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उत्तराखंड: गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति को हाईकोर्ट से राहत, नियुक्ति के खिलाफ याचिका खारिज

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर के कुलपति की नियुक्ति को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को बड़ी राहत दी है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि कुलपति की नियुक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों और केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुरूप की गई है।

यह मामला प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा था, जिसमें कुलपति प्रोफेसर प्रकाश सिंह की नियुक्ति पर सवाल उठाए गए थे। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि यह नियुक्ति केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 और यूजीसी विनियम, 2018 का उल्लंघन करते हुए की गई है। उनका कहना था कि नियुक्ति प्रक्रिया में निर्धारित पात्रता शर्तों की अनदेखी की गई, जिससे यह नियुक्ति अवैध और मनमानी प्रतीत होती है।

याचिका में विशेष रूप से यह तर्क दिया गया कि यूजीसी विनियम, 2018 की धारा 7.3 के अनुसार किसी भी कुलपति पद के उम्मीदवार के लिए विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है। जबकि प्रोफेसर प्रकाश सिंह का अनुभव भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में चेयर प्रोफेसर के रूप में रहा है, जिसे याचिकाकर्ता ने विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष मानने से इनकार किया। उनका कहना था कि IIPA न तो एक विश्वविद्यालय है और न ही यूजीसी के सीधे नियंत्रण में आने वाली संस्था, इसलिए वहां का अनुभव इस पद के लिए मान्य नहीं होना चाहिए।

इसके अलावा, याचिका में यह भी कहा गया कि शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में पात्रता स्पष्ट रूप से “विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष का अनुभव” तय किया गया था, जिससे किसी अन्य संस्थान के अनुभव को समकक्ष मानने की कोई गुंजाइश नहीं बचती। याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया के दौरान पात्रता शर्तों में किसी प्रकार की ढील या बदलाव नहीं किया जा सकता।

हालांकि, अदालत ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह पाया कि कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है। कोर्ट ने माना कि नियुक्ति यूजीसी के दिशा-निर्देशों और संबंधित कानूनों के अनुरूप की गई है। इसी आधार पर अदालत ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

अदालत के इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि पिछले कुछ समय से इस नियुक्ति को लेकर विवाद चल रहा था। फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि चयन प्रक्रिया में अपनाए गए मानदंडों को न्यायालय ने वैध और उचित माना है।

इस निर्णय का असर न केवल गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय बल्कि अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की नियुक्ति प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि यदि चयन प्रक्रिया स्थापित नियमों और दिशानिर्देशों के तहत की गई हो, तो उसे न्यायिक चुनौती से बचाया जा सकता है।

वहीं, शिक्षा जगत में इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और स्पष्टता बनी रहेगी, जबकि कुछ का कहना है कि पात्रता की व्याख्या को लेकर भविष्य में और स्पष्ट दिशा-निर्देशों की आवश्यकता हो सकती है।

फिलहाल, हाईकोर्ट के इस फैसले ने कुलपति प्रोफेसर प्रकाश सिंह की नियुक्ति पर लगे सभी सवालों को विराम दे दिया है और उन्हें अपने पद पर कार्य जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया है।

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