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The Hill India > Blog > देश > सुप्रीम कोर्ट से पवन खेड़ा को बड़ा झटका, ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर लगी रोक
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सुप्रीम कोर्ट से पवन खेड़ा को बड़ा झटका, ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर लगी रोक

The Hill India News
Last updated: April 15, 2026 7:37 am
The Hill India News
Published: April 15, 2026
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कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई उनकी ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है। यह फैसला असम सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए लिया गया, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई, बल्कि खेड़ा को नोटिस भी जारी किया है और स्पष्ट किया है कि उन्हें फिलहाल गिरफ्तारी से कोई संरक्षण नहीं मिलेगा।

यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां से जुड़े कथित विवादित बयानों से संबंधित है। पवन खेड़ा पर आरोप है कि उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी पर गंभीर और आधारहीन आरोप लगाए थे, जिसके बाद उनके खिलाफ असम में मामला दर्ज किया गया।

दरअसल, 10 अप्रैल को तेलंगाना हाईकोर्ट ने पवन खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। इस फैसले के जरिए उन्हें असम में दर्ज मामले के संदर्भ में राहत मिली थी ताकि वे संबंधित अदालत में जाकर नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकें। लेकिन असम सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि तेलंगाना हाईकोर्ट के पास इस मामले में अधिकार क्षेत्र ही नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट में असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जोरदार तरीके से दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि जिस घटना के आधार पर मामला दर्ज हुआ, वह असम में हुआ और एफआईआर भी वहीं दर्ज की गई है। ऐसे में तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा ट्रांजिट अग्रिम जमानत देना कानूनन सही नहीं है। उन्होंने इसे “फोरम शॉपिंग” का मामला बताया और कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

तुषार मेहता ने यह भी कहा कि पवन खेड़ा ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे असम जाकर वहां की अदालत से राहत क्यों नहीं मांग सकते थे। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति के पास देश के कई राज्यों में संपत्ति या पहचान हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी भी राज्य में जाकर अपने अनुकूल अदालत से राहत ले सकता है। यह पूरी तरह से न्यायिक प्रणाली के साथ खिलवाड़ है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल थे, ने असम सरकार की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल पवन खेड़ा को गिरफ्तारी से कोई सुरक्षा नहीं दी जा सकती। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर खेड़ा असम की सक्षम अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो इस आदेश का उस प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

इस फैसले के बाद अब पवन खेड़ा के सामने कानूनी चुनौती और बढ़ गई है। उन्हें अब असम जाकर वहां की अदालत में ही अपनी जमानत के लिए प्रयास करना होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि अदालतें अधिकार क्षेत्र के नियमों को लेकर सख्त हैं और किसी भी प्रकार की ढील नहीं दी जाएगी।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो पवन खेड़ा ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास तीन अलग-अलग देशों के पासपोर्ट हैं और उनके पास विदेशों में संपत्ति भी है। खेड़ा ने यह भी कहा था कि उनके समर्थकों को ऐसे दस्तावेज मिले हैं, जो स्वतंत्र भारत की राजनीति के सबसे बड़े खुलासों में से एक हो सकते हैं।

इन आरोपों को मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सिरे से खारिज कर दिया था। उन्होंने इसे दुर्भावनापूर्ण, मनगढ़ंत और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि पवन खेड़ा असम की जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं और इस तरह की झूठी बातें फैलाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं।

इसके बाद मुख्यमंत्री की पत्नी रिनिकी भुइयां ने पवन खेड़ा के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि खेड़ा ने उनके खिलाफ झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाए हैं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। इसी शिकायत के आधार पर असम में एफआईआर दर्ज की गई थी।

सूत्रों के अनुसार, जब असम पुलिस पवन खेड़ा के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उनके घर पहुंची, तो वह वहां मौजूद नहीं थे। इस घटनाक्रम के बाद उन्होंने तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया और वहां से ट्रांजिट अग्रिम जमानत हासिल कर ली थी।

अब सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है। खेड़ा को न तो गिरफ्तारी से कोई राहत मिली है और न ही उन्हें अन्य राज्यों में जाकर कानूनी संरक्षण लेने की अनुमति दी गई है। यह मामला अब पूरी तरह असम की अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आ गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है, जहां आरोपी अलग-अलग राज्यों में जाकर राहत पाने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और हर मामले को उसके सही अधिकार क्षेत्र में ही सुना जाएगा।

कुल मिलाकर, पवन खेड़ा के लिए यह कानूनी लड़ाई अब और कठिन हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वे असम की अदालत में किस तरह अपनी जमानत की अर्जी पेश करते हैं और इस मामले में आगे क्या मोड़ आता है।

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