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उत्तराखंड: पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती के लिए सरकार का बड़ा दांव, 339 करोड़ की कैंपा कार्ययोजना को हरी झंडी

The Hill India News
Last updated: March 3, 2026 2:36 am
The Hill India News
Published: March 3, 2026
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देहरादून। उत्तराखंड के हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित करने, सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने और लगातार गहराते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर अंकुश लगाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक दूरगामी कदम उठाया है। मुख्य सचिव आनंद बर्धन की अध्यक्षता में आयोजित कैंपा (CAMPA) योजना संचालन समिति की 12वीं बैठक में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 339 करोड़ रुपये की भारी-भरकम वार्षिक कार्ययोजना को औपचारिक स्वीकृति दे दी गई है।

Contents
हर वन प्रभाग में लगेंगे बड़े मृदा-जल संरक्षण प्रोजेक्टतीन बड़ी एकीकृत परियोजनाओं से बदलेगी तस्वीरमानव-वन्यजीव संघर्ष: 10 नए रेस्क्यू सेंटर और सुरक्षा जालवनाग्नि सुरक्षा और स्थानीय सहभागितापारदर्शिता के लिए ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ अनिवार्यवन कर्मियों के लिए बुनियादी ढांचे का विकास

इस बजट का मुख्य उद्देश्य न केवल वनों का विस्तार करना है, बल्कि आधुनिक तकनीक और एकीकृत प्रबंधन के जरिए प्रदेश की ज्वलंत पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान खोजना भी है।

हर वन प्रभाग में लगेंगे बड़े मृदा-जल संरक्षण प्रोजेक्ट

बैठक के दौरान मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया कि अब छोटे-छोटे कार्यों के बजाय परिणामोन्मुखी बड़े प्रोजेक्ट्स पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। उन्होंने वन विभाग को निर्देशित किया कि प्रदेश के प्रत्येक वन प्रभाग में कम से कम एक ऐसा बड़ा मृदा-जल संरक्षण प्रोजेक्ट चिन्हित किया जाए, जिसका प्रभाव धरातल पर व्यापक रूप से दिखाई दे।

इन परियोजनाओं में जल संरक्षण, भूमि सुधार और स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता को अनिवार्य बनाया गया है। सरकार का लक्ष्य है कि इन बहुआयामी प्रस्तावों के जरिए पर्वतीय क्षेत्रों में भीषण होते जा रहे जल संकट और मानसून के दौरान होने वाले भू-स्खलन की घटनाओं को नियंत्रित किया जा सके। जल धाराओं के विशेष उपचार के लिए अलग से 19.5 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

तीन बड़ी एकीकृत परियोजनाओं से बदलेगी तस्वीर

प्रदेश में जल स्रोतों के संरक्षण के लिए अब विभिन्न विभाग मिलकर काम करेंगे। बैठक में निर्णय लिया गया कि ‘सारा’ (SARA) और जलागम विकास विभाग के समन्वय से राज्य स्तर पर तीन बड़ी इंटीग्रेटेड परियोजनाओं के प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे। ये परियोजनाएं पारंपरिक जल स्रोतों (नौले-धारे) और संपूर्ण जलागम क्षेत्रों के वैज्ञानिक उपचार पर केंद्रित होंगी।

मानव-वन्यजीव संघर्ष: 10 नए रेस्क्यू सेंटर और सुरक्षा जाल

उत्तराखंड के लिए मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी मानवीय और सामाजिक चुनौती बन चुका है। इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप प्रदेश के सभी जनपदों में ट्रांजिट रेस्क्यू सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं।

  • बजट आवंटन: वर्तमान कार्ययोजना में 10 नए रेस्क्यू सेंटरों के लिए 19 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।

  • अतिरिक्त सुरक्षा: संघर्ष रोकथाम के अन्य उपायों के लिए 8.6 करोड़ रुपये के अलग प्रस्तावों को मंजूरी मिली है।

  • रणनीति: संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बाड़े, हाई-टेक निगरानी और त्वरित राहत टीमों को और अधिक सुदृढ़ बनाया जाएगा।

वनाग्नि सुरक्षा और स्थानीय सहभागिता

गर्मियों के सीजन में धधकते जंगलों को बचाने के लिए 12 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। इसमें खास बात यह है कि वनों की सुरक्षा में पहली पंक्ति के प्रहरी माने जाने वाली वन पंचायतों के लिए 2 करोड़ रुपये की विशेष सहायता राशि रखी गई है। इस फंड का उपयोग आधुनिक अग्निशमन उपकरणों की खरीद और स्थानीय युवाओं के प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा।

पारदर्शिता के लिए ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ अनिवार्य

सरकारी धन के सदुपयोग और कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य सचिव ने थर्ड पार्टी ऑडिट पर कड़ा रुख अपनाया है। कैंपा के तहत होने वाले सभी कार्यों का मूल्यांकन तीन से चार स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा कराया जाएगा। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि बजट का उपयोग पूरी पारदर्शिता और समयबद्धता के साथ हो, ताकि भविष्य की योजनाओं के लिए सटीक डेटा उपलब्ध हो सके।

वन कर्मियों के लिए बुनियादी ढांचे का विकास

दुर्गम क्षेत्रों में तैनात वन कर्मियों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए उनके आवास की समस्या को भी हल किया जा रहा है। देहरादून और हल्द्वानी में रेंजर स्तर तक के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आधुनिक आवासीय भवनों का निर्माण किया जाएगा, जिसके लिए 10 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं।


उत्तराखंड की कैंपा योजना 2026-27 केवल एक वित्तीय आवंटन नहीं है, बल्कि यह राज्य के ‘ग्रीन इकॉनमी’ और सुरक्षित भविष्य का रोडमैप है। यदि इन योजनाओं का क्रियान्वयन सही समय पर और पारदर्शिता के साथ होता है, तो यह हिमालयी राज्यों के लिए पारिस्थितिकी संरक्षण का एक बेहतरीन मॉडल साबित हो सकता है।

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