
इस्लामाबाद/वाशिंगटन/तेहरान। दुनिया की सांसें एक बार फिर थमी हुई हैं और नजरें टिकी हैं पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर। खाड़ी क्षेत्र में बारूद की गंध और युद्ध के साये के बीच, कट्टर प्रतिद्वंद्वी अमेरिका और ईरान एक बार फिर कूटनीति की मेज पर आमने-सामने आ सकते हैं। सूत्रों का दावा है कि इस्लामाबाद में वार्ता का दूसरा दौर इसी गुरुवार से शुरू हो सकता है। यह हलचल ऐसे समय में हो रही है जब 21 अप्रैल को घोषित दो सप्ताह का युद्धविराम समाप्त होने वाला है। यदि यह वार्ता विफल रहती है, तो खाड़ी में एक ऐसा संघर्ष छिड़ सकता है जिसकी तपिश पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झुलसा देगी।
मध्यस्थता की वैश्विक रेस: सऊदी से लेकर फ्रांस तक सक्रिय
खाड़ी में युद्ध की आहट ने वैश्विक सप्लाई चेन और तेल की कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी ताकतें अब मूकदर्शक बने रहने के बजाय सक्रिय हस्तक्षेप कर रही हैं। एक ओर सऊदी अरब अपने आर्थिक हितों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अमेरिका पर निरंतर दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी ओर फ्रांस और ब्रिटेन समुद्री व्यापार मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल ही में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से लंबी बातचीत की है। इस संवाद का मुख्य उद्देश्य ईरान को बातचीत के लिए राजी करना और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी तनाव को कम करना था। रूस ने भी इस मामले में मध्यस्थता की पेशकश कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जिससे साफ है कि यह मुद्दा अब केवल दो देशों का नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा का विषय बन चुका है।
नेताओं के सुर: सकारात्मक संकेत या कूटनीतिक चाल?
लंबे समय तक एक-दूसरे के प्रति आक्रामक रहने वाले दोनों देशों के सुरों में इस बार थोड़ी नरमी देखी जा रही है। ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने राष्ट्रपति मैक्रों से बातचीत में स्पष्ट किया कि तेहरान कूटनीति के जरिए विवादों का समाधान चाहता है और वह शांति वार्ता जारी रखने के लिए तैयार है।
दूसरी ओर, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी गेंद ईरान के पाले में डालते हुए कहा है कि ‘अगला कदम ईरान पर निर्भर करता है’। हालांकि, वाशिंगटन के कड़े रुख और हालिया सैन्य नाकाबंदी के बाद वेंस का यह बयान काफी संतुलित माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि दोनों पक्ष जानते हैं कि युद्ध किसी के हित में नहीं है, लेकिन घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय दबदबे की मजबूरी उन्हें पीछे हटने से रोक रही है।
47 साल बाद टूटी थी चुप्पी: पहले दौर का अधूरा एजेंडा
ज्ञात हो कि हाल ही में इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की मैराथन बैठक ने इतिहास रच दिया था। पिछले 47 वर्षों में यह पहला मौका था जब अमेरिका और ईरान के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल एक साथ एक कमरे में बैठे थे। अमेरिकी दल का नेतृत्व खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे, जबकि ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बघेर गालिबाफ कमान संभाल रहे थे।
यद्यपि उस बैठक में कई मुद्दों पर गंभीर मतभेद उभरे और अंततः कोई ठोस समझौता नहीं हो सका, लेकिन ‘संवाद की शुरुआत’ को ही एक बड़ी उपलब्धि माना गया। अब राउंड-2 की वार्ता में उसी अधूरे एजेंडे को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में ढील और समुद्री सुरक्षा जैसे पेचीदा मुद्दे शामिल हैं।
होर्मुज में बढ़ती घेराबंदी: दुनिया के लिए खतरे की घंटी
इस्लामाबाद में पहले दौर की वार्ता बेनतीजा रहने का असर जमीन पर दिखने लगा है। अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की नाकाबंदी के जवाब में अपनी घेराबंदी सख्त कर दी है। अमेरिका का ताजा ऐलान कि वह ईरान से आने-जाने वाले किसी भी जहाज को इस रास्ते से नहीं गुजरने देगा, व्यापारिक जगत के लिए किसी झटके से कम नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का वह ‘चोक पॉइंट’ है जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि यहाँ नाकाबंदी लंबी खिंचती है, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो जाएगा।
पाकिस्तान का ‘शांति मिशन’ और शहबाज शरीफ की सक्रियता
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक रणनीतिक मध्यस्थ के रूप में उभरा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, डिप्टी पीएम इशहाक डार और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की तिकड़ी इस वार्ता को सफल बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। सोमवार को बुलाई गई कैबिनेट की आपात बैठक में पाकिस्तान ने क्षेत्रीय शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वार्ता के संभावित दिन यानी गुरुवार को ही पीएम शहबाज शरीफ सऊदी अरब और तुर्की के दौरे पर जा रहे हैं। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ उनकी मुलाकात में भी अमेरिका-ईरान शांति वार्ता इस्लामाबाद का मुद्दा शीर्ष प्राथमिकता पर रहने की उम्मीद है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि यदि वह इन दो दिग्गजों को एक समझौते पर ले आता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय साख में भारी इजाफा होगा।
21 अप्रैल से पहले का ‘काउंटडाउन’
दुनिया अब 21 अप्रैल की समयसीमा की ओर बढ़ रही है। यदि गुरुवार को होने वाली संभावित वार्ता में कोई ‘ब्रेकथ्रू’ नहीं मिलता है, तो युद्धविराम खत्म होते ही खाड़ी में फिर से मिसाइलों और ड्रोन्स की गूंज सुनाई दे सकती है। अमेरिका-ईरान शांति वार्ता इस्लामाबाद केवल दो देशों की रंजिश खत्म करने का मंच नहीं है, बल्कि यह इस सदी के सबसे बड़े संभावित आर्थिक संकट को टालने की आखिरी उम्मीद भी है। क्या कूटनीति की जीत होगी या युद्ध के नगाड़े बजेंगे? इसका उत्तर अगले 48 घंटों में मिल सकता है।



