
देहरादून: उत्तराखंड में ट्यूबरकुलोसिस (Tuberculosis) यानी टीबी को लेकर हालात एक बार फिर चिंताजनक होते जा रहे हैं। राज्य स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने इस संक्रामक बीमारी की गंभीरता को उजागर कर दिया है। खास बात यह है कि राज्यभर में 4,216 गांवों को हाई-रिस्क श्रेणी में रखा गया है, जहां टीबी फैलने की आशंका अधिक है। इन गांवों की कुल आबादी लगभग 14 लाख बताई जा रही है।
हर साल टीबी उन्मूलन के लिए जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 24 अप्रैल को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम ‘हाँ! हम टीबी को खत्म कर सकते हैं’ रखी गई है, लेकिन उत्तराखंड के मौजूदा हालात इस लक्ष्य से अभी काफी दूर नजर आ रहे हैं।
तीन महीनों में सामने आए 6,799 नए मरीज
साल 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही राज्य में 6,799 टीबी मरीज सामने आ चुके हैं। यह आंकड़ा पूरे साल के लिए एक गंभीर संकेत माना जा रहा है। यदि यही रफ्तार जारी रही, तो इस साल मरीजों की संख्या पिछले वर्षों के रिकॉर्ड को पार कर सकती है।
देहरादून और हरिद्वार सबसे ज्यादा प्रभावित
जिला स्तर पर आंकड़ों पर नजर डालें तो देहरादून सबसे ज्यादा प्रभावित जिला बनकर सामने आया है, जहां 2,136 मरीज दर्ज किए गए हैं। इसके बाद हरिद्वार में 1,748 मरीज और उधम सिंह नगर में 1,203 केस सामने आए हैं। नैनीताल जिले में भी 661 मरीज पाए गए हैं। ये सभी मैदानी इलाके हैं, जहां अधिक जनसंख्या, शहरीकरण और प्रदूषण जैसी समस्याएं टीबी के प्रसार को बढ़ावा देती हैं।
पहाड़ी जिलों में भी स्थिति गंभीर
पर्वतीय जिलों में भी हालात पूरी तरह नियंत्रण में नहीं हैं। पौड़ी गढ़वाल में सबसे ज्यादा 318 मरीज सामने आए हैं, जो पहाड़ी क्षेत्रों में सबसे अधिक है। इसके अलावा अल्मोड़ा में 135, पिथौरागढ़ में 128, टिहरी में 103 और उत्तरकाशी में 102 मरीज दर्ज किए गए हैं। अन्य जिलों जैसे रुद्रप्रयाग, चंपावत, चमोली और बागेश्वर में मरीजों की संख्या कम जरूर है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है।
हाई-रिस्क गांवों में विशेष निगरानी
स्वास्थ्य विभाग ने जिन 4,216 गांवों को हाई-रिस्क घोषित किया है, वहां विशेष निगरानी रखी जा रही है। इन क्षेत्रों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें टीबी होने का खतरा ज्यादा रहता है। इनमें डायबिटीज, हाइपरटेंशन, एचआईवी संक्रमित, डायलिसिस मरीज, गर्भवती महिलाएं और पहले से टीबी से पीड़ित लोग शामिल हैं।
100 दिन का विशेष अभियान शुरू
टीबी की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार ने 100 दिनों का विशेष अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग की जा रही है, ताकि संभावित मरीजों की पहचान कर उन्हें समय पर इलाज दिया जा सके। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि समय रहते जांच और इलाज से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंताजनक
पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो टीबी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती हुई दिखाई देती है।
- 2020: 20,047 मरीज
- 2021: 22,949 मरीज
- 2022: 27,570 मरीज
- 2023: 26,815 मरीज
- 2024: 29,319 मरीज
- 2025: 28,608 मरीज
वर्तमान में राज्य में कुल टीबी मरीजों की संख्या करीब 16 हजार बताई जा रही है।
मृत्यु दर भी चिंता का विषय
उत्तराखंड में टीबी से मृत्यु दर 33 प्रति लाख आबादी है, जबकि संक्रमण दर 47 प्रति लाख है। यह आंकड़े बताते हैं कि बीमारी न केवल तेजी से फैल रही है, बल्कि जानलेवा भी साबित हो रही है।
स्वास्थ्य मंत्री और अधिकारियों की प्रतिक्रिया
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार टीबी उन्मूलन के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने माना कि कुछ जिलों में मरीजों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय है, लेकिन इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष रणनीति बनाई जा रही है।
वहीं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की निदेशक रश्मि पंत ने लोगों से जागरूक रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि टीबी का इलाज पूरी तरह संभव है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि मरीज समय पर जांच कराएं और पूरा इलाज लें।
टीबी के लक्षण और बचाव
टीबी के लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं, जिससे लोग अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं। प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:
- दो हफ्ते से अधिक समय तक खांसी
- खांसी में खून आना
- लगातार बुखार
- रात में पसीना आना
- वजन कम होना
- कमजोरी और थकान
यह बीमारी हवा के जरिए फैलती है, इसलिए भीड़भाड़ वाले इलाकों में इसका खतरा ज्यादा होता है। समय पर जांच, सही इलाज और जागरूकता ही इससे बचाव के सबसे प्रभावी उपाय हैं।



