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उत्तराखंड: जोशीमठ भूमि स्थिरीकरण कार्यों पर विवाद, ग्रामीणों ने एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

उत्तराखंड के चमोली जिले स्थित ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) में भू-धंसाव के बाद शुरू किए गए भूमि स्थिरीकरण कार्य अब विवादों में घिरते नजर आ रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन और कार्यदायी एजेंसियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिन इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, वहां अपेक्षित काम नहीं किया जा रहा, जबकि सरकारी जमीनों पर तेजी से निर्माण और सुरक्षात्मक कार्य किए जा रहे हैं। इसको लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि भू-धंसाव से प्रभावित कई निजी मकानों, खेतों और बस्तियों में अब भी खतरा बना हुआ है। लोगों के घरों में दरारें हैं, जमीन खिसक रही है और कई परिवार अब भी भय के माहौल में जीवन जीने को मजबूर हैं। इसके बावजूद एजेंसियां उन क्षेत्रों को प्राथमिकता नहीं दे रही हैं जहां वास्तव में लोगों को राहत की जरूरत है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सरकारी जमीनों पर कार्य तेजी से चल रहे हैं, जबकि निजी प्रभावित क्षेत्रों की अनदेखी की जा रही है।

स्थानीय लोगों ने इस मुद्दे को लेकर प्रशासन के साथ बैठक भी की। बैठक में ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं और कहा कि यदि सभी प्रभावित क्षेत्रों में समान रूप से कार्य नहीं किया गया तो वे विरोध प्रदर्शन तेज करेंगे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर मौजूदा कार्यों को रुकवाने तक की कार्रवाई की जा सकती है।

दरअसल, जोशीमठ भू-धंसाव के बाद पूरे नगर को 14 सेक्टरों में विभाजित किया गया था। वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट के आधार पर इन क्षेत्रों में सुरक्षात्मक और स्थिरीकरण कार्य किए जाने थे। सरकार की योजना थी कि संवेदनशील क्षेत्रों में दीवार निर्माण, ड्रेनेज सिस्टम, सीवर लाइन और जमीन को स्थिर करने के लिए तकनीकी उपाय किए जाएंगे। करीब तीन वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अब लगभग 16.40 करोड़ रुपये की लागत से यह कार्य शुरू हुए हैं, लेकिन शुरुआत में ही इन पर सवाल उठने लगे हैं।

जोशीमठ के उपजिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने ग्रामीणों की चिंताओं को गंभीरता से लेने की बात कही है। उन्होंने कहा कि सभी कार्य वैज्ञानिक रिपोर्टों और विशेषज्ञ संस्थानों की सलाह के आधार पर किए जा रहे हैं। प्रशासन का उद्देश्य किसी भी क्षेत्र की अनदेखी करना नहीं है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि लोगों को किसी प्रकार की शंका या शिकायत है तो जल्द ही सभी संबंधित विभागों और एजेंसियों के साथ बैठक कर समाधान निकाला जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि आने वाले समय में ड्रेनेज और सीवर से जुड़े कार्यों को भी तेजी से शुरू किया जाएगा ताकि भू-धंसाव की स्थिति को नियंत्रित किया जा सके।

गौरतलब है कि जोशीमठ में भू-धंसाव की समस्या पहली बार साल 2022 में गंभीर रूप से सामने आई थी। उस समय कई घरों और इमारतों में छोटी-छोटी दरारें दिखाई देने लगी थीं। हालांकि शुरुआत में इस समस्या को सामान्य माना गया, लेकिन धीरे-धीरे हालात भयावह होते चले गए। साल 2023 तक स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि घरों, सड़कों और जमीनों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने लगीं। इसके बाद यह मामला राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

विशेषज्ञों ने जोशीमठ के भू-धंसाव के पीछे अनियोजित निर्माण, भारी निर्माण परियोजनाएं, कमजोर भूगर्भीय संरचना और जल निकासी की खराब व्यवस्था को प्रमुख कारण बताया था। इसके बाद सरकार ने कई वैज्ञानिक संस्थानों से जांच कराई और राहत एवं पुनर्वास योजनाओं पर काम शुरू किया।

अब जबकि भूमि स्थिरीकरण के कार्य शुरू हो चुके हैं, स्थानीय लोगों की अपेक्षा है कि प्रशासन केवल सरकारी क्षेत्रों तक सीमित न रहकर उन परिवारों और बस्तियों को प्राथमिकता दे, जो सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। फिलहाल प्रशासन और ग्रामीणों के बीच संवाद जारी है, लेकिन यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में सरकार लोगों का भरोसा जीत पाती है या नहीं और क्या जोशीमठ को इस गंभीर संकट से स्थायी राहत मिल पाएगी।

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