नई दिल्ली/हल्द्वानी: उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे की भूमि पर कथित अतिक्रमण के मामले में उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संतुलित आदेश पारित किया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि रेलवे को अपनी भूमि के उपयोग और विस्तार का पूर्ण अधिकार है, हालांकि मानवीय आधार पर प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
रेलवे की प्राथमिकता और कोर्ट का कड़ा रुख
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उन दलीलों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की, जिसमें रेलवे की विस्तार योजना पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अवैध कब्जा करने वाले यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे को अपनी किस जमीन का इस्तेमाल करना चाहिए और किसका नहीं।”
अदालत ने स्वीकार किया कि हल्द्वानी उत्तराखंड का वह अंतिम बिंदु है जहाँ तक रेलवे का विस्तार संभव है, क्योंकि इसके आगे भौगोलिक रूप से पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है। रेलवे के लिए यह 36 एकड़ जमीन ट्रैक विस्तार और लॉजिस्टिक्स के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पुनर्वास: PM आवास योजना और वित्तीय सहायता
कोर्ट ने विस्थापन की प्रक्रिया को मानवीय बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को कई निर्देश दिए हैं:
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पात्रता की पहचान: उन परिवारों की पहचान की जाएगी जो विस्थापन से सीधे प्रभावित होंगे।
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वित्तीय सहायता: रेलवे और राज्य सरकार संयुक्त रूप से विस्थापित होने वाले पात्र परिवारों को 6 महीने तक 2,000 रुपये प्रति माह का भत्ता प्रदान करेंगे।
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PM आवास योजना: जो परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी में आते हैं, उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर देने के लिए विशेष कैंप लगाए जाएंगे।
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विशेष कैंप का आयोजन: कोर्ट ने निर्देश दिया है कि 19 मार्च (ईद के बाद) नैनीताल जिला प्रशासन और रेलवे राजस्व अधिकारी एक सप्ताह का विशेष कैंप लगाएं ताकि पात्र लोग आवेदन कर सकें।
प्रशांत भूषण की दलीलें और कोर्ट की सहानुभूति
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि इस क्षेत्र में लगभग 50,000 लोग दशकों से रह रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार इतने कम समय में 5,000 परिवारों को घर दे पाएगी? उन्होंने रेलवे के पास उपलब्ध वैकल्पिक खाली जमीन का भी हवाला दिया।
इस पर कोर्ट ने सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा कि वे झुग्गियों में रहने वालों के प्रति संवेदनशीलता रखते हैं और हर नागरिक को स्वच्छ एवं बेहतर वातावरण में रहने का अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता।
अप्रैल तक कार्रवाई पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए कहा कि मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी और तब तक रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में दी गई सुरक्षा उत्तराखंड के अन्य अवैध कब्जे वाले मामलों के लिए मिसाल (Precedent) नहीं मानी जाएगी।
प्रशासन को निर्देश
नैनीताल के जिलाधिकारी और हल्द्वानी के एसडीएम को लॉजिस्टिक सपोर्ट सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी अपील की गई है कि वे घर-घर जाकर लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूक करें ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति पुनर्वास से वंचित न रहे।
यह फैसला विकास की आवश्यकता और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक पुल बनाने की कोशिश है। जहाँ एक ओर रेलवे के विस्तार को राष्ट्रहित में अनिवार्य माना गया है, वहीं दूसरी ओर हजारों परिवारों के सिर से छत छिनने से पहले उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था देने की बात कही गई है।



