
उत्तराखंड के चमोली जिले में शुक्रवार से बहुप्रतीक्षित ‘सूर्य देवभूमि चैलेंज 2.0’ की शुरुआत हो गई है। यह 113 किलोमीटर लंबी अल्ट्रा मैराथन बदरीनाथ धाम से जुड़े ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण बदरी-केदार ट्रेल पर आयोजित की जा रही है। इस चुनौतीपूर्ण दौड़ में देशभर से लगभग 300 धावक हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें प्रोफेशनल रनर के साथ-साथ एडवेंचर प्रेमी भी शामिल हैं।
इस आयोजन का उद्देश्य केवल खेल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देना, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और पुराने तीर्थ मार्गों को फिर से सक्रिय करना भी है। सेना और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से इस इवेंट को एक बड़े पर्यटन और साहसिक खेल अभियान के रूप में विकसित किया जा रहा है।
तीन चरणों में पूरी होगी 113 किलोमीटर की रेस
‘सूर्य देवभूमि चैलेंज 2.0’ को तीन भागों में बांटा गया है ताकि धावकों की सहनशक्ति और रणनीति दोनों की परीक्षा हो सके। पहले दिन प्रतिभागी हेलंग से कलगोट तक लगभग 36 किलोमीटर की दूरी तय कर रहे हैं। दूसरे दिन यह रेस कलगोट से आगे 39 किलोमीटर तक बढ़ेगी, जबकि तीसरे और अंतिम चरण में धावक उखीमठ तक करीब 38 किलोमीटर की दौड़ पूरी करेंगे।
पूरा मार्ग पुराने बदरी-केदार पैदल तीर्थ मार्ग पर आधारित है, जो सदियों पहले तीर्थ यात्रियों के लिए प्रमुख रास्ता हुआ करता था। यह मार्ग न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस रास्ते में पंच केदार से जुड़े प्रमुख स्थलों के दर्शन होते हैं।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में होगी परीक्षा
इस मैराथन को भारत की सबसे कठिन पहाड़ी अल्ट्रा रेस में से एक माना जा रहा है। ऊंचाई में लगातार बदलाव, संकरी पगडंडियां, चढ़ाई-उतराई, ऑक्सीजन की कमी और बदलता मौसम धावकों के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। कई स्थानों पर ट्रेल बेहद फिसलन भरा और खड़ी ढलानों से युक्त है, जिससे प्रतिभागियों की शारीरिक क्षमता के साथ-साथ मानसिक मजबूती की भी परीक्षा होती है।
आयोजन समिति के अनुसार, इस तरह की परिस्थितियों में दौड़ पूरी करना ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। यही कारण है कि इसे केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक ‘एंड्योरेंस चैलेंज’ के रूप में देखा जा रहा है।
सेना और स्थानीय प्रशासन की अहम भूमिका
इस आयोजन में भारतीय सेना की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। पहले दिन के पड़ाव कलगोट में धावकों के ठहरने के लिए सेना की ओर से होमस्टे और अस्थायी आवास की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा मेडिकल सपोर्ट, ट्रैकिंग और सुरक्षा व्यवस्था में भी सेना और स्थानीय प्रशासन मिलकर काम कर रहे हैं।
आयोजन का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि दूरस्थ गांवों में जरूरी सुविधाओं का विकास हो और वहां रहने वाले लोगों को रोजगार के अवसर मिलें। रास्ते में पड़ने वाले गांवों में धावकों के ठहरने, भोजन और मार्गदर्शन की व्यवस्था से स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिल रहा है।
पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
इस मैराथन को पर्यटन विकास के एक नए मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। सरकार और सेना की योजना है कि इस तरह के आयोजनों के जरिए उत्तराखंड के कम विकसित क्षेत्रों को साहसिक खेलों और इको-टूरिज्म का केंद्र बनाया जाए।
स्थानीय लोगों के लिए होमस्टे, गाइड सेवाएं और छोटे व्यापार के अवसर बढ़ने लगे हैं। कई गांवों में पहली बार इस तरह की गतिविधियों के कारण बाहरी पर्यटक और खिलाड़ी पहुंच रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।
देशभर से पहुंचे प्रतिभागी, महिलाओं की भी मजबूत भागीदारी
इस प्रतियोगिता की खास बात यह है कि इसमें जम्मू-कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक के प्रतिभागी शामिल हैं। अलग-अलग राज्यों से आए धावक इस चुनौती को स्वीकार कर अपने अनुभव को यादगार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। महिला धावकों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है, जो इस आयोजन को और अधिक समावेशी बनाती है।
पिछले संस्करण में यह आयोजन गंगोत्री-यमुनोत्री क्षेत्र में हुआ था, जबकि इस बार इसे बदरी-केदार ट्रेल पर स्थानांतरित किया गया है। नए रूट के कारण इस बार चुनौती और भी कठिन हो गई है, लेकिन प्रतिभागियों का उत्साह पहले से कहीं अधिक देखा जा रहा है।
पुरस्कार और प्रतिस्पर्धा
इस मैराथन में भाग लेने के लिए प्रतिभागियों से 10 हजार रुपये का रजिस्ट्रेशन शुल्क लिया गया था। प्रतियोगिता में विजेताओं के लिए नकद पुरस्कार भी निर्धारित किए गए हैं। पहले स्थान पर आने वाले धावक को 1 लाख रुपये, जबकि दूसरे स्थान के लिए 50 हजार रुपये का इनाम दिया जाएगा। इसके अलावा विभिन्न श्रेणियों में अन्य प्रतिभागियों को भी सम्मानित किया जाएगा।



