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उत्तराखंडफीचर्ड

UCC पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को दी चुनौती, संवैधानिक अधिकारों के हनन का लगाया आरोप

The Hill India News
Last updated: April 17, 2026 1:51 pm
The Hill India News
Published: April 17, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच अब राज्य में वैचारिक और कानूनी युद्ध छिड़ गया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस कानून के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इसे किसी भी सूरत में स्वीकार न करने का संकल्प दोहराया है। बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम ने देहरादून में एक तीखे बयान में स्पष्ट किया कि यह कानून न केवल धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है, बल्कि इसका ढांचा ही असंवैधानिक है।

Contents
“राज्य सरकार के पास अधिकार ही नहीं”: बोर्ड का बड़ा दावाविधि आयोग की सिफारिशों का दिया हवालामौलिक अधिकारों बनाम नीति निर्देशक तत्वों की जंग“गुजरात मॉडल और चयनात्मक लागूकरण” पर प्रहारलोकतांत्रिक और संवैधानिक आपत्तियां

“राज्य सरकार के पास अधिकार ही नहीं”: बोर्ड का बड़ा दावा

डॉ. सैयद कासिम ने केंद्र और राज्य के शक्ति विभाजन पर सवाल उठाते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता जैसे व्यापक और संवेदनशील विषय पर कानून बनाने का अधिकार प्राथमिक रूप से केंद्र सरकार के पास होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी राज्य सरकार द्वारा इसे लागू करना संघीय ढांचे के सिद्धांतों के विपरीत है।

उन्होंने कहा, “संविधान निर्माताओं ने केंद्र को भी यह अधिकार इसी शर्त पर दिया था कि वह देश के सभी समुदायों और वर्गों के बीच एक आम सहमति (Consensus) बनाए। बिना जनमत संग्रह और विश्वास बहाली के इसे थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या है।”

विधि आयोग की सिफारिशों का दिया हवाला

बोर्ड के प्रवक्ता ने 21वें और 22वें विधि आयोग (Law Commission) की गतिविधियों का उल्लेख करते हुए बताया कि विशेषज्ञों ने खुद इसकी आवश्यकता पर प्रश्नचिह्न लगाए थे।

  • 21वां विधि आयोग: बोर्ड ने आयोग के समक्ष लिखित तर्क प्रस्तुत किए थे, जिसके बाद आयोग ने स्पष्ट कहा था कि वर्तमान वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों में देश को समान नागरिक संहिता की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है।

  • 22वां विधि आयोग: वर्तमान में 22वें विधि आयोग की कोई अंतिम और ठोस सिफारिश सामने नहीं आई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी इस पर मंथन अधूरा है।

बोर्ड का प्रश्न है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञ किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं, तो उत्तराखंड सरकार इतनी जल्दबाजी में क्यों है? इसी जल्दबाजी के कारण Uttarakhand UCC Controversy अब सड़कों से लेकर कानूनी गलियारों तक चर्चा का विषय बन गई है।

मौलिक अधिकारों बनाम नीति निर्देशक तत्वों की जंग

डॉ. कासिम ने कानूनी बारीकियों पर चर्चा करते हुए कहा कि UCC संविधान के भाग 4 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) के अंतर्गत आता है। भारतीय संविधान के अनुसार, नीति निर्देशक तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा परिवर्तनीय (Enforceable) नहीं हैं, जबकि भाग 3 में दिए गए मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून नागरिकों को प्राप्त निम्नलिखित मौलिक अधिकारों से प्रत्यक्ष रूप से टकराता है:

  1. धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28): अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने का अधिकार।

  2. समानता का अधिकार: विविध संस्कृतियों और परंपराओं को समान संरक्षण।

  3. व्यक्तिगत स्वतंत्रता: व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के संरक्षण का अधिकार।

“गुजरात मॉडल और चयनात्मक लागूकरण” पर प्रहार

बोर्ड ने गुजरात और अन्य राज्यों में पारित इसी तरह के कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये कानून न तो पूरे देश में एक समान हैं और न ही स्वयं उस राज्य के सभी वर्गों पर समान रूप से लागू होते हैं। डॉ. कासिम के अनुसार, यदि किसी कानून से समाज के कुछ वर्गों को बाहर रखा जाता है या विशिष्ट छूट दी जाती है, तो वह ‘समान’ नागरिक संहिता के मूल विचार को ही खंडित कर देता है।

“UCC कोई मौलिक अधिकार नहीं है। देश में न तो कोई आपात स्थिति है और न ही ऐसी कोई सामाजिक अस्थिरता, जिसके लिए इस कानून को बिना आम सहमति के लागू किया जाना अनिवार्य हो।” — डॉ. सैयद कासिम, प्रवक्ता, AIMPLB

लोकतांत्रिक और संवैधानिक आपत्तियां

आर्टिकल के इस हिस्से में बोर्ड ने स्पष्ट किया कि विधायिका के अधिकारों का प्रयोग तब किया जाना चाहिए जब वह लोक कल्याण के लिए हो, न कि किसी विशेष एजेंडे को तुष्ट करने के लिए। बोर्ड का मानना है कि उत्तराखंड में लागू किया जा रहा प्रारूप संवैधानिक औचित्य की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। जनमत आमंत्रित करने की प्रक्रिया को बोर्ड ने केवल एक औपचारिकता करार दिया, जिसमें अल्पसंख्यकों और जनजातीय समूहों की चिंताओं को दरकिनार किया गया है।

उत्तराखंड में UCC का विरोध अब केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर कानूनी बहस में तब्दील हो गया है। Uttarakhand UCC Controversy आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुँच सकती है। बोर्ड के कड़े रुख से साफ है कि वे इस मामले में लंबी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार हैं।

अब सबकी नजरें प्रदेश सरकार और राजभवन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या सरकार बोर्ड की इन आपत्तियों पर संज्ञान लेगी या फिर अपनी तय समय सीमा के भीतर कानून को अमलीजामा पहनाएगी? यह देखना दिलचस्प होगा।

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