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पवन खेड़ा की बढ़ीं मुश्किलें: तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची असम सरकार, कल हो सकती है सुनवाई

The Hill India News
Last updated: April 13, 2026 2:09 pm
The Hill India News
Published: April 13, 2026
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Image Source: File
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नई दिल्ली/गुवाहाटी: कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा और असम सरकार के बीच कानूनी रस्साकशी अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गई है। तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा पवन खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दिए जाने के फैसले से असंतुष्ट असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। असम सरकार ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सीजेआई (CJI) से बुधवार को ही तत्काल सुनवाई करने की गुहार लगाई है।

Contents
तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को चुनौतीक्या हैं जमानत की कड़ी शर्तें?विवाद की जड़: क्या थे पवन खेड़ा के आरोप?BNS की इन धाराओं में दर्ज है मुकदमासुप्रीम कोर्ट में कल की सुनवाई पर टिकी नजरेंराजनीतिक गलियारों में हलचल

यह पूरा विवाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों और उसके बाद दर्ज हुई एफआईआर (FIR) से जुड़ा है।

तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती

बीते शुक्रवार को तेलंगाना हाईकोर्ट ने पवन खेड़ा को बड़ी राहत देते हुए एक सप्ताह की ‘अस्थायी ट्रांजिट अग्रिम जमानत’ मंजूर की थी। न्यायमूर्ति के. सुजाना की पीठ ने खेड़ा को संबंधित अदालत (असम) में नियमित जमानत के लिए आवेदन करने हेतु सात दिनों का समय दिया था। कोर्ट ने अपनी शर्तों में कहा था कि यदि इस दौरान उनकी गिरफ्तारी होती है, तो उन्हें एक लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों की शर्त पर रिहा किया जाएगा।

असम सरकार का तर्क है कि इस तरह की राहत जांच की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर सकती है, विशेषकर तब जब मामला चुनाव और सार्वजनिक व्यक्ति की छवि से जुड़ा हो। सरकार ने इसी आधार पर हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांग की है।

क्या हैं जमानत की कड़ी शर्तें?

तेलंगाना हाईकोर्ट ने राहत देते समय पवन खेड़ा पर कई कड़े प्रतिबंध भी लगाए थे:

  • जांच में सहयोग: याचिकाकर्ता को जांच अधिकारी (IO) द्वारा बुलाए जाने पर पूछताछ के लिए उपस्थित होना होगा।

  • विदेश यात्रा पर रोक: अदालत की पूर्व अनुमति के बिना वे देश नहीं छोड़ सकते।

  • बयानबाजी पर पाबंदी: एक सार्वजनिक व्यक्तित्व होने के नाते, खेड़ा को इस मामले से जुड़े ऐसे किसी भी सार्वजनिक बयान देने से बचने का निर्देश दिया गया है जो चल रही जांच को प्रभावित कर सके।

विवाद की जड़: क्या थे पवन खेड़ा के आरोप?

पवन खेड़ा असम सरकार विवाद की शुरुआत 5 अप्रैल को हुई, जब कांग्रेस नेता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी पर तीखे हमले किए थे। खेड़ा ने आरोप लगाया था कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई देशों के पासपोर्ट और विदेशों में अकूत संपत्तियां हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता का मुख्य दावा यह था कि मुख्यमंत्री सरमा ने 9 अप्रैल को होने वाले असम विधानसभा चुनावों के लिए दाखिल अपने चुनावी हलफनामे में इन संपत्तियों और पासपोर्ट का खुलासा नहीं किया। इन आरोपों के तुरंत बाद गुवाहाटी अपराध शाखा में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

BNS की इन धाराओं में दर्ज है मुकदमा

गुवाहाटी पुलिस ने पवन खेड़ा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जिनमें शामिल हैं:

  1. धारा 175: चुनाव से संबंधित झूठा बयान देना।

  2. धारा 318: धोखाधड़ी और छल।

  3. धारा 35: निजी रक्षा के अधिकार से जुड़ी व्याख्याएं (संदर्भित धाराओं के साथ)।

असम पुलिस का कहना है कि ये आरोप न केवल निराधार हैं बल्कि चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने और एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से लगाए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में कल की सुनवाई पर टिकी नजरें

असम सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी गई है कि हाईकोर्ट ने ट्रांजिट जमानत देते समय मामले की गंभीरता और तथ्यों की पूरी तरह पड़ताल नहीं की। अब बुधवार को होने वाली संभावित सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा देता है, तो पवन खेड़ा की गिरफ्तारी की संभावनाएं प्रबल हो सकती हैं।

राजनीतिक गलियारों में हलचल

पवन खेड़ा के खिलाफ इस कानूनी कार्रवाई को कांग्रेस ‘प्रतिशोध की राजनीति’ करार दे रही है, जबकि भाजपा और असम सरकार इसे ‘तथ्यों के आधार पर की गई कानूनी प्रक्रिया’ बता रही है। चूंकि असम में चुनावी माहौल गरमाया हुआ है, ऐसे में इस कानूनी लड़ाई का असर राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ना तय है।

न्यायपालिका और राजनीति के इस संगम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की आजादी बनाम मानहानि और चुनावी शुचिता की बहस को जन्म दे दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या पवन खेड़ा को मिली राहत बरकरार रहती है या उन्हें असम पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

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