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Uttarakhand: धामी सरकार का अतिक्रमण पर अब तक का सबसे बड़ा प्रहार, रडार पर कई अवैध संपत्तियां

देहरादून: उत्तराखंड में ‘सख्त शासन’ की अपनी छवि को पुख्ता करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने अवैध निर्माणों और अतिक्रमण के विरुद्ध ‘युद्धस्तर’ पर कार्रवाई शुरू कर दी है। राज्य के कुमाऊं मंडल से शुरू हुआ यह अभियान अब पूरे प्रदेश में एक विशाल रूप ले चुका है। शासन-प्रशासन की इस संयुक्त कार्रवाई का स्पष्ट संदेश है—सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों के लिए देवभूमि में कोई स्थान नहीं है।

कुमाऊं से शुरू हुआ ‘क्लीन-अप’ अभियान

इस बार अभियान की कमान उधम सिंह नगर जिले से संभाली गई है, जहाँ तराई के इलाकों में वर्षों से सरकारी जमीनों को दबाने की शिकायतें मिल रही थीं। जिला अधिकारी नितिन भदौरिया के नेतृत्व में प्रशासन ने हाल ही में एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया। चौंकाने वाली बात यह रही कि जहाँ केवल तीन अवैध निर्माणों की सूचना थी, वहां मौके पर टीम को सात अवैध ढांचे मिले, जिन्हें तत्काल प्रभाव से ध्वस्त कर दिया गया।

जिला प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई किसी भेदभाव के बिना की जा रही है और आने वाले दिनों में चिन्हित किए गए अन्य स्थानों पर भी बुलडोजर चलेगा।

आंकड़ों की जुबानी: 580 ढांचे ध्वस्त, 200 अभी रडार पर

उत्तराखंड अतिक्रमण हटाओ अभियान 2026 के तहत अब तक के आंकड़े सरकार की गंभीरता को दर्शाते हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, राज्यभर में अब तक लगभग 580 अवैध संरचनाओं को हटाया जा चुका है।

  • इन संरचनाओं में छोटे मंदिर, गुरुद्वारों की दीवारें, मस्जिदें और अन्य धार्मिक स्थल शामिल हैं जो बिना किसी कानूनी अनुमति के सरकारी भूमि पर खड़े किए गए थे।

  • प्रशासन ने 200 से अधिक ऐसे नए मामले भी चिन्हित किए हैं, जिन पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है।

  • जैसे ही अदालतों से हरी झंडी मिल रही है, बुलडोजर अपनी कार्रवाई को आगे बढ़ा रहा है।

तराई क्षेत्र: अतिक्रमण का मुख्य केंद्र

सरकार का सबसे ज्यादा फोकस वर्तमान में तराई के जिलों—देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर और नैनीताल पर है। इन मैदानी और अर्ध-पहाड़ी जिलों में नदियों के किनारे, सड़कों के पास और वन विभाग की जमीनों पर बड़े पैमाने पर कब्जों की पुष्टि हुई है। राजस्व विभाग की टीमें अब दशकों पुराने लैंड रिकॉर्ड खंगाल रही हैं ताकि ‘लैंड जिहाद’ या अवैध भू-अधिग्रहण के किसी भी प्रयास को जड़ से खत्म किया जा सके।

वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर ‘स्पेशल स्कैनेर’

इस अभियान का सबसे चर्चित पहलू वक्फ बोर्ड के नाम पर दर्ज संपत्तियों की जांच है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 100 से अधिक ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ सरकारी जमीनों को संदिग्ध परिस्थितियों में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कराया गया।

  • अकेले देहरादून में ऐसी 30 संरचनाएं चिन्हित की गई हैं।

  • सरकार इन दस्तावेजों की सत्यता की जांच कर रही है कि आखिर किस आधार पर सरकारी भूमि का मालिकाना हक बदला गया।

मुख्यमंत्री धामी ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, हम कोई विशेष स्थान देखकर नहीं, बल्कि अतिक्रमण देखकर कार्रवाई कर रहे हैं। नियम सबके लिए बराबर हैं, चाहे वह कोई व्यक्ति हो या कोई संस्था। सरकारी संपत्ति जनता की अमानत है और इसकी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है।”

संवेदनशीलता और कानून का संतुलन

अवैध निर्माणों को हटाने की प्रक्रिया में सामाजिक संतुलन बनाए रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स का कहना है कि धार्मिक संरचनाओं का मुद्दा हमेशा संवेदनशील होता है, लेकिन सरकार कोर्ट के आदेशों और कानून के दायरे में रहकर ही काम कर रही है।

वहीं, अभियान के नोडल अधिकारी पराग धहकाते ने स्पष्ट किया कि यह कोई क्षणिक कार्रवाई नहीं है। उन्होंने कहा, यह एक सतत प्रक्रिया है। हम चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। जिन मामलों में कोर्ट की स्टे है, वहां हम विधिक पक्ष रख रहे हैं, और जहां अनुमति मिल रही है, वहां तुरंत ध्वस्तीकरण किया जा रहा है।”

सियासी सरगर्मी और जनता की राय

धामी सरकार के इस ‘एक्शन मोड’ ने राज्य की सियासत को भी गर्मा दिया है। जहाँ सत्ता पक्ष इसे ‘कानून का राज’ स्थापित करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष (कांग्रेस) ने इसे ‘चुनिंदा कार्रवाई’ करार देते हुए सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का तर्क है कि प्रशासन को मानवीय आधार पर भी विचार करना चाहिए।

हालांकि, आम जनता का एक बड़ा वर्ग सरकार के इस कदम की सराहना कर रहा है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ सड़कों और सार्वजनिक पार्कों पर कब्जों की वजह से विकास कार्य रुके हुए थे।

आगे की रणनीति: क्या बदलेगी उत्तराखंड की तस्वीर?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले कुछ महीनों में उत्तराखंड के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की सूरत बदल जाएगी। प्रशासन अब एक विस्तृत पोर्टल तैयार कर रहा है जहाँ अतिक्रमण मुक्त कराई गई जमीनों का डेटा सार्वजनिक किया जाएगा ताकि भविष्य में पुनः कब्जा न हो सके।

उत्तराखंड की शांत वादियों में ‘बुलडोजर की गर्जना’ इस बात का संकेत है कि धामी सरकार अब अवैध कब्जों के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपना चुकी है। कानून, कोर्ट और कड़क प्रशासन के त्रिकोण ने अतिक्रमणकारियों के हौसले पस्त कर दिए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वक्फ संपत्तियों की जांच और 200 लंबित मामलों पर आने वाले दिनों में क्या बड़े खुलासे होते हैं।

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