण तरीके से संपन्न कराया। प्रियंका की माता सुषमा वर्मा भी कुरुक्षेत्र में विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं और परिवार की इस सोच को मजबूती देने में उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

आज के समय में जहां शादियां दिखावे, भव्यता और अत्यधिक खर्च का प्रतीक बनती जा रही हैं, वहीं इस विवाह ने एक सकारात्मक उदाहरण पेश किया है। यह पहल समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि विवाह जैसे पवित्र बंधन में आडंबर और दिखावे की कोई आवश्यकता नहीं है। सच्चे रिश्ते समझदारी, सम्मान और संस्कारों पर आधारित होते हैं, न कि खर्च और बाहरी चमक-दमक पर।

यह विवाह समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश लेकर आया है कि यदि परिवार ठान लें, तो दहेज जैसी कुरीतियों को जड़ से खत्म किया जा सकता है। यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे उदाहरण अन्य परिवारों को भी प्रेरित करेंगे कि वे भी सादगीपूर्ण और दहेज-मुक्त विवाह को अपनाएं।

इस तरह के आयोजन यह साबित करते हैं कि बदलाव की शुरुआत घर से ही होती है। जब शिक्षित और जागरूक लोग आगे बढ़कर ऐसी पहल करते हैं, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन की राह आसान हो जाती है। प्रियंका वर्मा और प्रशांत का यह विवाह निश्चित रूप से आने वाले समय में कई लोगों के लिए प्रेरणा बनेगा और दहेज-मुक्त समाज के निर्माण में एक मजबूत कदम साबित होगा।

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