नई दिल्ली। देश की संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक तलवारें खिंच गई हैं। गुरुवार को लोकसभा का माहौल उस समय गरमा गया जब समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने न केवल सरकार की मंशा पर सवाल उठाए, बल्कि पूर्व सांसद स्मृति ईरानी पर भी इशारों-इशारों में एक व्यक्तिगत टिप्पणी कर दी। इस सियासी हमले का जवाब स्मृति ईरानी ने सोशल मीडिया के जरिए बेहद तल्ख अंदाज में दिया, जिससे यह बहस अब ‘संबल बनाम विरासत’ की जंग में तब्दील हो गई है।
अखिलेश यादव का ‘सास-बहू’ तंज और स्मृति का पलटवार
सदन में अपने संबोधन के दौरान अखिलेश यादव ने भाजपा की चुनावी हार और महिला प्रतिनिधित्व पर चर्चा करते हुए कहा, “पार्टी आधार पर आरक्षण होना चाहिए, वरना भाजपा महिलाओं के बीच ही प्रतिस्पर्धा करा देगी।” इसी दौरान उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम लिए बिना उन पर निशाना साधते हुए कहा, “सास-बहू वाली तो हार गई हैं आपकी। पार्टी को तो मौका मिलेगा।”
सपा प्रमुख के इस बयान पर स्मृति ईरानी ने भी मोर्चा संभालने में देर नहीं की। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, “सुना है आज अखिलेश जी ने संसद में मुझे याद किया। अच्छा है, जिनको राजनीति धरोहर में मिली, वे उनको भी याद करते हैं जो अपने दम पर आसमान में सुराख़ करते हैं।” स्मृति ने आगे तंज कसते हुए कहा कि एक कामकाजी महिला पर वे टिप्पणी कर रहे हैं जिन्होंने जीवन में कभी कोई नौकरी नहीं की। उन्होंने अखिलेश को ‘सीरियल’ से ध्यान हटाकर संसद और महिलाओं के संबल पर ध्यान देने की सलाह दी।
परिसीमन को लेकर ‘साजिश’ की आशंका
अखिलेश यादव महिला आरक्षण भाषण के दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीतिक संरचना में आने वाले संभावित बदलावों को लेकर भी काफी हमलावर नजर आए। उन्होंने परिसीमन (Delimitation) के भविष्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब यूपी में विधानसभा की सीटें 500 से ऊपर और लोकसभा की सीटें 120 के करीब पहुंचने वाली हैं, तो सरकार की मंशा क्या है?
सपा प्रमुख ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “कहीं ऐसा तो नहीं कि परिसीमन के नाम पर कोई बड़ी साजिश और षड्यंत्र रचा जा रहा हो? अगर यह षड्यंत्र रहा, तो याद रखिएगा, जैसे आप अयोध्या हारे, वैसे ही एक बार फिर पूरा उत्तर प्रदेश हार जाएंगे।” अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर भाजपा के हिंदुत्व और चुनावी प्रबंधन के दुर्ग में सेंध लगाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
‘जनगणना के बिना आरक्षण कैसा?’: सपा की बड़ी मांग
अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण बिल को लागू करने से पहले ‘जनगणना’ (Census) को अनिवार्य शर्त बताया। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक सटीक आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक आरक्षण का लाभ सही मायने में पात्र महिलाओं तक नहीं पहुंच पाएगा। उन्होंने सदन में मांग रखी कि:
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आरक्षण की परिधि में पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
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आरक्षण का आधार पार्टीवार तय हो ताकि सामाजिक विविधता बनी रहे।
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पहले जातीय जनगणना हो, ताकि ‘आधी आबादी’ की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
अखिलेश ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “सच तो यह है कि भाजपा और उनके संघी साथी जातीय जनगणना को टालना चाहते हैं, क्योंकि वे पिछड़ों को उनका हक देने के पक्ष में नहीं हैं।“
सीटें सुरक्षित करने पर आपत्ति: कंपीटीशन की चिंता
अखिलेश यादव ने लोकसभा या विधानसभा सीटों को विशेष रूप से महिलाओं के लिए ‘सुरक्षित’ (Reserve) करने के मॉडल का विरोध किया। उनका मानना है कि सीटों को ब्लॉक करने के बजाय राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढांचे में महिलाओं को आरक्षण देना चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि विशेष सीटें सुरक्षित करने से भाजपा महिलाओं के भीतर ही आंतरिक कलह और प्रतिस्पर्धा पैदा कर देगी, जिससे सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्ता पक्ष के नेताओं ने विपक्ष से इस ऐतिहासिक बिल को सर्वसम्मति से पास करने की अपील की है, लेकिन अखिलेश यादव के कड़े रुख और ‘कोटा के भीतर कोटा’ (पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए) की मांग ने इस राह को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
अखिलेश यादव महिला आरक्षण भाषण ने स्पष्ट कर दिया है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को आगामी चुनावों में ‘पिछड़ा वर्ग’ की अस्मिता से जोड़कर पेश करेगी। संसद में चली यह जुबानी जंग बताती है कि महिला आरक्षण बिल केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और देश की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला एक बड़ा हथियार बन गया है।



