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पूर्व IPS लोकेश्वर सिंह के खिलाफ पिथौरागढ़ में मुकदमा दर्ज, निर्वस्त्र कर पीटने और धमकाने का है संगीन आरोप

पिथौरागढ़ | विशेष संवाददाता देवभूमि उत्तराखंड के पुलिस महकमे से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने अनुशासन और कानून व्यवस्था के पैरोकारों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पिथौरागढ़ के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) और 2014 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी लोकेश्वर सिंह की मुश्किलें अब कानूनी तौर पर बढ़ गई हैं। जिला न्यायालय के कड़े रुख के बाद पिथौरागढ़ कोतवाली में उनके खिलाफ मारपीट, अभद्रता और षड्यंत्र रचने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। यह मामला एक स्थानीय व्यापारी के साथ पुलिस कार्यालय में हुई कथित बर्बरता से जुड़ा है, जिसने अब एक बड़ा कानूनी मोड़ ले लिया है।

क्या है पूरा विवाद? गंदे पानी की शिकायत से शुरू हुई थी कहानी

इस पूरे प्रकरण की नींव साल 2023 में पड़ी थी। मामले के अनुसार, पिथौरागढ़ के स्थानीय व्यापारी लक्ष्मी दत्त जोशी ने आरोप लगाया था कि पुलिस क्वार्टर से निकलने वाला गंदा पानी उनकी कॉलोनी में बह रहा था, जिससे स्थानीय निवासियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। जनहित से जुड़ी इसी समस्या की शिकायत लेकर लक्ष्मी दत्त जोशी 6 फरवरी 2023 को अपनी बेटी के साथ तत्कालीन पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह के कार्यालय पहुंचे थे।

व्यापारी का आरोप है कि समाधान के बजाय वहां उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्हें पुलिसकर्मियों द्वारा न केवल अपमानित किया गया, बल्कि कार्यालय परिसर के भीतर ही निर्वस्त्र कर पीटा गया। साथ ही, उन्हें भविष्य में झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी भी दी गई। इस घटना के बाद कराए गए मेडिकल परीक्षण में व्यापारी के शरीर पर चोटों के निशान पाए गए थे, जिसने उनके दावों को मजबूती दी।

कोर्ट का हंटर: पुलिस की हीलाहवाली पर CJM सख्त

व्यापारी लक्ष्मी दत्त जोशी ने आरोप लगाया था कि जब वे इस घटना की प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने कोतवाली गए, तो पुलिस ने अपने ही बड़े अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया। न्याय की आस में व्यापारी ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की अदालत का दरवाजा खटखटाया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए, पिथौरागढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संजय सिंह की अदालत ने 7 अप्रैल 2026 को ऐतिहासिक आदेश सुनाया। कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया कि पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह और अन्य संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से मुकदमा दर्ज किया जाए। कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने धारा 323 (मारपीट), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 355 (अपमानित करने के इरादे से हमला), 504 (शांति भंग करने के लिए अपमान), 506 (आपराधिक धमकी), 392 (लूट) और 120-B (आपराधिक साजिश) के तहत FIR दर्ज की है।

राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने भी माना ‘दोषी’

यह मामला केवल अदालत तक ही सीमित नहीं रहा। पीड़ित लक्ष्मी दत्त जोशी ने इसकी शिकायत राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण में भी की थी। प्राधिकरण ने पूरे मामले की गहनता से जांच की और अपनी रिपोर्ट में पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह को दोषी पाया। प्राधिकरण ने अपनी जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारी का व्यवहार मर्यादित नहीं था और उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया। इसी आधार पर प्राधिकरण ने शासन से उनके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति भी की थी।

कौन हैं लोकेश्वर सिंह? IPS से UN तक का सफर

लोकेश्वर सिंह 2014 बैच के उत्तराखंड कैडर के आईपीएस अधिकारी रहे हैं। अपने करियर के दौरान उन्होंने उत्तराखंड के महत्वपूर्ण जिलों जैसे हरिद्वार, देहरादून, बागेश्वर, चंपावत, पिथौरागढ़ और पौड़ी में बतौर कप्तान और अन्य वरिष्ठ पदों पर सेवाएं दीं।

उनकी छवि एक तेज-तर्रार अधिकारी की रही थी, यही कारण था कि साल 2025 में जब वे पौड़ी के एसएसपी थे, तब उनका चयन संयुक्त राष्ट्र (UN) से संबद्ध एक अंतरराष्ट्रीय संगठन में हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय अवसर को चुनने के लिए लोकेश्वर सिंह ने अक्टूबर 2025 में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, सेवा छोड़ने के बाद अब इस पुराने मामले ने उनकी कानूनी चुनौतियों को बढ़ा दिया है।

पुलिस प्रशासन में हड़कंप: जांच शुरू

पिथौरागढ़ कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक ललित मोहन जोशी ने पुष्टि की है कि न्यायालय के आदेश का अनुपालन करते हुए मामला पंजीकृत कर लिया गया है। अब पुलिस इस मामले में साक्ष्यों का संकलन करेगी और गवाहों के बयान दर्ज किए जाएंगे। कानून के जानकारों का मानना है कि चूंकि अब पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह सेवा में नहीं हैं, इसलिए उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया और अधिक सख्ती से आगे बढ़ सकती है।

यह मामला इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न रहा हो, कानून से ऊपर नहीं है। एक साधारण व्यापारी की लड़ाई ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि साक्ष्य मजबूत हों, तो न्यायपालिका कार्यपालिका की मनमानी पर अंकुश लगाने में सक्षम है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विवेचना के दौरान पुलिस अपनी ही बिरादरी के पूर्व दिग्गज के खिलाफ कितनी पारदर्शिता से जांच करती है।

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