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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ‘महायुद्ध’ की आहट: जहाजों पर फायरिंग के बाद समुद्र में बढ़ा तनाव, ट्रंप की ‘नो डील-नो रिलीफ’ नीति से मचा हड़कंप

दुबई/वॉशिंगटन/दिल्ली: दुनिया की ‘आर्थिक धड़कन’ कहे जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में पिछले 24 घंटों के भीतर हालात नियंत्रण से बाहर होते दिख रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र में शांति की जो उम्मीद चंद घंटों पहले जगी थी, वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े रुख और ईरान की आक्रामक जवाबी कार्रवाई के बाद धुएं में तब्दील हो गई है। सबसे चिंताजनक खबर यह है कि इस समुद्री मार्ग से गुजर रहे दो भारतीय जहाजों को ईरानी गनबोट्स के हमले का सामना करना पड़ा है, जिसके बाद नई दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक हड़कंप मच गया है।

राहत के बाद फिर ‘ब्लॉकेड’: आखिर क्यों बिगड़े हालात?

शनिवार की सुबह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई थी जब ईरान ने अपने बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी के बावजूद होर्मुज के रास्ते को पूरी तरह खोलने का ऐलान किया था। इस घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई और फंसे हुए सैकड़ों व्यापारिक जहाजों ने आगे बढ़ने की तैयारी की।

हालांकि, यह सुकून ज्यादा देर तक नहीं टिक सका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया कि जब तक ईरान के साथ ‘100 प्रतिशत डील’ पूरी नहीं हो जाती, तब तक अमेरिका अपनी नाकाबंदी (Blockade) नहीं हटाएगा। ट्रंप के इस दो टूक बयान ने आग में घी डालने का काम किया।

भारतीय जहाजों पर फायरिंग: दिल्ली ने जताया कड़ा विरोध

ट्रंप के बयान के कुछ ही घंटों बाद ईरान की शक्तिशाली ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) ने न केवल होर्मुज को फिर से ब्लॉक करने की घोषणा की, बल्कि इस क्षेत्र में मौजूद जहाजों को खुली चेतावनी भी दे डाली। IRGC ने कहा कि इस रास्ते पर आने वाला कोई भी जहाज ‘दुश्मन का सहयोगी’ माना जाएगा।

इसी तनाव के बीच, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तनाव 2026 की सबसे हिंसक घटना तब सामने आई जब दो भारतीय व्यापारिक जहाजों पर ईरानी गनबोट्स ने फायरिंग कर दी। जानमाल के नुकसान से बचने के लिए इन जहाजों को बीच रास्ते से ही वापस लौटना पड़ा। इस घटना ने भारत की समुद्री सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत इस मामले पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली स्थित ईरानी राजदूत को तलब किया और इस ‘अकारण हमले’ पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।

मुज्तबा खामेनेई का पहला बड़ा इम्तिहान

ईरान के नए सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला मुज्तबा खामेनेई ने इस संकट के बीच अपनी रणनीतिक मंशा साफ कर दी है। शनिवार को जारी एक कड़े संदेश में उन्होंने कहा कि ईरानी नौसेना “अपने दुश्मनों को करारी शिकस्त देने और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है।” मुज्तबा का यह बयान दर्शाता है कि ईरान अब बैकफुट पर रहने के बजाय ‘आक्रामक रक्षा’ की नीति अपना रहा है। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका की आर्थिक नाकेबंदी जारी रहेगी, तब तक होर्मुज से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही ‘सीमित और बाधित’ रहेगी।

21 अप्रैल: निर्णायक घड़ी और सीजफायर का अंत

वर्तमान संकट की सबसे बड़ी वजह 21 अप्रैल की समयसीमा है। दोनों देशों के बीच चल रहा अस्थायी सीजफायर इसी तारीख को समाप्त होने वाला है।

  • परमाणु विवाद: ट्रंप प्रशासन का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ठप करना और उसके एनरिच्ड यूरेनियम भंडार को अमेरिकी नियंत्रण में लेना है।

  • ट्रंप का अल्टीमेटम: राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि यदि 21 अप्रैल तक ईरान उनकी शर्तों पर सहमत नहीं होता, तो सीजफायर को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि खाड़ी क्षेत्र में सीधी सैन्य कार्रवाई की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

इस्लामाबाद वार्ता पर टिकी दुनिया की निगाहें

युद्ध के बढ़ते खतरों के बीच कूटनीतिक गलियारों में अभी भी एक आखिरी उम्मीद बाकी है। सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच दूसरे दौर की उच्च स्तरीय बातचीत हो सकती है। वैश्विक समुदाय इस बैठक को ‘अंतिम अवसर’ के रूप में देख रहा है। यदि इस्लामाबाद वार्ता विफल रहती है, तो 21 अप्रैल के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Energy Supply Chain) पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तनाव 2026 अगले कुछ दिनों तक और खिंचता है, तो:

  1. तेल की कीमतें: कच्चे तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।

  2. शिपिंग लागत: समुद्री बीमा और माल ढुलाई की दरों में 300% तक की बढ़ोतरी की आशंका है।

  3. सप्लाई चेन: भारत, चीन और जापान जैसे एशियाई देशों के लिए ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है।

होर्मुज की खाड़ी इस समय एक ऐसे ज्वालामुखी पर बैठी है जो कभी भी फट सकता है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति है, तो दूसरी तरफ अयातुल्ला मुज्तबा खामेनेई का वैचारिक और सैन्य प्रतिरोध। भारतीय जहाजों पर हुई फायरिंग ने इस द्विपक्षीय तनाव को अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया है। अब पूरी दुनिया की नजरें 21 अप्रैल की समयसीमा और इस्लामाबाद में होने वाली संभावित गुप्त वार्ता पर टिकी हैं। क्या कूटनीति इस आसन्न युद्ध को टाल पाएगी, या फिर दुनिया एक और बड़े आर्थिक संकट की ओर धकेल दी जाएगी?

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