
देहरादून। देश की राजनीति में आधी आबादी की हिस्सेदारी को सुनिश्चित करने वाले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बड़ी और निर्णायक पहल की है। आगामी 16 अप्रैल 2026 से संसद में प्रस्तावित इस अधिनियम पर विशेष सत्र से पहले मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी सांसदों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रदेश अध्यक्षों को एक औपचारिक पत्र प्रेषित किया है। इस पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर व्यापक सहमति बनाने और संसद में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया है।
मुख्यमंत्री का यह पत्र न केवल एक प्रशासनिक संदेश है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की निर्णायक भूमिका को लेकर उनकी गहरी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि 16 अप्रैल से संसद में शुरू हो रहा विशेष सत्र भारतीय लोकतंत्र के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि यह अवसर हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने के साथ-साथ देश की महिलाओं को निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल करने का एक अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत करता है।
मुख्यमंत्री ने जोर देते हुए कहा, “एक समावेशी समाज का निर्माण तभी संभव है जब उसकी महिलाएँ समान अवसरों के साथ आगे बढ़ें और नेतृत्व की भूमिकाएँ निभाएँ।” उन्होंने इस बात पर गर्व व्यक्त किया कि आज देश की बेटियाँ अंतरिक्ष (Space) से लेकर खेल (Sports) तक और सशस्त्र बलों से लेकर स्टार्टअप्स तक हर क्षेत्र में नए मानक स्थापित कर रही हैं।
2029 का लक्ष्य: आरक्षण के साथ ही हों चुनाव
पत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नारी शक्ति वंदन अधिनियम उत्तराखंड के क्रियान्वयन की समयसीमा को लेकर मुख्यमंत्री का सुझाव है। मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि वर्ष 2023 में संसद के दोनों सदनों ने एकजुट होकर इस अधिनियम का समर्थन किया था। अब समय आ गया है कि इसे पूर्ण भावना के साथ धरातल पर उतारा जाए।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से प्रस्ताव रखा है कि:
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2029 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले सभी विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण के प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू करने के बाद ही संपन्न कराए जाने चाहिए।
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विशेषज्ञों और संवैधानिक विद्वानों की राय के अनुसार, यह कदम शासन व्यवस्था में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करेगा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में नई ऊर्जा का संचार करेगा।
उत्तराखंड की ‘मातृशक्ति’ और राजनीतिक चेतना
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में उत्तराखंड के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का विशेष जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सदैव से मातृशक्ति को सम्मान देने वाली परंपरा का अग्रदूत रहा है। विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाएँ न केवल परिवार की धुरी हैं, बल्कि वे आजीविका और सामुदायिक जीवन की मुख्य आधारशिला भी हैं।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उत्तराखंड की महिलाओं ने नेतृत्व की अद्भुत क्षमता प्रदर्शित की है। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि राज्य में पंचायती राज संस्थाओं, नगर निकायों और सहकारी समितियों में महिला आरक्षण के सफल मॉडल ने पहले ही सक्षम महिला नेतृत्व की एक सशक्त फौज तैयार कर दी है। अब यह नेतृत्व राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बड़ी जिम्मेदारियां संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है।
दलगत राजनीति से ऊपर उठने की अपील
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राजनीतिक दलों के प्रदेश अध्यक्षों और सांसदों से भावुक अपील करते हुए कहा कि महिला आरक्षण का यह मुद्दा किसी विशेष दल या व्यक्ति का नहीं है। यह मुद्दा देश की करोड़ों माताओं, बहनों और बेटियों के सम्मान तथा आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और सशक्त भविष्य से जुड़ा है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ने से समाज की वास्तविक समस्याओं को अधिक संवेदनशीलता के साथ समझा और हल किया जा सकेगा। मुख्यमंत्री ने सभी दलों से इस ऐतिहासिक परिवर्तन को साकार करने में सहयोगी बनने का अनुरोध किया है।
सियासी गलियारों में चर्चा तेज
मुख्यमंत्री धामी की इस पहल के बाद उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 16 अप्रैल के सत्र से पहले धामी का यह पत्र एक ‘प्रेशर ग्रुप’ की तरह काम करेगा, जो महिला आरक्षण के प्रावधानों को जल्द से जल्द लागू करने की मांग को मजबूती देगा।
पुष्कर सिंह धामी ने इस पत्र के माध्यम से एक बार फिर खुद को महिला सशक्तिकरण के प्रबल पैरोकार के रूप में स्थापित किया है। यदि उनकी यह पहल रंग लाती है और 2029 के चुनाव महिला आरक्षण के साथ होते हैं, तो यह भारतीय संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक क्रांति होगी। अब सभी की निगाहें 16 अप्रैल को शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र पर टिकी हैं।



