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पंतनगर विश्वविद्यालय अतिक्रमण विवाद: आशियाने बचाने की जंग, सड़कों पर उतरा जनसैलाब; मशाल जुलूस से गरमाई उत्तराखंड की सियासत

रुद्रपुर (ऊधम सिंह नगर): उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में स्थित पंतनगर इन दिनों अशांति और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। पंतनगर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बस्तियों को खाली करने के लिए जारी किए गए अतिक्रमण विरोधी नोटिस ने एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लिया है। संजय कॉलोनी, मस्जिद कॉलोनी और वाल्मीकि बस्ती जैसे क्षेत्रों में रहने वाले हजारों परिवारों के सिर पर छत छिनने की तलवार लटक रही है। इस संवेदनशील मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग अख्तियार कर लिया है, जहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता जनता के समर्थन में आमने-सामने आ गए हैं।

बस्तियों में खौफ का साया और बढ़ता जनाक्रोश

पंतनगर विश्वविद्यालय की भूमि पर दशकों से बसे लोगों को जब प्रशासन की ओर से बेदखली के नोटिस थमाए गए, तो क्षेत्र में हड़कंप मच गया। स्थानीय निवासियों का तर्क है कि वे यहाँ पीढ़ियों से रह रहे हैं और उनके पास वैध पहचान दस्तावेज हैं। प्रशासन की इस अचानक कार्रवाई को लोग अपनी आजीविका और अस्तित्व पर हमला मान रहे हैं। पंतनगर अतिक्रमण विवाद के केंद्र में वे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार हैं, जिनके पास इस बस्तियों के अलावा सिर छुपाने की कोई दूसरी जगह नहीं है।

विरोध की आग तब और भड़क गई जब स्थानीय लोगों ने मांग की कि यदि उन्हें यहाँ से हटाया जाता है, तो पहले उनके उचित पुनर्वास (Rehabilitation) की व्यवस्था की जाए। “बिना छत दिए, छत छीनना अन्याय है”—यह नारा आज पंतनगर की गलियों में गूंज रहा है।


पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने कलेक्ट्रेट में दी दस्तक

मामले की गंभीरता को देखते हुए किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने सबसे पहले मोर्चा संभाला। वे मस्जिद कॉलोनी और वाल्मीकि बस्ती के प्रतिनिधियों के साथ जिला मुख्यालय (कलेक्ट्रेट) पहुँचे और अपर जिलाधिकारी (ADM) को ज्ञापन सौंपा। राजेश शुक्ला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रशासन को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि दशकों से बसी इन कॉलोनियों को एक झटके में उजाड़ना न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। उन्होंने मांग की कि जब तक सरकार इन लोगों के लिए कोई वैकल्पिक आवासीय योजना नहीं लाती, तब तक अतिक्रमण हटाने की किसी भी कार्रवाई पर तुरंत रोक लगाई जाए।


विधायक तिलक राज बेहड़ का आक्रामक रुख: निकाला मशाल जुलूस

शाम होते-होते विरोध प्रदर्शन ने उस समय उग्र रूप ले लिया जब वर्तमान किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ खुद मैदान में उतरे। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को ‘गरीब विरोधी’ करार देते हुए धामी सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विधायक बेहड़ ने मस्जिद कॉलोनी से लेकर विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार तक एक विशाल मशाल जुलूस का नेतृत्व किया।

हाथों में जलती मशालें और सरकार विरोधी नारों के साथ हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। विश्वविद्यालय गेट पर धरने पर बैठे बेहड़ ने कहा:

“यह केवल अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि हजारों जिंदगियों को अंधेरे में धकेलने की साजिश है। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझना होगा कि ये लोग कोई अपराधी नहीं हैं, बल्कि वे श्रमिक और कामगार हैं जिन्होंने इस क्षेत्र के विकास में योगदान दिया है।”


सियासी पारा चढ़ा: धामी सरकार पर विपक्ष के तीखे प्रहार

तिलक राज बेहड़ ने इस मुद्दे को लेकर प्रदेश की भाजपा सरकार पर तीखे हमले किए। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार आम जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनहीन बनी हुई है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देती है, वहीं दूसरी तरफ गरीबों के आशियाने उजाड़ने के लिए बुल्डोजर और नोटिस का सहारा ले रही है।

बेहड़ ने दो टूक चेतावनी दी कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने घोषणा की कि यदि प्रशासन ने जबरन बेदखली की कोशिश की, तो कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर ईंट से ईंट बजा देंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंतनगर अतिक्रमण विवाद अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा जन-मुद्दा बन चुका है, जिसे विधानसभा से लेकर सड़क तक उठाया जाएगा।


प्रशासनिक रुख और विश्वविद्यालय का पक्ष

दूसरी ओर, पंतनगर विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह भूमि विश्वविद्यालय के विस्तार और शोध कार्यों के लिए आरक्षित है। माननीय न्यायालयों के पिछले आदेशों का हवाला देते हुए प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाना उनकी कानूनी बाध्यता है। हालांकि, मौजूदा विरोध प्रदर्शनों और भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच प्रशासन के लिए इस कार्रवाई को अंजाम देना एक बड़ी चुनौती बन गया है।


निष्कर्ष: समाधान की तलाश या संघर्ष का आगाज?

पंतनगर का यह घटनाक्रम उत्तराखंड में भूमि कानूनों और अतिक्रमण की जटिल समस्या को एक बार फिर चर्चा में ले आया है। तकनीकी रूप से भले ही यह भूमि अतिक्रमण की श्रेणी में आती हो, लेकिन सामाजिक और मानवीय दृष्टि से यह हजारों लोगों के जीवन का प्रश्न है।

स्थानीय निवासियों की मांग जायज है कि उन्हें उजाड़ने से पहले बसाया जाए। आने वाले दिनों में यदि सरकार और प्रशासन ने कोई मध्यमार्ग (पुनर्वास नीति) नहीं निकाला, तो यह आंदोलन और भी हिंसक और व्यापक हो सकता है। पंतनगर अतिक्रमण विवाद अब राज्य सरकार की साख और विपक्ष की सक्रियता के बीच एक अग्निपरीक्षा बन गया है।

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